ब्रेस्टफीड ना कराने से बच्चे के साथ-साथ मां को भी हो सकते हैं नुकसान, बढ़ सकता है इन बीमारियों का रिस्क

जानें कुछ ऐसी गम्भीर समस्याओं और बीमरियों के बारे में जो ब्रेस्टफीड ना कराने की वजह से बच्चे और मां को हो सकती हैं।

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Written By: Sadhna Tiwari | Updated : August 5, 2022 11:58 AM IST

Health Risks Of Not Breastfeeding: जन्म के बाद बच्चे को 6 महीने तक ब्रेस्टफीड कराने की सलाह स्वास्थ्य इकाइयों द्वारा दी गयी है। जैसा कि ब्रेस्टफीडिंग कराना बच्चे और मां दोनों के लिए फायदेमंद है इसीलिए, बच्चे को जितना हो सके उतना ब्रेस्टफीड कराना चाहिए। मां का दूध पीने से बच्चों की रोग-प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है वहीं, इससे कई क्रोनिक बीमारियों का रिस्क (chronic diseases) भी कम होता है। लेकिन, वहीं अगर किन्हीं कारणों से बच्चे को ब्रेस्ट मिल्क ना पिलाया जाए तो इससे उनके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। इससे बच्चा शारीरिक रूप से कमजोर तो होता ही है साथ ही आगे चलकर उसे कई प्रकार की गम्भीर बीमारियां भी हो सकती हैं। इस लेख में हम लिख रहे हैं कुछ ऐसी ही गम्भीर समस्याओं और बीमरियों के बारे में जो ब्रेस्टफीड ना कराने की वजह से बच्चे और मां को हो सकती हैं। (Health Risks Of Not Breastfeeding in Hindi)

बच्चे को ब्रेस्टफीड ना कराने के नुकसान

बढ़ता है इन बीमारियों का रिस्क

ब्रेस्ट मिल्क में कुछ एंटीबॉडीज (antibodies) पायी जाती हैं जो शिशुओं को बैक्टेरिया और वायरस से सुरक्षित रखने में मदद करती हैं। कुछ स्टडीज में पाया गया कि जिन बच्चों को 6 महीने तक मां का दूध नहीं पिलाया जाता है उनमें कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों (infectious diseases) और हेल्थ प्रॉब्लम्स का रिस्क बहुत अधिक बढ़ जाता है। मां का दूध ना पीने वाले बच्चों को कान में इंफेक्शन (ear infections), डायरिया (diarrhea), श्वसन मार्ग से जुड़ी समस्याएं (respiratory illnesses) अधिक होती हैं। इसी तरह इन बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने की संभावना भी अधिक होती है।

इसी तरह प्रीमैच्योर बेबीज (premature infants) को अगर ब्रेस्टमिल्क ना पिलाया जाए तो उनमें नेक्रोटाईज़िंग एंट्रोकोलाइटिस (necrotizing enterocolitis) का रिस्क बढ़ सकता है।

मां का दूध ना पीने वाले बच्चों में SIDS का खतरा अधिक

कुछ स्टडीज के परिणाम दर्शाते हैं कि जिन बच्चों को ब्रेस्टफीड नहीं कराया जाता है उनमें सालभर की उम्र तक सडन इंफैट डेथ सिंड्रोम (sudden infant death syndrome) का रिस्क अधिक होता है।  इसी तरह इन बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज और टाइप 2 डायबिटीज, लिम्फोमा (lymphoma), ल्यूकेमिया (leukemia), हॉडकिन्स डिजिज (Hodgkin's disease), मोटापा ( overweight and obesity), हाई कोलेस्ट्रॉल लेवल्स (high cholesterol) और अस्थमा (asthma) का रिस्क अधिक होता है।

फॉर्मूला मिल्क से हो सकती हैं समस्याएं

जैसा कि फॉर्मूला मिल्क पिलाने के लिए बॉटल (feeding bottles) और निप्पल्स (nipples) का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें सही तरीके से साफ ना किया जाए या स्टर्लाइज (sterilize) ना किया जाए तो इससे बच्चे को पेट से जुड़ी समस्याओं (stomach ailments in infants) और संक्रमण होने का रिस्क बढ़ जाता है। इसी तरह फॉर्मूला मिल्क को सही तरीके से स्टोर ना करने से भी कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का रिस्क बढ़ सकता है।

मांओं को भी होते हैं कई नुकसान

इसी तरह ऐसी  महिलाएं जो बच्चों को ब्रेस्टफीड नहीं करा पातीं उनमें आगे चलकर प्रीमेनोपॉजल ब्रेस्ट कैंसर (premenopausal breast cancer), ओवेरियन कैंसर (ovarian cancer), जेस्टेशनल वेट गेन (gestational weight gain), टाइप 2 डायबिटीज (type 2 diabetes) और अन्य मेटाबॉलिक सिंड्रोम (metabolic syndrome) का रिस्क बढ़ सकता है।

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