ये लक्षण दिख रहे हैं, तो इन्हें रेल अलर्ट समझें और तुरंत डॉक्टर को दिखाएं
रोजाना 30 मिनट का समय एक्सरसाइज के लिए जरूर निकालें.
रोजाना 30 मिनट का समय एक्सरसाइज के लिए जरूर निकालें.
यदि आपको दो हफ्ते से ज्यादा समय से कमर दर्द हो रहा है और दर्द कमर से लेकर पैरों तक जा रहा है.
स्पाइन संबंधी परेशानियों से बचने के लिए हमारा वजन नियंत्रण में होना चाहिए.
कोरोना काल के बाद कंपनियों में वर्क फ्रॉम होम का कल्चर बढ़ा है.
स्पाइन संबंधी समस्याओं से बचने के लिए अपना वजन कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी है.
आधुनिक गैजेट्स के कारण आजकल लोगों की जीवनशैली शारीरिक रूप से बेहद निष्क्रिय हो गई है.
आमतौर पर बुजुर्गों को होने वाली ये बीमारी अब खराब जीवनशैली के कारण युवाओं को भी होने लगी है.
हमारे खाने में आमतौर पर कार्बोहाइड्रेट और फैट तो प्रचुर मात्रा में होते हैं, लेकिन प्रोटीन और कैल्शियम जैसे तत्वों की कमी हो जाती है.
ऑस्टियोअर्थराइटिस में जोड़ों के बीच की नर्म परत (कार्टिलेज) के घिस जाने से उनमें दर्द होता है. इससे बचने के लिए वजन को काबू में रखना बहुत जरूरी है.
जोड़ों व घुटनों में दर्द होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं. डॉक्टर की सलाह का पालन करें और नियमित रूप से दवा लें. दवा का असर होने में समय लग सकता है,
इस बीमारी की एडवांस स्टेज में मरीज चलने-फिरने में पूरी तरह से अक्षम हो जाता है. कई बार तो पीड़ित के लिए अपने पैरों पर खड़े रहना भी मुश्किल हो जाता है. इसलिए इस बीमारी की अनदेखी नहीं करनी चाहिए.
वैसे तो शुरुआती दौर में अर्थराइटिस का ट्रीटमेंट लेकर एडवांस स्टेज को आने से रोका जा सकता है. लेकिन यदि किसी कारणवश मरीज के घुटने या कूल्हों के जोड़ के स्थिति बहुत खराब हो चुकी हैं तो सर्जरी का विकल्प भी उपलब्ध है.
ठंड के मौसम में मांसपेशियों में सिकुड़न की समस्या बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति में अपने जोड़ों का खास ख्याल रखना चाहिए. रोजाना पैदल चलना भी एक अच्छा व्यायाम है.
ऑस्टियोअर्थराइटिस में घुटने और कूल्हे के जोड़ सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं.
अर्थराइटिस होने पर जोड़ों में दर्द और सूजन होती है.
बढ़ती उम्र के कारण बुजुर्गों में ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या आम है, लेकिन अर्थराइटिस का एक और प्रकार है जिसे रूमेटाइड अर्थराइटिस भी कहा जाता है. ये बीमारी युवाओं को भी हो सकती है.
अर्थराइटिस के उपचार की प्रक्रिया में बीमारी का जल्द diagnose होना और इलाज समय पर शुरू होना काफी महत्वपूर्ण है. हालांकि इस बीमारी को रिवर्ट तो नहीं किया जा सकता,
शुरुआती स्टेज में बीमारी की अनदेखी न करें. अगर समय पर इलाज शुरू कर दिया तो डॉक्टर साधारण दवाइयों के जरिए ही मरीज को ठीक कर सकते हैं.
अब तक ऑस्टियोअर्थराइटिस को बुजुर्गों में होने बीमारी के तौर पर देखा जाता था.
अर्थराइटिस की समस्या कितनी आम होती जा रही है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 50 की उम्र पार कर चुका हर दूसरा व्यक्ति इससे पीड़ित है.
वैसे तो अर्थराइटिस होने की संभावना बुजुर्गों में अधिक होती है. लेकिन यदि कोई व्यक्ति पहले से ही डायबिटीज या थायराइड की बीमारी से जूझ रहा हो तो उसे अर्थराइटिस होने का खतरा अधिक होता है.
रूमेटाइड अर्थराइटिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है. इसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही जोड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगती है.
अर्थराइटिस या जोड़ों का दर्द मरीज के पूरे शरीर को प्रभावित करता है. इसकी वजह से हार्ट की समस्याएं और पाचन संबंधी परेशानियां भी बढ़ सकती हैं.
अर्थराइटिस चाहे किसी भी प्रकार का हो शुरुआती दौर में यदि इसका पता चल जाए और समय पर इलाज शुरू हो जाए तो बेहतर होता है.
रोजाना 30 मिनट का समय एक्सरसाइज के लिए जरूर निकालें.
यदि आपको दो हफ्ते से ज्यादा समय से कमर दर्द हो रहा है और दर्द कमर से लेकर पैरों तक जा रहा है.
स्पाइन संबंधी परेशानियों से बचने के लिए हमारा वजन नियंत्रण में होना चाहिए.
कोरोना काल के बाद कंपनियों में वर्क फ्रॉम होम का कल्चर बढ़ा है.
स्पाइन संबंधी समस्याओं से बचने के लिए अपना वजन कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी है.
आधुनिक गैजेट्स के कारण आजकल लोगों की जीवनशैली शारीरिक रूप से बेहद निष्क्रिय हो गई है.
आमतौर पर बुजुर्गों को होने वाली ये बीमारी अब खराब जीवनशैली के कारण युवाओं को भी होने लगी है.
हमारे खाने में आमतौर पर कार्बोहाइड्रेट और फैट तो प्रचुर मात्रा में होते हैं, लेकिन प्रोटीन और कैल्शियम जैसे तत्वों की कमी हो जाती है.
ऑस्टियोअर्थराइटिस में जोड़ों के बीच की नर्म परत (कार्टिलेज) के घिस जाने से उनमें दर्द होता है. इससे बचने के लिए वजन को काबू में रखना बहुत जरूरी है.
जोड़ों व घुटनों में दर्द होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं. डॉक्टर की सलाह का पालन करें और नियमित रूप से दवा लें. दवा का असर होने में समय लग सकता है,
इस बीमारी की एडवांस स्टेज में मरीज चलने-फिरने में पूरी तरह से अक्षम हो जाता है. कई बार तो पीड़ित के लिए अपने पैरों पर खड़े रहना भी मुश्किल हो जाता है. इसलिए इस बीमारी की अनदेखी नहीं करनी चाहिए.
वैसे तो शुरुआती दौर में अर्थराइटिस का ट्रीटमेंट लेकर एडवांस स्टेज को आने से रोका जा सकता है. लेकिन यदि किसी कारणवश मरीज के घुटने या कूल्हों के जोड़ के स्थिति बहुत खराब हो चुकी हैं तो सर्जरी का विकल्प भी उपलब्ध है.
ठंड के मौसम में मांसपेशियों में सिकुड़न की समस्या बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति में अपने जोड़ों का खास ख्याल रखना चाहिए. रोजाना पैदल चलना भी एक अच्छा व्यायाम है.
ऑस्टियोअर्थराइटिस में घुटने और कूल्हे के जोड़ सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं.
अर्थराइटिस होने पर जोड़ों में दर्द और सूजन होती है.
बढ़ती उम्र के कारण बुजुर्गों में ऑस्टियोअर्थराइटिस की समस्या आम है, लेकिन अर्थराइटिस का एक और प्रकार है जिसे रूमेटाइड अर्थराइटिस भी कहा जाता है. ये बीमारी युवाओं को भी हो सकती है.
अर्थराइटिस के उपचार की प्रक्रिया में बीमारी का जल्द diagnose होना और इलाज समय पर शुरू होना काफी महत्वपूर्ण है. हालांकि इस बीमारी को रिवर्ट तो नहीं किया जा सकता,
शुरुआती स्टेज में बीमारी की अनदेखी न करें. अगर समय पर इलाज शुरू कर दिया तो डॉक्टर साधारण दवाइयों के जरिए ही मरीज को ठीक कर सकते हैं.
अब तक ऑस्टियोअर्थराइटिस को बुजुर्गों में होने बीमारी के तौर पर देखा जाता था.
अर्थराइटिस की समस्या कितनी आम होती जा रही है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 50 की उम्र पार कर चुका हर दूसरा व्यक्ति इससे पीड़ित है.
वैसे तो अर्थराइटिस होने की संभावना बुजुर्गों में अधिक होती है. लेकिन यदि कोई व्यक्ति पहले से ही डायबिटीज या थायराइड की बीमारी से जूझ रहा हो तो उसे अर्थराइटिस होने का खतरा अधिक होता है.
रूमेटाइड अर्थराइटिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है. इसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही जोड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगती है.
अर्थराइटिस या जोड़ों का दर्द मरीज के पूरे शरीर को प्रभावित करता है. इसकी वजह से हार्ट की समस्याएं और पाचन संबंधी परेशानियां भी बढ़ सकती हैं.
अर्थराइटिस चाहे किसी भी प्रकार का हो शुरुआती दौर में यदि इसका पता चल जाए और समय पर इलाज शुरू हो जाए तो बेहतर होता है.