
किशोरी मिश्रा
किशोरी मिश्रा को डिजिटल मीडिया का लगभग 8+ वर्षों का व्यापक अनुभव है, जिसमें स्वास्थ्य (Health) और जीवनशैली ... Read More
Written By: Kishori Mishra | Published : May 16, 2026 3:02 PM IST
Medically Verified By: Dr. Usha Agarwal
Image Credit : ChatGPT
गर्भावस्था में सबसे ज्यादा इंतजार जिस दिन का किया जाता है, वह डिलीवरी डेट होती है। लेकिन कई बार ऐसा देखा जाता है कि तय तारीख निकल जाने के बाद भी लेबर पेन शुरू नहीं होता। ऐसे में ज्यादातर महिलाओं और परिवार वालों के मन में यही सवाल आता है कि आखिर कितने दिन तक इंतजार किया जाना चाहिए और कब अस्पताल में एडमिट हो जाना जरूरी माना जाता है।
इस विषय पर जयपुर स्थित नारायणा हॉस्पिटल की सीनियर कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. उषा अग्रवाल का कहना है कि हर महिला की प्रेग्नेंसी एक जैसी नहीं होती। कई बार बच्चा अनुमानित तारीख से पहले जन्म लेता है और कई बार कुछ दिन बाद भी डिलीवरी सामान्य मानी जाती है। इसलिए केवल तारीख निकल जाना हमेशा खतरे का संकेत नहीं माना जाता, लेकिन लगातार मॉनिटरिंग बहुत जरूरी मानी जाती है।
आमतौर पर प्रेग्नेंसी 40 सप्ताह की मानी जाती है। इसे ही एक्सपेक्टेड डिलीवरी डेट कहा जाता है। लेकिन 37 से 42 सप्ताह के बीच होने वाली डिलीवरी को भी सामान्य माना जाता है।
अगर ड्यू डेट निकल जाती है और मां व बच्चे दोनों की स्थिति सामान्य पाई जाती है, तो डॉक्टर कुछ दिन तक इंतजार करने की सलाह देते हैं। ज्यादातर मामलों में 41 सप्ताह तक निगरानी रखी जाती है। इसके बाद अस्पताल में भर्ती होने या लेबर शुरू करवाने पर विचार किया जाता है।
अगर ड्यू डेट निकलने के बाद भी नीचे बताए गए लक्षण दिखाई देते हैं, तो तुरंत अस्पताल पहुंचना जरूरी माना जाता है-
बच्चे की मूवमेंट कम महसूस होना - अगर बच्चे की हलचल पहले की तुलना में कम महसूस होती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जाता। यह बच्चे तक ऑक्सीजन या पोषण कम पहुंचने का संकेत माना जा सकता है।
पानी की थैली फटना - अगर पानी निकलना शुरू हो जाता है, चाहे दर्द शुरू न भी हुआ हो, तब भी अस्पताल में भर्ती होना जरूरी माना जाता है। लंबे समय तक इंतजार करने से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
ब्लीडिंग होना - हल्की स्पॉटिंग कभी-कभी सामान्य मानी जाती है, लेकिन ज्यादा खून आना खतरे का संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में तुरंत मेडिकल जांच जरूरी मानी जाती है।
हाई ब्लड प्रेशर या शुगर की समस्या - अगर प्रेग्नेंसी के दौरान हाई बीपी, डायबिटीज या कोई दूसरी मेडिकल समस्या पाई जाती है, तो ड्यू डेट निकलने के बाद ज्यादा इंतजार नहीं किया जाता।
लेबर पेन शुरू होना - अगर नियमित अंतराल पर दर्द शुरू होता है, पेट में कसाव महसूस होता है या कमर में लगातार दर्द बना रहता है, तो अस्पताल पहुंचना जरूरी माना जाता है।
डॉक्टर्स के अनुसार, 41 से 42 सप्ताह के बाद कुछ जोखिम बढ़ने लगते हैं। इसलिए समय पर जांच और निगरानी बहुत जरूरी मानी जाती है।
प्लेसेंटा कमजोर पड़ना - समय बढ़ने के साथ प्लेसेंटा बच्चे को सही मात्रा में ऑक्सीजन और पोषण पहुंचाने में कमजोर पड़ सकता है।
बच्चे के वजन का बढ़ना - कुछ मामलों में बच्चा ज्यादा बड़ा हो जाता है, जिससे नॉर्मल डिलीवरी कठिन मानी जाती है और सी सेक्शन की जरूरत पड़ सकती है।
एमनियोटिक फ्लूड कम होना - ड्यू डेट निकलने के बाद गर्भ में पानी की मात्रा कम होने लगती है। इससे बच्चे पर दबाव बढ़ सकता है।
संक्रमण का खतरा - अगर पानी की थैली फटने के बाद लंबे समय तक डिलीवरी नहीं होती, तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
ड्यू डेट निकलने के बाद नियमित चेकअप बहुत जरूरी माना जाता है। इस दौरान डॉक्टर कुछ टेस्ट करवाते हैं-
इन रिपोर्ट्स के आधार पर तय किया जाता है कि इंतजार करना सुरक्षित माना जाता है या डिलीवरी करवाना बेहतर रहता है।
नहीं, हर महिला में लेबर इंड्यूस नहीं किया जाता। अगर मां और बच्चा दोनों स्वस्थ पाए जाते हैं, तो कुछ दिन और इंतजार किया जा सकता है। लेकिन अगर किसी तरह का रिस्क दिखाई देता है, तो दवाइयों या दूसरी प्रक्रियाओं की मदद से लेबर शुरू करवाया जाता है।
Disclaimer : ड्यू डेट निकलना हमेशा चिंता की बात नहीं माना जाता, लेकिन लगातार मेडिकल निगरानी बहुत जरूरी मानी जाती है। सही समय पर अस्पताल में भर्ती होना मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा के लिए सबसे अहम कदम माना जाता है।