
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
Written By: Mukesh Sharma | Updated : January 21, 2026 11:46 AM IST
Medically Verified By: Dr. Mitul Gupta
Thyroid Problems In Pregnancy: प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में हार्मोन से जुड़े कई जरूरी बदलाव होते हैं, जो मां और गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों के सही विकास के लिए आवश्यक होते हैं। इन बदलावों में थायरॉइड ग्रंथि की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन अक्सर इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। प्रेग्नेंसी के दौरान थायरॉइड से जुड़ी समस्याएं काफी आम हैं और यदि समय पर इनकी जांच या इलाज न किया जाए, तो इसका असर मां की सेहत के साथ-साथ बच्चे के विकास पर भी पड़ सकता है। इसलिए थायरॉइड से जुड़ी समस्याओं को लेकर जागरूकता और शुरुआती स्तर पर सही इलाज बहुत जरूरी है, ताकि प्रेग्नेंसी का समय सुरक्षित और स्वस्थ रह सके। डॉ. मितुल गुप्ता, सीनियर कंसल्टेंट, ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी, कोकून हॉस्पिटल, जयपुर ने इस बारे में काफी महत्वपूर्ण जानकारियां दी जिनके बारे में आपको जरूर जानना चाहिए।
थायरॉइड ग्रंथि शरीर में थायरॉक्सिन (T4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (T3) जैसे हार्मोन्स बनाती है, जो मेटाबॉलिज्म, एनर्जी लेवल और शरीर के अलग-अलग अंगों के सही कामकाज को कंट्रोल करते हैं। प्रेग्नेंसी के दौरान थायरॉइड हार्मोन्स की जरूरत करीब 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ जाती है, खासतौर पर पहले तीन महीने में, इस समय गर्भ में विकसित हो रहा बेबी अपने ब्रेन और नर्वस सिस्टम के डेवलपमेंट के लिए पूरी तरह मां के थायरॉइड हार्मोन्स पर निर्भर होता है। इसलिए इस फेज में थायरॉइड का बैलेंस बना रहना बेहद जरूरी होता है। इस अहम समय में अगर थायरॉइड के कामकाज में किसी भी तरह का असंतुलन होता है, तो इसका असर मां और बच्चे दोनों की सेहत पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।

देखा गया है कि गर्भावस्था के दौरान थायराइड से जुड़ी कुछ समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है और इनमें प्रमुख रूप से हाइपोथायरॉइडिज्म और हाइपरथायरॉइडिज्म शामिल हैं -
हाइपोथायरॉइडिज्म - यह तब होता है, जब थायरॉइड ग्रंथि शरीर की जरूरत के हिसाब से हार्मोन नहीं बना पाती यानी ग्रंथि को जितना काम करना चाहिए वह उतना काम नहीं कर पा रही है और इस स्थिति को अंडरएक्टिव थायराइड भी कहा जाता है। यह ज्यादातर ऑटोइम्यून कंडीशन्स जैसे हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस या आयोडीन की कमी की वजह से होता है।
हाइपरथायरॉइडिज्म - यह थायराइड की एक कॉमन बीमारी मानी जाती है, जिसमें थायराइड ग्रंथि जरूरत से ज्यादा काम करने लगती है और इससे जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनने लगते हैं। इस स्थिति को ओवरएक्टिव थायराइड भी कहा जाता है, जिसमें ग्रेव्स डिजीज आदि होने का खतरा बढ़ जाता है।
कुछ मामलों में सबक्लिनिकल थायरॉइड कंडीशन भी देखी जाती है, जिसमें लक्षण बहुत हल्के होते हैं या बिल्कुल नहीं दिखते। ऐसे केस खासतौर पर महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि बिना प्रॉपर स्क्रीनिंग के इनका पता नहीं लग पाता है। ऐसे मामलों में ये बीमारियां होने का खतरा ज्यादा बढ़ता है।

गर्भास्था के दौरान थायराइड के लक्षणों का इग्नोर होना काफी आम हो जाता है, क्योंकि थायराइड से जुड़े लक्षण कई बार प्रेग्नेंसी के सामान्य बदलावों जैसे लग सकते हैं, जिससे सही समय पर पहचान करना मुश्किल हो जाता है। लगातार थकान महसूस होना, जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ना या घटना, गर्मी या ठंड सहन न होना, दिल की धड़कन तेज होना, कब्ज, बालों का ज्यादा झड़ना या मूड में बार-बार बदलाव होना, ऐसे लक्षण दिखें तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
हाइपोथायरॉइडिज्म में महिलाओं को सुस्ती, ज्यादा नींद आना और शरीर में सूजन की शिकायत हो सकती है, जबकि हाइपोथायरॉइडिज्म में बेचैनी, हाथों में कंपन, घबराहट और हार्ट रेट बढ़ने जैसे लक्षण दिख सकते हैं। इन लक्षणों को शुरुआती स्तर पर पहचान लेना बेहद जरूरी है, ताकि आगे चलकर होने वाली जटिलताओं से बचा जा सके।
खासतौर पर गर्भावस्था के दौरान थायराइड से जुड़ी बीमारियों का जल्द से जल्द इलाज शुरू होना बहुत ज्यादा जरूरी है। क्योंकि अगर थायरॉइड से जुड़ी समस्या को नजरअंदाज कर दिया जाए या टाइम पर ट्रीटमेंट न मिले, तो इससे मिसकैरेज, प्रीक्लेम्पसिया, एनीमिया, प्लेसेंटा का समय से पहले अलग होना और डिलीवरी के बाद ज्यादा ब्लीडिंग जैसी गंभीर परेशानियां हो सकती हैं। गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर पड़ता है जिसमें प्रीमैच्योर बर्थ, जन्म के समय लो बर्थ वेट, ब्रेन और नर्वस सिस्टम के डेवलपमेंट में असर और गंभीर मामलों में फीटल लॉस तक शामिल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रेग्नेंसी के शुरुआती समय में थायरॉइड की हल्की सी गड़बड़ी भी बच्चे के कॉग्निटिव यानी मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती है। इसी वजह से समय पर जांच और सही इलाज बेहद जरूरी है।
प्रेग्नेंसी में थायरॉइड की जांच ब्लड टेस्ट के जरिए की जाती है, जिसमें TSH, फ्री T4 और जरूरत पड़ने पर थायरॉइड एंटीबॉडीज की जांच शामिल होती है। जिन महिलाओं को पहले से थायरॉइड की प्रॉब्लम रही हो, इन्फर्टिलिटी की शिकायत रही हो, बार-बार मिसकैरेज हुआ हो या कोई ऑटोइम्यून डिज़ीज़ हो, उन्हें प्रेग्नेंसी की शुरुआत में या कंसीव करने से पहले ही थायरॉइड की स्क्रीनिंग जरूर करवा लेनी चाहिए। एक बार थायरॉइड डिसऑर्डर की पहचान हो जाने के बाद पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान रेगुलर चेक-अप और फॉलो-अप बेहद जरूरी होता है, क्योंकि जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे शरीर में हार्मोन्स की जरूरत भी बदलती रहती है।
अच्छी खबर यह है कि प्रेग्नेंसी के दौरान थायरॉइड डिसऑर्डर्स का इलाज पूरी तरह संभव और सुरक्षित होता है। हाइपोथायरॉइडिज़्म का इलाज लेवोथायरॉक्सिन दवा से किया जाता है, जिसे मां और बच्चे दोनों के लिए सुरक्षित माना जाता है। वहीं हाइपरथायरॉइडिज़्म में बहुत सावधानी के साथ चुनी गई एंटी-थायरॉइड दवाएं दी जाती हैं, और यह इलाज सख्त मेडिकल निगरानी में किया जाता है। सही समय पर इलाज और नियमित फॉलो-अप के साथ थायरॉइड की समस्या से जूझ रही ज्यादातर महिलाएं स्वस्थ गर्भावस्था और सामान्य डिलीवरी की उम्मीद कर सकती हैं।
अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।