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Written By: Anshumala | Published : June 14, 2018 12:49 PM IST
आजकल सिंगल मदर होना एक आम बात होती जा रही है, खासकर बड़े शहरों में। ऐसे में महिलाओं को काम करने के साथ-साथ खुद की देखभाल के लिए भी समान रूप से ही सक्रिय रहना जरूरी है। शांता आईवीएफ सेंटर, दिल्ली की गायनकोलॉजिस्ट व आईवीएफ एक्सपर्ट डॉक्टर अनुभा सिंह कहती हैं कि यदि आपका किसी कारण से लाइफ पार्टनर से तलाक हो गया है या आप दोनों अलग-अलग रहते हैं और इसी बीच आपको पता चलता है कि आप प्रेगनेंट हैं, तो डाक्टर से तुरंत मिलना चाहिए। कभी भी आपको प्रेगनेंसी के दौरान हॉस्पिटल जाने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में कुछ खास बातें और जरूरी नंबर अपने पास लिखकर रख लें। इसके साथ ही नीचे दी गई कुछ महत्वपूर्ण बातों को भी ध्यान रखना जरूरी है।
डॉ. अनुभा सिंह इन बातों का ख्याल रखने की देती हैं सलाह
सिंगल मदर को प्रेगनेंसी में असावधानी से होने वाली परेशानियां
गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप सबसे बड़ी समस्या है। रेगुलर चेकअप ही सबसे बेहतर उपाय है। उच्च रक्तचाप यदि लंबे समय तक रहे तो शरीर में सूजन, गेस्टेशनल डायबिटीज, आंखों की रोशनी चले जाने जैसी तकलीफों से गुजरना पड़ सकता है। मूत्र में एल्ब्यूमिन प्रोटीन का उपस्थित होना भी इस समय की बड़ी परेशानी है। इससे से शरीर में सूजन तथा गुर्दों पर अकारण अनावश्यक दबाव पड़ता है, जिस से इन अंगों की कार्यप्रणाली भी बाधित हो सकती है। उच्च रक्तचाप, वजन बढ़ना, पेशाब में एल्ब्यूमिन प्रोटीन का उपस्थित होना आदि परेशानियां हों तो इस स्थिति को चिकित्सकीय भाषा में टॉक्सीमिया ऑफ प्रेग्नेंसी कहते हैं। इससे ग्रस्त महिला को स्थिति का पता तब चलता है जब पहनी हुई अंगूठी उंगली में कसने लगती है। गर्भकाल में होने वाली भ्रांतियां इन दिनों गर्भवती महिलाएं अनेकानेक भ्रान्तियों का शिकार हो जाती हैं।
गर्भधारण के बाद क्या करें
-दिन में तीन बार भोजन करें। हर दो घंटे में कुछ हल्का खाते रहें।
-प्रतिदिन आयरन, विटामिन, कैल्शियम और प्रोटीनयुक्त भोजन करें।
-जितना संभव हो आराम करें।
-गर्भावस्था के दौरान आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां सौ दिनों तक जरूर खाएं।
-दो बार टिटनेस का टीका एक महीने के अंतराल पर लगवाएं।
-प्रसव पूर्व तीन बार जाच कराएं।
कब करें हॉस्पिटल या एंबुलेंस को सूचित
-गर्भावस्था के दौरान या फिर प्रसव के दौरान या इसके बाद अत्यधिक रक्तस्राव होने पर।
-सांस लेने में कठिनाई होने पर।
-गर्भावस्था या प्रसव के बाद एक माह के अंदर तेज बुखार होने पर।
-दौरा पड़ने, धुंधला दिखाई देने, सिर दर्द, उल्टियां होने या पूरे शरीर में सूजन होने पर।
-बारह घंटे से अधिक समय तक प्रसव पीड़ा होने पर।
प्रसव (delivery) के समय
-प्रसव अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में हो तो बेहतर है।
-प्रसव के उपरात स्वास्थ्य केन्द्र में 48 घंटे रहना सुनिश्चित करें।
-यदि घर में प्रसव हो तो प्रशिक्षण प्राप्त स्वास्थ्य कर्मचारी यानी ए.एन.एम. और एल.एच.वी. की सहायता लें। ए.एन.एम. के साथ गर्भवती महिला के परिजनों को कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए जैसे स्वच्छ स्थान और वातावरण, स्वच्छ नाल काटने का ब्लेड, स्वच्छ नाभिनाल यानी नाभिनाल में कुछ न लगाएं, नाल बांधने के लिए स्वच्छ धागा व नवजात शिशु के लिए स्वच्छ वस्त्र आदि सुनिश्चित कराएं।
बच्चे की देखभाल यूं करें
-शिशु को स्वच्छ कपड़ों की कई तहों में लपेट कर गर्म रखें।
-जन्म के एक घंटे के भीतर मां का पहला गाढ़ा पीला दूध जरूर पिलाएं। इसके अलावा कोई चीज न पिलाएं और न चटाएं।
-नाल को गंदा व गीला न होने दें।
-बच्चे को बीमार लोगों से दूर रखें और उसे साफ हाथों से छुएं।
-आंखों में काजल व शरीर में तेल आदि की मालिश न करें।
-जन्म के समय शिशु का वजन करवाएं।
-बच्चे को तीन दिन के बाद सुबह की हल्की धूप में रखें।
बच्चे को कब ले जाएं हॉस्पिटल
-वजन दो किलो से कम होने पर।
-ठीक से स्तनपान नहीं करने पर।
-बच्चा रोए नहीं या सांस लेने में उसे कठिनाई हो रही हो। सांस तेज चल रही हो या वह कराह रहा हो।
-शरीर नीला पड़ रहा हो। हथेली या तलुआ पीला पड़ रहा हो।
-उसके शरीर को छूने पर जब अधिक गर्म या ठंडा लगे।
-नाल से खून आने पर।
-बार-बार उल्टियां होने पर या पित्त या रक्त के साथ उल्टियां होने पर।
-प्रसव के कुछ समय बाद शिशु को पेशाब या मल न होने पर।
चित्रस्रोत:Shutterstock.