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सोवा रिग्पा (Sowa Rigpa)

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समय के साथ-साथ हर चीज ने आधुनिक रूप लिया है, लेकिन फिर भी कई चीजें हैं जो प्राचीन काल से आज तक भी मानव जीवन में वही महत्व रखती हैं। दुनिया के कई अलग-अलग हिस्सों से अनेक प्रकार की चिकित्सा पद्धतियां विकसित हुई, जिनमें से कुछ आज भी हमारी जीवनशैली काफी महत्व रखती है। आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी की तरह ही सोवा रिग्पा भी ऐसी प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में से एक है, जिसका प्रभाव आज भी कायम है। सोवा रिग्पा तिब्बत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति है। इसे भी दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धतियों में गिना जाता है, जो आज भी पूरी तरह से सक्रिय है। सोवा रिग्पा प्रमुख रूप से चार चिकित्सीय तंत्रों (rGyudbZhi) पर आधारित है। सोवा रिग्पा को आमची के नाम से भी जाना जाता है और कई वेस्टर्न देशों में इसे टिब्बटन मेडिसिन सिस्टम (tibetan medicine system) के नाम से भी जाना जाता है। यह चिकित्सा प्रणाली न सिर्फ शारीरिक रोगों का निवारण करती है, बल्कि मानसिक कई गंभीर मानसिक समस्याओं को दूर करती है। वहीं सोवा रिग्पा के बारे में यह भी मान्यताएं हैं कि इसकी मदद से कई लाइलाज बीमारियों का जड़ से इलाज किया जा सकता है। हालांकि, अभी इस बारे में आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं मिल पाई है और वर्तमान में भी इसकी क्षमता को साइड इफेक्ट्स की जांच करने के लिए टेस्ट किए जा रहे है।

सोवा रिग्पा क्या है

सोवा रिग्पा को आमची (या आमचि) और तिब्बत चिकित्सा प्रणाली के रूप में भी जाना जाता है। यह सबसे प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में से एक है और वर्तमान में भी इसका उपयोग भारत के तिब्बत, भूटान, चीन और भारत के कई हिस्सों में किया जाता है। सोवा रिग्पा में रोगों का इलाज आमतौर पर इसके पांच तत्वों सा (sa), चू (chu), मे (me), लंग (lung) और नम-खा (nam-kha) पर आधारित है। इस चिकित्सा प्रणाली में रोगों का इलाज उसकी नैदानिक प्रक्रिया को पूरा करने के बाद किया जाता है और इस प्रक्रिया के दौरान रोग के कारण व प्रकार का पता लगाया जाता है और साथ परिणाम के अनुसार ही इलाज किया जाता है।

सोवा रिग्पा का इतिहास

सोवा रिग्पा की जड़ें प्राचीन तिब्बत, भूटान, मंगोलिया, नेपाल और चीन व भारत के कुछ हिमालयी हिस्सों से जुड़े मिलते हैं। हालांकि, इसका जन्म कब और किस जगह पर हुआ है इस बारे में सटीक जानकारी अभी तक मिल नहीं पाई है। लेकिन कुछ जानकारों के अनुसार यह लगभग 2500 साल पुरानी सभ्यता है और 8वीं शताब्दी के आसपास इसका हिमालयी क्षेत्रों में प्रचलन होने लगा था। इसके जन्म स्थान की बात करें तो, कुछ अध्ययनकर्ता मानते हैं कि इसका जन्म भारत के हिमालयी क्षेत्र में हुआ, तो कुछ इसका जन्म चीन से जुड़ा मानते हैं। वहीं कुछ अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि सोवा रिग्पा का जन्म तिब्बत में ही हुआ था। इंटरनेट पर मिली जानकारियों के अनुसार तिब्बत के युथोग योंटेन गोंपो (Yuthog Yonten Gonpo) को सोवा रिग्पा के संस्थापक के रूप में जाना जाता है।

आयुर्वेद से रिश्ता

सोवा रिग्पा वैसे तो अपने आप में खुद एक प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है और यह अपने ही सिद्धातों पर काम करती है। लेकिन देखा गया है कि इसके ज्यादातर सिद्धांत और अभ्यास आयुर्वेद से मेल खाते हैं। तिब्बत में आयुर्वेद का प्रभाव सबसे पहले तीसरी शताब्दी में देखा गया था, लेकिन बौद्ध धर्म के प्रभाव को देखते हुए आयुर्वेद का ज्यादा प्रचलन सातवीं शताब्दी में हो पाया था। तिब्बत में बौद्ध धर्म के कारण भारतीय कला, संस्कृति और चिकित्सा साहित्य का प्रचलन उन्नीसवीं शताब्दी तक रहा।

सोवा रिग्पा के सिद्धांत

सोवा रिग्पा प्रमुख रूप से जंग-वा-न्गा और न्गेपा-सुम के सिद्धांतों पर आधारित है। जंग-वा-न्गा को संस्कृत में पंचमहाभूत और न्गेपा-सुम को त्रिदोष के नाम से जाना जाता है। सोवा रिग्पा के सिद्धांतों के अनुसार ब्रह्मांड की सभी जीवित और निर्जीव चीजें जंग-वा-न्गा के पांच तत्वों यानी सा, चू, मे, लंग और नम-खा (Sa, Chu, Me, Lung and Nam-kha) से मिलकर बने हैं। संस्कृत में सा, चू, मे, लंग और नम-खा का मतलब पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश है। इन सिद्धांतों के आधार पर ही सोवा रिग्पा के फिजियोलॉजी, पैथोलॉजी और फार्मोकोलॉजी स्थापित की जाती है। अर्थात इन सिद्धांतों के माध्यम से ही रोग की जांच, इलाज और औषधियों का चयन किया जाता है। इस प्राचीन चिकित्सा प्रणाली के अनुसार अगर किसी व्यक्ति के शरीर में इन पांचों तत्वों में से किसी एक का भी संतुलन खराब (कम या ज्यादा) हो गया है, तो ऐसे में बीमारी विकसित होती है। सोवा रिग्पा के सिद्धांतों को निम्न पांच बिंदुओं की मदद से समझा जा सकता है -

  1. शरीर में रोग का स्थान
  2. मारक दवा (एंटीडोट)
  3. मारक दवा के रूप उपचार विधि
  4. रोग निवारण करने वाली दवाएं
  5. औषधी बनाने व इस्तेमाल करने की विद्या

सोवा रिग्पा में रोग की रोकथाम

सोवा रिग्पा में ऐसे नुस्खे तैयार किए गए हैं, जिनकी मदद से व्यक्ति घर पर ही अपनी समस्याओं का इलाज कर सकता है। इसके कई नुस्खे विशेष रूप से ऐसी सामग्री और विधियों के देखकर तैयार किए गए हैं, जिन्हें आसानी से घर पर ही तैयार किया जा सकता है। विशेष रूप से सांस संबंधी बीमारियों का घर पर इलाज करने के लिए सोवा रिग्पा चिकित्सा पद्धति की मदद ली जाती है। भारतीय रसोई में ऐसे लगभग सभी प्रकार की सामग्री पाई जाती है, जिनका इस्तेमाल सोवा रिग्पा में सांस संबंधी बीमारियों समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज करने की दवाएं बनाने के लिए किया जाता है। हालांकि, सोवा रिग्पा के घरेलू नुस्खों पर समय-समय पर कुछ अध्ययन भी चलते हैं, जिनमें कुछ परिणाम सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक भी पाए गए हैं।

सोवा रिग्पा में रोग निदान

सोवा रिग्पा भले ही विश्व की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में से एक हो, लेकिन इसके रोग निदान की कार्य-शैली शुरुआत से ही प्रभावी रही है। सोवा रिग्पा चिकित्सा प्रणाली में रोग का पता लगाने और उसके लिए उचित इलाज का चयन करने के लिए जिन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है, उनका इस्तेमाल वर्तमान में भी कई मेडिसिन सिस्टम में किया जाता है। इसमें मरीज की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति का आकलन करते हुए उसकी जीभ, नाड़ी और मल-मूत्र की जांच की जाती है।

सोवा रिग्पा में इलाज

सोवा रिग्पा में में रोग का उपचार भी काफी हद तक एलोपैथी की तरह रोग निदान पर निर्भर करता है। रोग के निदान के अनुसार ही इलाज डिजाइन किया जाता है, जिसमें जीवनशैली में बदलाव (आदतें व परहेज), प्राकृतिक औषधीय दवाएं और थेरेपी आदि शामिल हैं। सोवा रिग्पा में इस्तेमाल की जाने वाली ऐसी कई थेरेपी हैं, जिनका इस्तेमाल आज भी काफी प्रभावी है। इनमें थेरेपी में आमतौर पर कून्ये मसाज, एक्यूपंक्चर, मॉक्सिबस्चिन, कंप्रैस (सिकाई), औषधि स्नान और अन्य कई थेरेपी शामिल हैं। इसके अलावा सोवा रिग्पा में आध्यात्मिक उपचार तकनीकें भी शामिल हैं, जिनमें योगासन, मंत्र उच्चारण, श्वसन प्रक्रियाएं और ध्यान लगाना (मेडिटेशन) आदि का भी अभ्यास किया जाता है, जो शरीर का संतुलन बनाए रखने और मन व दिमाग को शांति देने का काम करती हैं। सोवा रिग्पा के दौरान किसी बीमारी का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाले दवाएं व आहार भी इस चिकित्सा पद्धति के पांच तत्वों पर आधारित होती है। शरीर में ये तत्व न्गेपा-सुम (त्रिदोष) लुस-सुंग-दुन (सप्त धातु) और द्री-मा-सुम (त्रिमाला) के रूप में मौजूद हैं। सोवा रिग्पा में उपयोग की जाने वाली दवाएं व सिरप प्रमुख रूप से रो-दुग (शस्त-रस), नुस-पा (वीर्य), योन्तन (गुण) और ज्हू-जेस (विपाक) के रूप में होती हैं। सोवा रिग्पा का यह उपचार सिद्धांत दर्शाता है, कि चिकित्सक अपने ज्ञान और कौशल के आधार पर इन तत्वों का उपयोग करके हुए या इन्हें ध्यान में रखते हुए रोग निवारण करेगा।

सोवा रिग्पा के साइड इफेक्ट्स

सोवा रिग्पा चिकित्सा प्रणाली से जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि सोवा रिग्पा पूरी तरह से प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और शरीर अनुकूलित प्रक्रियाओं पर आधारित है और शरीर पर इसका विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। हालांकि, मॉडर्न मेडिसिन सिस्टम के अनुसार सोवा रिग्पा, आयुर्वेद और सिद्ध जैसी चिकित्सा पद्धतियों में कई ऐसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है, जो रक्त के सामान्य संतुलन को बिगाड़ सकता है। हालांकि, अभी तक इस बात की भी पुष्टि नहीं की गई है, कि सोवा रिग्पा चिकित्सा लेने से स्वास्थ्य पर कौन से विपरीत प्रभाव पड़ सकते हैं। इस चिकित्सा प्रणाली से क्या संभावित साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, इस बारे में अध्ययन किए जा रहे हैं।

भारत में सोवा रिग्पा का महत्व

भारत के हिमालयी क्षेत्रों से सोवा रिग्पा का इतिहास जुड़ा है। आज भी भारत में ऐसी कई जगह पाई जाती हैं, जहां पर सोवा रिग्पा की प्राचीन जड़ें मिलती हैं। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में भारत में सोवा रिग्पा का महत्व काफी बढ़ा है। भारत के कई हिस्सों में शैक्षणिक संस्थानों, चिकित्सालयों, अस्पतालों और फार्मेसियों में आधुनिक और पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए इसे अपनाया जाने लगा है। धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) और लद्दाख में सोवा रिग्पा के संस्थानों का मुख्य केंद्र हैं। दरअसल, भारत में आश्रय लेने के बाद दलाई लामा जहां उन्होंने इस तिब्बती चिकित्सा पद्धति के संस्थान की स्थापना की। धर्मशाला में तिब्बती चिकित्सा परिषद है, जो सोवा-रिग्पा के चिकित्सा अभ्यास को विनियमित करता है और इस पद्थति से जुड़ी अन्य कार्य प्रक्रियाओं को देखता है। हालांकि, भारत की तरह चीन को भी सोवा रिग्पा पर आधिकारिक रूप से अपना हक जताते हुए देखा गया है।

जड़ से रोगों का इलाज

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत के हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 50 से 60 फीसद लोग आज भी अपनी सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं और बीमारियों के लिए इस प्राचीन चिकित्सा प्रणाली पर निर्भर हैं। कुछ सोवा रिग्पा संस्थानों से जुड़े चिकित्सकों और अभ्यायसकर्ताओं के अनुसार, यह (सोवा रिग्पा) कई स्वास्थ्य समस्याओं का जड़ से इलाज करने की क्षमता रखती है। वहीं कुछ रिपोर्ट्स में के अनुसार सोवा-रिग्पा की मदद से लाइलाज बीमारियों का इलाज भी किया जा सकता है। हालांकि, अभी तक इस बारे में आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं मिली है और इस पर अभी भी रिसर्च चल रहे हैं।

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