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सिद्ध (Sidhha in Hindi)

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सिद्ध चिकित्सा पद्धति का जन्म हजारों साल पहले भारत में हुआ था और आज भी दक्षिण भारत में यह काफी प्रसिद्ध है। सिद्ध चिकित्सा प्रणाली के बारे में कहा जाता है कि यह शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा का भी उपचार करती है।

सिद्ध चिकित्सा पद्धति क्या है

सिद्ध चिकित्सा पद्धति एक प्राचीन उपचार प्रणाली है, जो दक्षिण भारत में काफी प्रचलित है। यह दुनियाभर की सबसे पुरानी चिकित्सा प्रणालियों में एक है जो केवल शरीर ही नहीं बल्कि मन और आत्मा का इलाज भी करती है। इसके नाम की उत्पत्ति तमिल भाषा के शब्द “सिद्धी” से हुई जिसका मतलब “प्रवीणता” या “परम” होता है। इस उपचार प्रणाली का जन्म भी भारत में ही हुआ था और पौराणिक लेखों में इसकी जड़ें तमिल प्राचीन सभ्यता से जुड़ी मिलती हैं। कुछ प्रचलित मान्यताओं के अनुसार सिद्ध चिकित्सा पद्धति को मूल रूप से दिव्य माना गया है। ऋषि अगस्त्य को सिद्ध चिकित्सा पद्धति का जनक माना जाता है, जिन्हें इससे जुड़ी कई किताबें भी लिखी। ठीक आयुर्वेद की तरह ही सिद्ध चिकित्सा पद्धति में भी वात, पित्त और कफ दोष माने गए हैं। इस चिकित्सा प्रणाली के अनुसार मानव ब्रहमाण्ड का एक सूक्ष्म रूप है, जो 5 मूल तत्वों से मिलकर बना है। इन तत्वों को पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और अंतरिक्ष के नाम से जाना जाता है।

सिद्ध चिकित्सा पद्धति का इतिहास

सिद्ध चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद से भी पुरानी उपचार प्रणाली है। इस प्राचीन चिकित्सा पद्धति की शुरुआत का पता लगाना थोड़ा मुश्किल है। इसकी उत्पत्ति का श्रेय किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि स्वयं भगवान को दिया जाता है। कुछ पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने खुद सिद्ध चिकित्सा का ज्ञान देवी पार्वती को दिया था। देवी पार्वती ने यह ज्ञान नंदी को दिया और नंदी ने आगे 18 सिद्धरों को यह चिकित्सा ज्ञान दिया। सिद्धरों द्वारा लिखे गए मूल ग्रंथों से यह प्राचीन ज्ञान समाज तक पहुंचा और इस प्रकार सिद्ध चिकित्सा पद्धति की उत्पत्ति हुई। अगस्त्य ऋषि को इन 18 सिद्धरों में से सबसे प्रमुख माना गया है और उनके द्वारा लिखी गई मानक पुस्तकों को वर्तमान में भी सिद्ध चिकित्सा पद्धति में इस्तेमाल किया जाता है। इस चिकित्सा प्रणाली की कई प्राचीन उपचार तकनीकों को आज भी दुनियाभर में इस्तेमाल किया जाता है, जो इसकी प्रभावशीलता दर्शाता है।

सिद्ध चिकित्सा पद्धति के सिद्धांत

सिद्ध चिकित्सा पद्धति में मानव को ब्रहमाण्ड के एक छोटे से रूप में देखा जाता है, जिसका मतलब है कि मनुष्य अपने आप में एक सूक्ष्म ब्रहमाण्ड है। वहीं ब्रहमाण्ड को एक विशालकाय विश्व के रूप में देखा जाता है। सिद्ध चिकित्सा पद्धति में माना जाता है कि मानव समेत समस्त ब्रहमाण्ड पांच मौलिक तत्वों से मिलकर बना है। इन पांच तत्वों को “पंचभूत” भी कहा जाता है, जिन्हें पृथ्वी, पानी, अग्नि, हवा और अंतरिक्ष के नाम से जाना जाता है। सिद्ध चिकित्सा विज्ञान की पंचीकरणम सिद्धांत में यह भी दर्शाया जाता है कि इन पांचों तत्वों का गठन किस प्रकार हुआ और इनसे जगत की हर वस्तु व जीव किस प्रकार बने। इस सिद्धांत के अनुसार शरीर, मस्तिष्क और प्राणों का एक उचित संतुलन जरूरी है और यह संतुलन बिगड़ने पर व्यक्ति बीमार पड़ जाता है। ठीक उसी प्रकार व्यक्ति के बीमार पड़ने पर सिद्ध चिकित्सा पद्धति में शारीरिक संतुलन फिर से बनाने पर ध्यान दिया जाता है और इसी तकनीक की मदद से रोग का इलाज किया जाता है। इस समग्र चिकित्सा विज्ञान की मूल अवधारणा यह है कि कुल 96 प्रकार के तत्वज्ञान मौजूद हैं और इनके मिश्रण से ही मानव शरीर बनता है। 96 सिद्धांतों में प्रत्येक मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक पहलू शामिल हैं।

सिद्ध चिकित्सा प्रणाली में रोग निदान

सिद्ध चिकित्सा पद्धति में रोग का निदान करने के लिए एक विस्तृत तरीके से अलग-अलग स्थितियों की जांच की जाती हैं। इस दौरान आमतौर पर स्वास्थ्य स्थिति, शारीरिक संरचना, मानसिक संरचना, आयु, लिंग, वंश, आहार, भूख, आदतें, व्यक्तित्व, पर्यावरण, मौसम और निवास स्थान जैसे कारकों पर विचार किए जाते हैं। रोग व उसके कारण का पता लगाना और इसके बाद मरीज के लिए उचित इलाज निर्धारित करना सिद्ध चिकित्सा पद्धति के रोग निदान का मुख्य हिस्सा है। नाड़ी, पेशाब, आंख, आवाज, शरीर व जीभ का रंग और पाचन प्रणाली की स्थिति की गहनता से जांच करके रोग के कारणों का पता लगाया जाता है। उदाहरण के लिए पेशाब के रंग, बदबू, घनत्व और मात्रा की जांच करके ही रोग व उसके कारण का पता लगाया जाता है। इन सभी कारकों की एक साथ जांच करके रोग निदान में गलती होने की संभावना काफी कम हो जाती है। सिद्ध चिकित्सा पद्धति में रोग निदान करने के लिए नाड़ी विधि का इस्तेमाल भी किया जाता है, जिसे वर्तमान में पल्स रीडिंग मेथड भी कहा जाता है। नाड़ी विधि की मदद से शरीर के अंदर होने वाली हलचल का पता लगाया जाता है और इससे स्वास्थ्य समस्याओं की पुष्टि करने में मदद मिलती है। नाड़ी विधि को शरीर के अलग-अलग 10 हिस्सों में किया जा सकता है। नाड़ी विधि आमतौर पर पुरुषों में दाएं हाथ और महिलाओं में बाएं हाथ में की जाती है। सिद्ध चिकित्सा पद्धति में नाड़ी की जांच आमतौर पर तर्जनी, मध्यमा और अनामिका उंगलियों से की जाती है, जिसकी मदद से मरीज में वात, पित्त और कफ तीनों की एक साथ जांच की जाती है। सिद्ध चिकित्सा प्रणाली के अनुसार कुल 4448 प्रकार के रोग व स्वास्थ्य बीमारियां हैं और 64 प्रकार की औषधियां हैं। इन औषधियों में 32 प्रकार की आंतरिक और 32 प्रकार की बाहरी दवाएं हैं। रोग निदान से मिले परिणामों के अनुसार इनमें से किसी एक या अधिक दवाओं का मिश्रण मरीज को दिया जाता है।

सिद्ध चिकित्सा पद्धति में रोगों से बचाव

सिद्ध चिकित्सा पद्धति की सबसे मुख्य विशेषता यह है कि यह इसमें रोग के इलाज से ज्यादा उसकी रोकथाम पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यह सिद्ध चिकित्सा पद्धति के साहित्यों में लिखी “पिनी अनुगा विधि” से प्रमाणित होता है, जिसका मतलब है कि रोगों को दूर रखने के नियम। सिद्ध चिकित्सा प्रणाली के संस्थापकों ने रोगों को दूर रखने के लिए स्वस्थ जीवन के कुछ मूलभूत दिशानिर्देशों का पालन करने से संबंधित बातों को अपनी पुस्तकों में लिखा था, जिनका सिद्ध में आजतक भी पालन किया जाता है। इन पुस्तकों में आमतौर पर निश्चित कारकों को ध्यान में रखते हुए कुछ नियमों का पालन करने की सलाह दी जाती है, जिनमें आमतौर पर आहार संबंधी आदतें, मौसम में होने वाले बदलाव और व्यक्ति एक आसपास की वस्तुओं से संबंधी जानकारियां दी जाती हैं। इसके अलावा सिद्ध चिकित्सा पद्धति में रोगों की रोकथाम से संबंधित निम्न जानकारियां दी जाती हैं जैसे -

  • थिनै/नीलम ओझुक्कम (निवास स्थान के अनुसार अनुशासन)
  • काला ओझुक्कम (मौसम से जुड़े अनुशासन
  • उनावु (आहार संबंधी जानकारियां)
  • नाल ओझुक्कम (रोजाना के आहार नियम)
ऊपरोक्त बताई गई इन सभी दिशानिर्देशों को आज भी सिद्ध चिकित्सा पद्धति में इस्तेमाल किया जाता है।

सिद्ध चिकित्सा पद्धति में इलाज

सिद्ध चिकित्सा में उपचार का उद्देश्य तीन मनोवृत्तियों और सात शारीरिक घटकों (उदल थथुक्कल) तत्वों को बनाए रखना है। इसलिए, रोगग्रस्त स्थिति में मनोवृत्ति के संतुलन को बनाए रखने के लिए उचित दवाएं लेना, पोषण युक्त आहार और रोजाना आहार के नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। इस प्रकार सिद्ध चिकित्सा पद्धति में एक अनोखे तरीके से लक्षणों का निवारण करने की बजाय रोग के मूल कारणों को खत्म करना है, ताकि रोग का जड़ से इलाज किया जा सके। उदाहरण के तौर पर बुखार का इलाज करने के लिए मरीज को तापमान कम करने की दवाओं से पहले उसे प्रतिरक्षा प्रणाली बढ़ाने की दवाएं दी जाती हैं। इतना ही नहीं बुखार होने पर सिद्ध चिकित्सक संक्रमण रोकने का उपचार भी शुरू कर देते हैं, ताकि संक्रमण होने से पहले ही उसकी रोकथाम की जा सके। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि बुखार होने पर संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है और सिद्ध चिकित्सा पद्धति में इलाज से अधिक रोकथाम को महत्व दिया जाता है। सिद्ध चिकित्सा पद्धति प्रणाली दवाओं को तीन अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत करती है, जिन्हें मूलीगई या थावरम, थातु और जीवा वागुप्पु के नाम से जाना जाता है। मूलिगाई या थावरम में आमतौर पर हर्बल औषधियां आती हैं, थातु में धातु व खनिज दवाएं और जीवा वागुप्पु में जानवरों के उत्पाद आते हैं। सिद्ध चिकित्सा में रोगों का इलाज एक प्रणालीगत तरीके से किया जाता है, जिसमें सबसे पहले हर्बल औषधियों का इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें तरल, चूर्ण, लेप या वटी (टेबलेट) के रूप में लिया जाता है। यदि इससे रोग की स्थिति में कोई सुधार नहीं आता है, तो आवश्यकतानुसार हर्बल दवाओं के साथ खनिज या जानवरों से प्राप्त दवाओं को मिलाकर मरीज को दिया जाता है। यदि इलाज प्रक्रिया की बात की जाए तो सिद्ध चिकित्सा पद्धति में इसे तीन व्यापक प्रकारों में बांटा गया है, जिन्हें देव मरुथुवं, मनीडा मरुथुवं और असुर मरुथुवं के नाम से जाना जाता है। देव मरुथुवं (दिव्य विधि) - इसके अंतर्गत धातुओं और खनिजों से बनी दवाएं आती हैं। देव मरुथुवं की औषधियों की एक छोटी सी खुराक लंबे समय से हुई बीमारियों से भी तुरंत राहत प्रदान करती है। सिद्ध चिकित्सा पद्धति में इन दवाओं को काफी शक्तिशाली समझा गया है और इन्हें जीवनभर के लिए सरंक्षित किया जा सकता है। देव मरुथुवं दवाओं में आमतौर पर निम्न को शामिल किया जाता है -

  • परपम (बारिक और सफेद रंग की दवाएं)
  • चेंदूरम (बारीक और लाल रंग की दवाएं)
  • चुन्नम (परपम और चेंदूरम से अधिक शक्तिशाली दवाएं)
  • मेझुगु (मोम जैसी दिखने वाली दवाएं)
  • पथंगम (पथंगा करुवी नामक सामग्री से बनी दवाएं)
  • साथू (खनिज व पारा आदि से तैयार)
  • कलंगु (पारा और अन्य खनिजों से तैयार)
  • कट्टू (अटूट व कठोर पदार्थों से निर्मित)
  • उरुक्कू (मर्क्यूरिक आर्सेनिक, धातु, कट्टू आदि से निर्मित)
  • करपम (पत्ते, जड़, धात्विक ऑक्साइड आदि सी औषधियां)
  • थीनीर (आसवन विधि से तैयार दवाएं)
मनीडा मरुथुवं (तर्कसंगत विधि) - इस श्रेणी में हर्बल दवाएं शामिल हैं, जिनका जीवनकाल निश्चित रूप से कम होता है। हालांकि, रोग व स्वास्थ्य स्थितियों के अनुसार इनका जीवनकाल कम हो सकता है। मनीडा मरुथुवं दवाओं को दो श्रेणियों में बांटा गया है, जिन्हें आंतरिक व बाहरी दवाएं कहा जाता है। इनमें मुख्य रूप से निम्न शामिल हैं -
  • आंतरिक दवाएं - मनीका मरुथवं की इन दवाओं में आमतौर पर वे औषधियां शमिल होती हैं, जिनका सेवन किया जाता है। इनमें मुख्यत: निम्न शामिल हैं -
    • चारू (रस)
    • सुरासम (निकाले गए रस को उबालना)
    • कुडिनीर (काढ़ा बनाना)
    • करकम (लेप व मलम के रूप में बनाई गई दवाएं)
    • उत्कली (ऊपर से सूखी और अंदर से मलम की तरह बनाई गई दवाएं)
    • चूर्ण (दवाओं से बने पाउडर)
    • पिट्टू (भाप विधि से तैयार दवाएं)
    • वेन्नई (मक्खन या मोम जैसी दवाएं)
    • मनापागु (सिरप जैसी दवाएं)
    • नेई (घी जैसी दिखने वाली दवाएं)
    • एन्नई (तेल जैसी दवाएं)
    • मथिराई (टेबलेट के रूप में दवाएं)
  • बाहरी दवाएं - बाहरी दवाओं में अक्सर वे औषधियां शामिल हैं, जिन्हें खाने की बजाय शरीर पर लगाया जाता है जैसे लेप, मलम व क्रीम आदि। मनीडा मरुथुवं की बाहरी औषधियां निम्न हैं -
    • वेधु (भाप थेरेपी)
    • पत्रु (रोग ग्रस्त हिस्से पर लेप के रूप में लगाई जाने वाली दवाएं)
    • ओट्टरदम (सिकाई विधि)
    • पूचु (विशेष रस या तेल त्वचा पर लगाना)
    • कट्टू (पट्टी बांधने की विधि)
    • कलिकम (आंख में डालने की विधि)
    • थोक्कनम (विशेष शारीरिक क्रियाएं)
    • माई (अंजनाक्कल से बनी दवाएं)
    • नासियम (नाक में डालने की दवाएं)
    • नासिकापर्णम (नाक में डालने का पाउडर)
असुर मरुथुवं (शल्य चिकित्सा विधि)- यह सिद्ध चिकित्सा पद्धति की सर्जिकल प्रोसीजर है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर तब किया जाता है जब दवाओं से बीमारी का इलाज न हो पाए। असुर मरुथुवं आमतौर पर मुख्य रूप से तीन प्रकार की हैं, जिन्हें अरुवई, अग्नि और करम कहा जाता है। ये विधियां कुछ इस प्रकार हैं -
  • अरुवई - इसमें प्रभावित हिस्से को काटने, छांटने, रक्त निकालने, जोंक चिपकाने, अंदरुनी हिस्से की जांच करने और प्रभावित हिस्से में दवायुक्त कपड़ा या बत्ती डालने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। इसके अलावा हड्डी जोड़ने जैसी प्रक्रियाएं भी अरुवई में की जाती हैं।
  • अग्नि - में आमतौर पर प्रभावित हिस्से को आंच से संपर्क कराया जाता है। इमें मुख्य रूप से दागना, भाप देना, सिकाई करना और धूनी देना आदि शामिल है।
  • करम - इस विधि में प्रभावित हिस्से को दाहक या क्षारिय दवाओं के संपर्क में लाया जाता है, जैसे दवा का लेप लगाना, औषधिय पाउडर छिड़कना और अन्य दवाएं लगाना आधि शामिल है।
जैसा कि हम आपको ऊपर बता चुके हैं, कि सिद्ध चिकित्सा पद्धति में इलाज से अधिक रोकथाम को महत्व दिया जाता है। हालांकि, फिर भी ऐसे कई प्रमुख रोग हैं, जिनका इलाज सिद्ध चिकित्सा पद्धति में आज भी काफी प्रचलित है। इन रोगों मे आमतौर पर निम्न शामिल हैं -
  • डेंगू बुखार
  • आर्थराइटिस
  • साइनसाइटिस
  • स्वाइन फ्लू
  • ब्रोंकाई का अस्थमा
  • एन्सेफलाइटिस
  • डायबिटीज मेलिटस
  • पीलिया
  • डिमेंशिया
  • हाई ब्लड प्रेशर
  • लीवर के रोग
  • यूरोलिथियासिस

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