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प्रेगनेंसी और डिलीवरी के बाद चीजें भूल जाना, कहीं इस बीमारी की शिकार तो नहीं हो रहीं आप

प्रेगनेंसी के दौरान या फिर डिलीवरी के बाद लगभग 50 से 80 प्रतिशत महिलाओं में याददाश्त से संबंधित समस्याएं होती हैं।

प्रेगनेंसी के दौरान या बाद में नई मांओं के शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं। ये बदलाव कई बार हार्मोनल भी होते हैं। इन बदलावों में मानसिक और शारीरिक बदलाव शामिल होते हैं। हार्मोनल बदलावों के कारण शरीर के साथ-साथ मस्तिष्क की कार्य क्षमता भी प्रभावित होती है। एक शोध में यह बात सामने आई है कि प्रेगनेंसी के दौरान या फिर डिलीवरी के बाद लगभग 50 से 80 प्रतिशत महिलाओं में याददाश्त से संबंधित समस्याएं होती हैं। इसके कारण महिलाएं ध्यान केंद्रित करने में परेशानी महसूस करती हैं। भूलने की बीमारी को वैसे तो मेडिकल साइंस में ऐम्नेजिया (amnesia) कहते हैं, लेकिन जब किसी नई मां के साथ यह समस्या हो, तो उसे ''मॉमनेसिया'' कहा जाता है।

जब किया गया मेमोरी टेस्ट

एक न्यूरोसाइक्लॉजिकल शोध में 412 प्रेगनेंट महिलाओं, 272 मांओं और 386 उन महिलाओं को शामिल किया गया जो प्रेगनेंट नहीं थीं। उन सभी का मेमोरी परफॉर्मेंस टेस्ट किया गया। सबसे कठिन मेमोरी टास्क को करने में प्रेगनेंट महिलाओं को अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। शोधकर्ताओं का भी मानना है कि प्रेगनेंसी के दौरान या डिलीवरी के बाद याददाश्त में कमी आना आम और वास्तविक समस्या है। इस तरह की समस्या की शिकार कई महिलाएं होती हैं। एक अन्य शोध में कुछ प्रेगनेंट महिलाओं का एमआरआई कर उसका परीक्षण किया गया। पता चला कि उनके दिमाग के उस हिस्से में ग्रे मैटर में कमी आई, जो रीजनिंग और लोगों के दृष्टिकोण को समझने की क्षमता के लिए जिम्मेदार होते हैं। प्रेगनेंसी में दिमाग की क्षमता में कमी आने के लिए सिर्फ हार्मोंस ही जिम्मेदार होते हैं। ग्रे मैटर में कमी के कारण मस्तिष्क में मौजूद न्यूरल नेटवर्क पर भी नकारात्मक असर डालता है, जो प्रेगनेंसी के दौरान मां और बच्चे के बीच इमोशनल बॉन्ड को बरकरार रखने के लिए जिम्मेदार होते हैं।

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Momnesia

यूं पाएं छुटकारा मॉमनेसिया से

शांता आईवीएफ सेंटर, दिल्ली की गायनकोलॉजिस्ट एंड आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. अनुभा सिंह कहती हैं कि जीवनशैली में बदलाव लाकर इस समस्या से आप छुटकारा पा सकती हैं।

  • तनाव, अवसाद की स्तिथि में खुद को न आने दें। कई बार रात में बच्चे की देखभाल के लिए जागना पड़ता है, ऐसे में प्रॉपर नींद नहीं आती। इस वजह से भी मन चिड़चिड़ा रहने लगता है और आपको स्ट्रेस होने लगता है।
  • कई बार कुछ महिलाओं को बेबी ब्लू सिंड्रोम भी हो जाता है। इसमें बच्चे के प्रति इंसेक्योरिटी की भावना मन में घर कर जाती है। उनका ज्यादा समय यही सोचने में बीतता है कि पेट में पल रहा बच्चा कैसा होगा, हेल्दी होगा या नहीं। दिखने में कैसा होगा आदि। इस समस्या को दूर करने के लिए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
  • पोस्टनेटल डिप्रेशन भी कई महिलाओं को हो जाता है। यह कई बार फैमिली हिस्ट्री के कारण भी होता है।
  • मॉमनेसिया से बचने के लिए सपोर्ट सिस्टम स्ट्रॉग होना जरूरी है। घर के सभी सदस्यों खासकर लाइफ पार्टनर को पूरा ख्याल रखना चाहिए।
  • भरपूर आराम भी जरूरी है। बच्चा होने के कुछ ही दिनों बाद कई महिलाएं घर के सारे काम अकेले करने लगती हैं। इससे बचें। अपने शरीर को आराम दें। रात में जब बच्चा जागे, तो पार्टनर को कहें थोड़ी देर संभालने के लिए। सारी रात आप ना जगें। सुबह दिमाग फ्रेश रहेगा।
  • अपने शरीर और दिमाग को स्वस्थ्य और तनाव मुक्त रखने के लिए नियमित व्यायाम करें।
  • बैलेंस डायट लें। डिलीवरी के बाद शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाती है। प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार डायट में शामिल करें। जो खाने की इच्छा हो, वह खाएं। प्रोटीन में चिकन, पनीर, दाल, अंडा, सीजनल फ्रूट्स जैसे आम खाएं।

चित्रस्रोत: Shutterstock.

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