बीमार पशुओं के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कुछ दवाओं के कारण भारत में काफी बड़ी संख्या में गिद्धों की जान चली गई। जिसके चलते लाखों लोगों की मौतें भी हुईं। आइए जानते हैं कैसे?
04 Dec, 2024
BBC की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के दशक के मध्य में आते-आते डाइक्लोफेनाक (गैर-स्टेरॉयडल दर्द निवारक दवा) नाम की दवा के कारण लगभग 5 करोड़ गिद्ध की संख्या लगभग शून्य हो गई।
Source: Thehealthsiteदरअसल, जिन जानवरों को डाइक्लोफेनाक दवा दी गई, उनकी मौत के बाद जिन गिद्धों ने उनके शवों को खाया, उनकी किडनी फेल्योर की वजह से मौत हो गई।
Source: Thehealthsiteअमेरिकन इकोनॉमिक एसोसिएशन जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में कहा गया है कि इन पक्षियों (गिद्धों) की मौत की वजह से वातावरण में घातक बैक्टीरिया और संक्रमण फैलते हैं।
Source: Thehealthsiteगिद्धों की मौत की वजह से फैले घातक बैक्टीरिया और संक्रमण की वजह से लगभग 5 लाख लोगों की मौत हो गई।
Source: Thehealthsiteस्टेट ऑफ इंडियाज बर्ड्स की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2006 में पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली इस दवा पर प्रतिबंध लगाया गया, जिसके बाद गिद्धों के मरने की संख्या में गिरावट देखी गई।
Source: Thehealthsiteकागो विश्वविद्यालय के हैरिस स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में सहायक प्रोफ़ेसर इयाल फ्रैंक का कहना है कि गिद्ध प्रकृति की स्वच्छता को बनाए रखने में काफी सहायक होता है। यह बैक्टीरिया और बीमारी से मारे गए जानवरों को हटाने में काफी मददगार होता है, जिससे बीमारियां फैलने का खतरा रहता है।
Source: Thehealthsiteकुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि साल 2000 से 2005 के बीच गिद्धों की घटती आबादी के चलते हर साल लगभग 1 लाख लोगों की मौतें हुई हैं।
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