
Also Read
प्रीमैच्योर बर्थ यानी समय से पहले डिलीवरी एक ऐसी स्थिति है जिसमें महिला अपना प्रेग्नेंसी टाइम पूरा नहीं कर पाती हैं और समय से पहले ही बच्चे को जन्म दे देती हैं। आमतौर पर प्रेगनेंसी के 37वें वीक से पहले बच्चे को जन्म देना प्रीमैच्योर डिलीवरी की श्रेणी में आता है। यह मां के साथ ही बच्चे के लिए भी बहुत खतरनाक मानी जाती है। कई बार इससे बच्चे की जान तक को खतरा हो सकता है। करीब 10 प्रतिशत डिलीवरी प्री मैच्योर होती हैं। प्रीमैच्योर डिलीवरी के कई कारण होते हैं। इन कारणों को जानना और कुछ सावधानियां रखना आपके लिए जरूरी है।
प्रीमैच्योर डिलीवरी के पीछे कई कारण होते हैं। इसमें से सबसे प्रमुख है जुड़वां या तीन बच्चों का एक साथ गर्भस्थ होना। कई बार गर्भधारण के बीच छह महीने से कम गैप होने के कारण भी परेशानियां बढ़ने की आशंका रहती है। अगर महिला का कई बार गर्भपात हो चुका है, तो भी समय से पहले डिलीवरी होने की आशंका ज्यादा रहती है। इसके साथ ही यूट्रस में किसी परेशानी, सर्विक्स और प्लेसेंटा प्रिविया में दिक्कत से भी प्रीमैच्योर डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है। बैक्टीरियल वेजिनोसिस भी परेशानी खड़ी कर सकता है। डिलीवरी के दौरान कई महिलाओं का ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है, जिसके कारण भी प्रेगनेंसी में परेशानियां आ सकती हैं। हेल्दी प्रेगनेंसी के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल भी जरूरी है। अगर आप धूम्रपान, शराब का सेवन, नशीली दवाओं आदि का सेवन करती हैं तो प्रीमैच्योर डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है। कई बार मां का वजन कम या ज्यादा होने के कारण भी जटिलताएं बढ़ सकती हैं। अगर गर्भवती मां की उम्र 17 से कम या 40 से ज्यादा है तो भी परेशानी हो सकती है।
1. सांस संबंधी समस्याएं: समय से पहले जन्मे बच्चों में फेफड़ों का विकास पूरी तरह से नहीं होता है, जिसके कारण उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। कई बार उन्हें ऑक्सीजन देनी पड़ती है या वेंटिलेटर पर रखा जाता है।
2. हार्ट डिजीज का खतरा : प्रीमैच्योर बर्थ वाले बच्चों में हृदय संबंधी जटिलताओं का खतरा ज्यादा होता है। पेटेंट डक्टस आर्टेरियोसस और सेप्टल डिफेक्ट इनमें प्रमुख हैं।
3. मस्तिष्क संबंधी परेशानियां : समय से पहले जन्मे बच्चों में सेरेब्रल पाल्सी के साथ ही लर्निंग संबंधी परेशानियां हो सकती हैं।
4. पाचन संबंधी विकार : समय से पहले जन्मे बच्चों को दूध पिलाने या निगलने में कठिनाई हो सकती है। उनका पाचन तंत्र ठीक से विकसित नहीं होने के कारण उन्हें परेशानियां आती हैं।
5. इंफेक्शन का डर : ऐसे बच्चों को इंफेक्शन होने का डर ज्यादा होता है। क्योंकि उनका इम्यूनिटी सिस्टम पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता है।
6. एनीमिया : इन बच्चों को एनीमिया होने का खतरा भी ज्यादा होता है। साथ ही इनमें पीलिया विकसित होने की आशंका भी रहती है।
गर्भावस्था के दौरान ही नहीं उससे पहले भी धूम्रपान न करें। शराब या नशीली दवाओं से दूरी बनाएं। गर्भावस्था के दौरान शराब का सेवन सीमित मात्रा में ही करें। गर्भधारण से पहले अपनी फिटनेस पर ध्यान दें। आपका वजन सामान्य होना चाहिए। डॉक्टर की सलाह के अनुसार प्रोजेस्टेरोन की खुराक लें।