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टीबी के खिलाफ लड़ाई छेड़ने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ हुए एकजुट, कहा भारत में टीबी सार्वजनिक स्वास्थ्य इमर्जेंसी बना हुआ है

हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. के. के. अग्रवाल ने कहा, “बीमारी को संबोधित करने और इसका मुकाबला करने के अनेक प्रयासों के बावजूद, टीबी विशेष रूप से भारत में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य इमर्जेंसी बना हुआ है।

टीबी के खिलाफ लड़ाई छेड़ने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ हुए एकजुट, कहा भारत में टीबी सार्वजनिक स्वास्थ्य इमर्जेंसी बना हुआ है
Tuberculosis can lead to COPD, pulmonary fibrosis or restrictive lung disease. © Shutterstock

Written by Anshumala |Published : March 25, 2019 10:00 AM IST

दुनिया की कुल आबादी के 17.7 प्रतिशत भाग के साथ, भारत दुनिया में 27 प्रतिशत तपेदिक (टीबी) रोगियों का घर है। सरकार द्वारा 1997 से बड़े पैमाने पर टीबी उन्मूलन अभियानों के माध्यम से इस महामारी को मिटाने के लिए भारी प्रयास किए गए हैं- हालांकि, संतोषजनक सफलता अभी तक नहीं मिल पाई है। टीबी से संबंधित प्रमुख चुनौतियों पर बोलते हुए, पोर्टिया मेडिकल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. एम उदय कुमार मैया ने कहा, “भारत में लगभग 40 प्रतिशत आबादी में लेटेंट यानी अव्यक्त टीबी है और सक्रिय टीबी वाले रोगियों के बैक्टीरिया से संक्रमित हैं। औसतन, लगभग 10 प्रतिशत अनुपचारित अव्यक्त टीबी के मामले सक्रिय रूप में बदल जाते हैं और यह कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों में अधिक होता है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भारत जैसे देशों में केवल सक्रिय टीबी वाले रोगियों के इलाज की सिफारिश करता है, जिसकी समस्या अधिक है। हालांकि, इस बीमारी में कमी या उन्मूलन तब तक संभव नहीं हो सकता है, जब तक कि अव्यक्त टीबी वाले लोगों को भी लक्षित नहीं किया जाता है। वैश्विक स्तर पर, भारत में टीबी के साथ-साथ मल्टी-ड्रग-प्रतिरोधी टीबी रोगियों का सबसे अधिक बोझ है। देश को एचआईवी से संबंधित टीबी के सबसे अधिक मामलों की श्रेणी में भी दूसरे स्थान पर रखा गया है।”

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हेल्दी में क्लिनिकल एडवाइजरी बोर्ड के प्रमुख डॉ. रामानंदा श्रीकांतिया नादिग ने कहा, “तपेदिक के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण निर्धारकों में से एक है किसी टीबी रोगी का इलाज के बाद पूरी तरह से ठीक होना, क्योंकि कोई भी बचा हुआ बैक्टीरिया संभावित रूप से एक दवा-प्रतिरोधी के रूप में विकसित हो सकता है। टीबी का दवा-प्रतिरोधी या कई दवा-प्रतिरोधी रूप इलाज के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होता है और जीवन के नुकसान को रोकने के लिए यह बहुत ही ठोस प्रयासों की मांग करता है। वर्ष 2015 में 93,000 रोगियों ने आरएनटीसीपी के तहत दवा-प्रतिरोधी टीबी हेतु उपचार प्राप्त किया। एक अन्य महत्वपूर्ण कारक टीबी के सटीक रूप की पहचान करना है, जिससे की कोई रोगी पीड़ित है, क्योंकि ठीक से पहचान न होने पर मरीज की जान को खतरा हो सकता है।”

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क्या हो सकता है बेहतर उपाय

सही उपाय के बारे में टिप्पणी करते हुए, हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्षडॉ. के. के. अग्रवाल ने कहा, “बीमारी को संबोधित करने और इसका मुकाबला करने के अनेक प्रयासों के बावजूद, टीबी विशेष रूप से भारत में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य इमर्जेंसी बना हुआ है। प्रधान मंत्री द्वारा (टीबी मुक्त भारत) के लिए वर्ष 2025 को समय सीमा के रूप में निर्धारित किया गया है, जो डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित वैश्विक समय सीमा से पांच साल आगे है। हालांकि, लक्ष्य महत्वाकांक्षी और आशाजनक लगता है, परंतु इसे प्राप्त करने के लिए भारत को और संसाधन जुटाने होंगे।

प्रारंभिक निदान और पूर्ण उपचार है जरूरी

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प्रारंभिक निदान और पूर्ण उपचार टीबी को रोकने और नियंत्रित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रत्येक मामले को नोटिफाई या अधिसूचित करने और जागरूकता के जरिए स्थिति से जुड़े कलंक को दूर करने की आवश्यकता है। सभी उल्लेखनीय रोगों के लिए डीटीआर पर आधारित एप्रोच होना चाहिए यानी डायग्नोज, ट्रीट एंड रिपोर्ट। थूक का उपयोग करके जिंकस्पर्म टेस्ट से इसकी पहचान करनी चाहिए।

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