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डिलीवरी के बाद घुटने के दर्द को कैसे दूर करें? Gynecologist ने बताए एकदम आसान तरीके

प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव होते है, जो बाद में ढ़ेरों समस्याओं का कारण बन सकती हैं। डिलीवरी के बाद महिलाओं में घुटनों में दर्द की समस्या बहुत कॉमन है। आज डॉक्टर से इसी परेशानी का इलाज समझ रहे हैं।

डिलीवरी के बाद घुटने के दर्द को कैसे दूर करें? Gynecologist ने बताए एकदम आसान तरीके

Written by Rashmi Upadhyay |Updated : July 24, 2024 3:31 PM IST

Delivery ke baad ghutno mein dard kyon hota hai: प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में हॉर्मोंस का जबरदस्त परिवर्तन होता है जिसे डिलीवरी के बाद नॉर्मल होने में काफी समय लग जाता है। हार्मोन में परिवर्तन और शरीर का वजन बढ़ने के कारण बाद में महिलाओं के जोड़ों और घुटनों में दर्द होने लगता है। कुछ महिलाओं को ये इतना ज्यादा होता है कि अपनी और अपने बच्चे की देखभाल करने में मांओं को दिक्कत आने लगती हैं। पुणे के मणिपाल अस्पताल में प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.तेजल देशमुख ने हमारे साथ इस विषय विस्तार से चर्चा की है जिसे आज हम इस आर्टिकल के माध्यम से समझेंगे।

गर्भावस्था के बाद क्यों होता है घुटनों में दर्द?

गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं, जिसकी वजह से उन्हें घुटनों में दर्द हो सकता है। कुछ महिलाओं के घुटनों में प्रसव के बाद दर्द बना रहता है, जिसके कारण उन्हें स्तनपान कराने जैसी दैनिक गतिविधियां करना मुश्किल हो जाता है।

घुटने में दर्द होने के क्या कारण हैं?

ज्यादा वजनः गर्भावस्था के दौरान वजन बढ़ने से घुटनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, और अगर घुटने पहले से कमजोर हैं या उनमें कोई समस्या है तो दर्द की समस्या ज्यादा बढ़ जाती है। प्रसव के बाद अगर महिला धीरे धीरे अपना वजन पहले जैसा कर ले तो दर्द में काफी आराम मिल जाता है।

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शारीरिक गतिविधियां: नवजात शिशु के पालन पोषण की जरूरतों, जैसे उसे गोद में उठाने, झुकने और उसे गोद में रखने के कारण भी घुटनों पर दबाव बढ़ जाता है। नई माँओं को कई शारीरिक गतिविधियां करनी पड़ती हैं, जिनकी उन्हें पहले से आदत नहीं होती है। इसके कारण घुटनों का बहुत ज्यादा उपयोग होने पर क्षति हो सकती है, या पहले से मौजूद समस्या बढ़ सकती है।

हार्मोन का असंतुलनः हार्मोन में परिवर्तन प्रसव के बाद घुटनों में दर्द के सबसे सामान्य कारणों में से एक है। गर्भावस्था के दौरान शरीर रिलैक्सिन जैसे हार्मोन बनाता है, जो प्रसव के लिए शरीर को तैयार करने के लिए लिगमेंट्स और ज्वाईंट्स को ढीला कर देता है। प्रसव के लिए तो यह परिवर्तन अनुकूल होता है, लेकिन जोड़ों में लचीलापन ज्यादा हो जाने पर वो कमजोर हो जाते हैं, खासकर घुटनों के जोड़ कमजोर होकर प्रसव के बाद दर्द और परेशानी उत्पन्न कर सकते हैं। गर्भ में मौजूद शिशु के कारण भी घुटनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

डिलीवरी में घुटनों में होने वाली कॉमन समस्या

प्रसव के बाद के समय में घुटनों की कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इनमें बर्साईटिस, इलियोटिबियल बैंड सिंड्रोम (आईटीबीएस) और पैटेलोफेमोरल पेन सिंड्रोम (पीएफपीएस) शामिल हैं। पीएफपीएस में घुटनों की कैप के चारों ओर दर्द होता है। इसका कारण माँसपेशियों का अत्यधिक उपयोग, एलाईनमेंट बिगड़ जाना, या उनमें असंतुलन है। लंबे समय पर घुटनों को मोड़े रखने, पालथी मारकर बैठने या सीढ़ियां चढ़ने पर यह और ज्यादा बिगड़ जाता है। आईटीबीएस में इलियोटिबियल बैंड इन्फ्लेमेशन होता है, जिसकी वजह से मुख्यतः चलने या जॉगिंग करने में घुटने के बाहर बहुत तेज दर्द होता है। बर्साईटिस अक्सर घुटनों को बार-बार चलाने या उन पर लगातार दबाव बने रहने के कारण होता है। इसमें घुटनों के जोड़ पर गद्दी बनाने वाली छोटे फ्लुड से भरी थैलियों में सूजन आ जाती है। इसकी वजह से दर्द और सूजन होते हैं।

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डिलीवरी के बाद घुटने के दर्द को कैसे दूर करें?

  • प्रसव के बाद होने वाले घुटनों के दर्द को रोकने के लिए आपको अच्छी तरह आराम करना होगा।
  • नियमित व्यायाम करें और अच्छी शारीरिक क्रियाओं का पालन करें।
  • घुटनों को आराम देना जरूरी होता है, इसलिए ऐसे काम न करें जिनसे दर्द बढ़े।
  • दर्द और सूजन को कम करने के लिए ठंडी सिंकाई की जा सकती है, और डॉक्टर के परामर्श से पेन किलर्स लिए जा सकते हैं।
  • हल्के व्यायाम और स्ट्रेचिंग से घुटनों की मसल्स मजबूत बनती हैं, और घुटनों की स्थिरता में सुधार आता है।
  • घुटनों के लिए वॉकिंग और स्विमिंग अच्छे व्यायाम हैं।
  • घुटनों के दर्द को दूर करने के लिए सपोर्टिव फुटवियर पहनें और शिशु को गोद में उठाने के लिए घुटनों एवं कूल्हों को मोड़कर झुकें।
  • इसके अलावा अन्य उचित शारीरिक क्रियाओं का भी पालन करें।

जन्म देने के बाद मांओं को घुटनों की समस्याएं होना आम है। इसके कारणों और आम समस्याओं को समझकर तथा इसे नियंत्रित करने की प्रभावशाली विधियों को अपनाकर मां और शिशु दोनों का स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जा सकता है।