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केरल के एर्नाकुलम में एलएलबी की पढ़ाई कर रही एक गरीब छात्रा जिशा के साथ रेप और फिर बर्बर तरीके से की गई हत्या का मामला सामने आने से हड़कंप मच गया है। इस रेप और मर्डर केस ने एक बार फिर पूरे देश को ‘निर्भया’ हत्याकांड याद दिला दिया है। इस केस में भी रेपिस्ट ने छात्रा के प्राइवेट पार्ट को काफी नुकसान पहुंचाया है। उसकी आंते तक बाहर निकाली गई हैं। ये ख़बर सुनने के बाद काफी देर तक मैं सुन्न होकर बैठी रही। आख़िर वो क्या सोच होती है, कौन सी मानसिकता होती है, जिसकी वजह से रेपिस्ट इंसानियत की सारी हदों को पार कर जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप और हम अनजाने में ही सही, अपने समाज को ऐसा बना रहे हैं जहां रेपिस्ट को बढ़ावा मिलता है। जहां वो अपने अपराध का ठीकरा उल्टे पीड़ित पर थोप देता है।
हम समय-समय पर रेप की ऐसी घटनाओं और घटनाओं के पीछे बताए जाने वाले ऊल-जुलूल कारणों के बारे में सुनते रहते हैं। समाज का पढ़ा लिखा तबका जहां इसे मानसिक बीमारी कहकर पल्ला झाड़ लेता है, वहीं कानून की नज़र में ये अपराध है। लेकिन कई बार जब रेप करने के कारण के बारे में सुनती हूं तो मुझे लगता है कि ये एक ‘एटिट्यूट’ है। एक ‘नज़रिया’। जिसमें लड़की के कपड़ों, उसके पुरूष मित्र बनाने, देर रात बाहर घूमने, और किसी के प्रपोज़ल को ‘न’ कहने जैसी बातों को आधार बनाकर उसे सबक सिखाने के लिए उसका रेप कर दिया जाता है। इस तरह के अपराध के लिए कैसी सज़ा दी जाए, इस पर लंबे वक्त से बहस चल रही है।
मैंने हाल ही में पुरानी दिल्ली टॉकीज़ की शॉर्ट फिल्म ‘प्राउड रेपिस्ट’ देखी। (जिसका वीडियो ऊपर दिया गया है) उसमें अस्पताल के बिस्तर पर घायल रेपिस्ट लेटा है। घायल इसलिए है क्योंकि अपराध के बाद भीड़ ने उसकी जमकर पिटाई कर दी। पूरी फिल्म, एक नर्स और उसकी बातचीत पर आधारित है। 5 मिनट की इस फिल्म में आप सिर्फ किसी एक रेपिस्ट को नहीं, बल्कि इस तरह के अपराध को अंजाम देने वाले लोगों के रवैये को समझ पाएंगे। नर्स रेपिस्ट से सवाल पूछती है, ‘तुझे ज़रा भी गलत नहीं लग रहा न, कि तूने कुछ गलत किया है।’ इसपर रेपिस्ट कहता है कि गलती उसकी नहीं लड़कियों की है, वो छोटे कपड़े पहनकर लोगों को उकसाने का काम करती हैं। फिल्म में इस तरीके की कई बातें कि गई हैं, जिसे सुनकर आप चौंक जाएंगे, लेकिन आख़िर में फिल्म में अपने ही अंदाज़ में रेपिस्ट को सबक सिखाया गया है। ‘मर्दांनगी’ नाम की जिस चीज़ का वो दंभ भरता है, उसे आखिर में कुचल दिया गया है। आखिरी सीन में आप रेपिस्ट को फूट-फूटकर रोते बिलखते देख सकते हैं।
अब जब भी मैं किसी रेप की खबर सुनती हूं, तो इस फिल्म में रेपिस्ट की कही गई बातें मेरे ज़हन में घूमने लगती है। क्या हर रेप के पीछे ऐसा ही कोई कारण होता है? क्या लड़कियों के प्रति अपनाया गया ऐसा रवैया उनकी जान का दुश्मन बन जाता है? क्या हमें चुनिंदा लोगों की जगह पूरे समाज को कटघरे में रखना होगा कि उसने ऐसा माहौल बनाया ही क्यों कि उसमें ऐसे अपराधी पनप रहे हैं? और आख़िर में, क्या फिल्म में दिखाया गया न्याय ही ऐसे मामलों में असल ‘न्याय’ है? जिशा लौटकर वापस नहीं आएगी। लेकिन ये वक्त है हमारे सोचने का कि कैसे आगे कोई और लड़की ‘निर्भया’ या जिशा न बन पाए। जिसकी शुरुआत शायद इस फिल्म को देखकर हम कर सकते हैं।
चित्र स्रोत: Shutterstock
विडियो स्रोत: PuraniDiliTalkies/Youtube
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