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IVF से जुड़े आम मिथक, जिन्हें हर कोई मान लेता है सच

World IVF Day 2026 : 

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Written By: Kishori Mishra | Published : July 23, 2026 12:46 PM IST

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Medically Verified By: Dr. Anjali kumar

World IVF Day 2026 :  IVF को लेकर फैली गलतफहमियां आज भी कई कपल्स के लिए मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव का कारण बनती हैं। कोई कहता है कि IVF से पैदा हुआ बच्चा अपना नहीं होता, तो कोई इसे सिर्फ महिलाओं के इलाज से जोड़कर देखता है। वहीं, कुछ लोगों को लगता है कि IVF कराने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है या इस प्रक्रिया के बाद सामान्य जीवन नहीं जिया जा सकता। जबकि मेडिकल साइंस और एक्सपर्ट की राय इन धारणाओं से बिल्कुल ही अलग है। गुरुग्राम स्थित सीके बिड़ला हॉस्पिटल की ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी डायरेक्टर डॉ. अंजलि कुमार ने IVF से जुड़े ऐसे ही आम मिथकों और उनके पीछे की सच्चाई को विस्तार से समझाया है। आइए लेख में जानते हैं IVF से जुड़े कुछ मिथक और उनकी सच्चाई-

IVF myth and Fact IVF myth and Fact (Image Credit : ChatGPT)

मिथक 1: IVF वाला बच्चा अपना नहीं होता

सच: यह धारणा पूरी तरह गलत है। IVF में सिर्फ फर्टिलाइजेशन (Fertilisation) की प्रक्रिया शरीर के बाहर लैब में होती है। बाकी पूरी प्रेग्नेंसी नैचुरल गर्भधारण की तरह ही आगे बढ़ती है। ज्यादातर मामलों में मां के अंडे और पिता के स्पर्म से ही भ्रूण बनता है, जिसे बाद में मां के गर्भ में रखा जाता है। बच्चे का डीएनए, शक्ल-सूरत और जेनेटिक गुण अपने माता-पिता से ही आते हैं। तकनीक सिर्फ गर्भधारण में मदद करती है, माता-पिता और बच्चे के रिश्ते को नहीं बदलती।

मिथक 2: IVF वाला बच्चा मशीन का बच्चा होता है

सच: यह सिर्फ एक गलतफहमी है। लैब में सिर्फ अंडे और शुक्राणु को मिलाने की प्रक्रिया की जाती है, जो सामान्य रूप से महिला की फैलोपियन ट्यूब में होती है। कुछ दिनों बाद विकसित भ्रूण को गर्भाशय में रखा जाता है, जहां उसका विकास पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से होता है। बच्चे में कोई मशीनी बदलाव नहीं होता। IVF सिर्फ एक मेडिकल तकनीक है, जो गर्भधारण में सहायता करती है।

मिथक 3: IVF से पैदा होने वाले सभी बच्चे पूरी तरह स्वस्थ होते हैं

सच: यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं है। ज्यादातर IVF से जन्मे बच्चे सामान्य गर्भधारण से जन्मे बच्चों की तरह ही स्वस्थ होते हैं। हालांकि कुछ मामलों में समय से पहले जन्म या जन्म के समय कम वजन का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है, खासकर जब एक से ज्यादा भ्रूण ट्रांसफर किए जाएं। यह रिस्क मां की उम्र, स्वास्थ्य और इनफर्टिलिटी के कारण पर भी निर्भर करता है। उचित निगरानी और सिंगल एम्ब्रयो ट्रांसफर जैसी आधुनिक तकनीकों से इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

IVF

मिथक 4: IVF सिर्फ महिलाओं की समस्या का इलाज है

सच: यह एक आम लेकिन गलत धारणा है। बांझपन के करीब आधे मामलों में कारण पुरुषों से जुड़े होते हैं, जैसे- शुक्राणुओं की संख्या कम होना, उनकी गति कम होना या गुणवत्ता में कमी। IVF और ICSI जैसी तकनीकें पुरुष बांझपन के इलाज में भी प्रभावी हैं। इसलिए IVF का निर्णय दोनों पार्टनर की जांच और मेडिकल स्थिति के आधार पर लिया जाता है।

मिथक 5: IVF कराने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है

सच: अब तक हुए बड़े और भरोसेमंद अध्ययनों में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है कि IVF सीधे तौर पर स्तन, ओवरी या गर्भाशय के कैंसर का खतरा बढ़ाता है। शुरुआत में हार्मोन इंजेक्शन को लेकर चिंताएं जरूर थीं, लेकिन लंबे समय तक हुए रिसर्च में इसका संबंध साबित नहीं हुआ। जिन महिलाओं में पहले से PCOS या एंडोमेट्रियोसिस जैसी समस्याएं होती हैं, उनमें कुछ कैंसर का जोखिम पहले से अधिक हो सकता है, लेकिन इसका कारण IVF नहीं बल्कि उनकी मूल बीमारी होती है।

IVF

मिथक 6: IVF के दौरान एक्सरसाइज करना पूरी तरह सुरक्षित है

सच:  यह आधा सच है। IVF के दौरान हल्की शारीरिक गतिविधियां जैसे टहलना या हल्का स्ट्रेचिंग सुरक्षित मानी जाती हैं, लेकिन तेज दौड़ना, जंपिंग या भारी वजन उठाने से बचना चाहिए। ओवरी स्टिमुलेशन के दौरान अंडाशय का आकार बढ़ जाता है, जिससे ओवेरियन टॉर्शन का खतरा बढ़ सकता है। भ्रूण ट्रांसफर के बाद भी डॉक्टर आमतौर पर कुछ दिनों तक हल्की दिनचर्या अपनाने की सलाह देते हैं। इसलिए एक्सरसाइज हमेशा फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट की सलाह के अनुसार ही करनी चाहिए।

Disclaimer : यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी और विशेषज्ञ की राय किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। IVF या प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ा कोई भी निर्णय लेने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार योग्य फर्टिलिटी एक्सपर्ट  की सलाह जरूर लें।