वर्ल्ड सिजोफ्रेनिया डे 2019 : सिजोफ्रेनिया के बारे में पांच मिथक और तथ्य जो आपको जरूर जानना चाहिए
इस मानसिक बीमारी को लेकर भारत में आज भी कई मिथक मौजूद हैं, जिन्हें लोग सच मान लेते हैं। सिजोफ्रेनिया के बारे में कुछ अधिक सामान्य मिथक और भ्रांतियां इस प्रकार हैं, जिसे आपको भी जरूर जानना चाहिए...
हर साल 24 मई को ''विश्व सिजोफ्रेनिया दिवस'' मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य इस मानसिक विकार या बीमारी के बारे में जागरूकता लाना और स्थिति से प्रभावित लोगों के प्रति कलंक या गलत धारणा (stigma) को कम करना है। हालांकि, 1986 से सिजोफ्रेनिया अवेयरनेस वीक (SAW) हर साल मई में ही आयोजित किया जाता है। इस वर्ष, ''सिजोफ्रेनिया अवेयरनेस वीक'' 20 से 27 मई 2019 को सेलिब्रेट किया जा रहा है। एक अध्ययन के अनुसार, मानसिक बीमारियों के सबसे गंभीर विकार सिजोफ्रेनिया का इलाज नहीं होने पर करीब 25-30 प्रतिशत मरीजों के खुदकुशी कर लेने का खतरा होता है।
मनोचिकित्सकों के अनुसार, भारत में विभिन्न डिग्री के सिजोफ्रेनिया से लगभग 40 लाख लोग पीड़ित हैं। सिजोफ्रेनिया के इलाज से वंचित करीब 90 प्रतिशत रोगी भारत जैसे विकासशील देशों में हैं। सिजोफ्रेनिया एक क्रोनिक और गंभीर मानसिक विकार है, जो किसी व्यक्ति की सोचने, महसूस करने और स्पष्ट व्यवहार करने की क्षमता को प्रभावित करती है। इस मानसिक बीमारी को लेकर भारत में आज भी कई मिथक मौजूद हैं, जिन्हें लोग सच मान लेते हैं। सिजोफ्रेनिया के बारे में कुछ अधिक सामान्य मिथक और भ्रांतियां इस प्रकार हैं, जिसे आपको भी जरूर जानना चाहिए...
वर्ल्ड सिजोफ्रेनिया डे 2019 : सिजोफ्रेनिया से जुड़े इन 7 लक्षणों को नजरअंदाज करना ठीक नहीं
मिथक 1 : सिजोफ्रेनिया से पीड़ित मरीज मल्टीप्ल पर्सनालिटी डिसऑर्डर के शिकार होते हैं
सिजोफ्रेनिया से जुड़ी यह सबसे प्रचलित मिथक है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, यह बात गलत है। इसके कई लक्षण होते हैं, लेकिन कहीं कोई भी लक्षण मल्टीप्ल पर्सनालिटी से मिलता-जुलता नहीं है। आमतौर पर यह मिथ लोगों में इसलिए व्याप्त है, क्योंकि “सिजो” का अर्थ होता है स्प्लिट”। इस वजह से लोगों को लगने लगा कि इसके मरीज मल्टीप्ल पर्सनालिटी डिसऑर्डर से ग्रस्त होते हैं।
मिथक 2 : सिजोफ्रेनिया से पीड़ित मरीजों को जीवन भर दवा की जरूरत होती है
एक बार सिजोफ्रेनिया का लेबल लग जाए, तो इसका मतलब ये नहीं होता कि दवाओं का सेवन जीवन के अंतिम क्षणों तक आपको दवाओं का सेवन करना होगा। मनोचिकित्सक विभिन्न कारकों के आधार पर तय करते हैं कि दवाएं कब तक देनी हैं। कई रोगियों को तो धीरे-धीरे दवाओं के सेवन से छुटकारा मिल जाता है और कभी भी इस रोग का कोई भी लक्षण या एपिसोड दोबारा देखने को नहीं मिलता है।
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मिथक 3 : किसी सिजोफ्रेनिया के मरीज से शादी नहीं करनी चाहिए
यह भी बेहद प्रचलित मिथ है। शादी के बाद यदि आपके पार्टनर को सिजोफ्रेनिया या किसी भी तरह का कोई मानिसक विकार हो जाता है, तो क्या आप उसे छोड़ देंगे या आप कहीं दूर चले जाएंगे? यदि आपका जवाब हां है, तो इस तरह की बातों पर कभी भी विश्वास ना करें। अपने पार्टनर के साथ भेदभाव ना करें। यदि इसका इलाज किया जा सकता है और इलाज का असर हो रहा है, वह नॉर्मल जिंदगी जी रहा है, तो सिजोफ्रेनिया ग्रस्त व्यक्ति भी दूसरों की तरह सुखी जीवन जी सकता है। भारतीय मनोचिकित्सकों के अनुसार, लगभग 72 % मरीज इससे रोग से पीड़ित होने के बावजूद अकेले रहते हैं, तो वहीं लगभग 40 % मरीजों ने दोबारा फिर से नौकरी भी ज्वाइन कर ली।
मिथक 4 : सिजोफ्रेनिया के मरीज कमजोर बुद्धि वाले या मूर्ख होते हैं
इस मिथक को पूरी तरह से गलत साबित करने का सबसे बेहतर उदाहरण प्रोफेसर जॉन नैश हैं, जिन्होंने ऑस्कर विजेता फिल्म 'ए ब्यूटीफुल माइंड' से लोगों को प्रेरित किया। वह अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता थे। यदि इलाज न किया गया हो तो सिजोफ्रेनिया संज्ञान (cognition) को प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह किसी को मूर्ख या उसकी बुद्धिमत्ता को कम नहीं करता है। ऐसे लोग भी आपके और हमारे जैसे ही दुनिया के लिए योगदान दे सकते हैं।
मिथक 5 : ऐसे लोग हिंसक और खतरनाक होते हैं
इस मिथ पर भी लोग फिल्मों को देखकर यकीन करने लगे हैं, पर ऐसा नहीं होता है। हिंदी फिल्मों में मानसिक रोग से ग्रस्त मरीज को काफी हिंसक और खतरनाक दिखाया जाता है, जिसके कारण लोग सोचने लगे हैं कि मानसिक रोगी हिंसक और खतरनाक होते हैं। लोकप्रिय फिल्मों और समाचार पत्रों के लेखों के विपरीत, इस स्थिति से पीड़ित अधिकांश व्यक्ति परिवार या बाहरी लोगों द्वारा हिंसा का शिकार होते हैं। सिजोफ्रेनिया के कुछ मरीज वायलेंट हो सकते हैं, लेकिन अधिकतर मरीज नॉन वायलेंट ही होते हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सकों द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार, 13,806 सिजोफ्रेनिया मरीजों में से सिर्फ 23% मरीज ही हिंसक प्रवृति के पाए गए। दरअसल, सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और मानसिक और शारीरिक रूप से असहनीय दर्द से गुजरना पड़ता है।
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