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Written By: Anshumala | Published : January 29, 2019 4:42 PM IST
उन्नत एआरटी तकनीकों से काफी हद तक घट सकते हैं बार-बार आईवीएफ विफलता के मामले। © Shutterstock.
नीरज और अंकिता की शादी हुए छः वर्ष हो चुके हैं। वे लगभग तीन वर्षों से गर्भधारण की कोशिश कर रहे थे। कई बार के असफल प्रयासों के बाद, इस जोड़े में पुरुष की इंफर्टिलिटी कारक का पता चला और अंत में, उन्होंने आईवीएफ उपचार कराने का फैसला किया। इसके बाद भी गर्भधारण का प्रयास विफल रहा और 18 महीनों में आईवीएफ के 5 विफल प्रयासों के बाद, नीरज और अंकिता को बेहतर परिणाम के लिए एमएसीएस का परामर्श दिया गया। आज, अंकिता को स्वस्थ गर्भधारण किए हुए 5 महीने हो चुके हैं।
बढ़ रही है इंफर्टिलिटी की समस्या
इंफर्टिलिटी की समस्या दुनिया भर में बढ़ रही है। भारत में लगभग 10-12 प्रतिशत ऐसे शादीशुदा जोड़े हैं, जो स्वाभाविक रूप से गर्भधारण न हो पाने की समस्या से जूझ रहे हैं। उनमें से मात्र 1 प्रतिशत जोड़ों ने गर्भधारण हेतु आईवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) या इंफर्टिलिटी के अन्य उपचारों का सहारा लिया है। हालांकि, गर्भधारण हेतु असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलाॅजी (एआरटी) का उपयोग बढ़ा है। दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु के जन्म के बाद से 40 वर्षों में, दुनिया भर में 8 मिलियन से अधिक आईवीएफ शिशु पैदा हो चुके हैं।
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नोवा इवी फर्टिलिटी, दिल्ली की डाॅ. पारुल कटियार ने कहा, ‘‘आईवीएफ का चुनाव सामान्यतया उन कंपल्स द्वारा किया जाता है, जिन्हें कई वर्षों तक प्रयास के बावजूद स्वाभाविक रूप से गर्भधारण में सफलता नहीं मिलती है।
आईवीएफ विफलता के कारण
आईवीएफ की विफलता के कारणों या संभावित कारणों जैसे उम्र, अंडाणु या शुक्राणु की गुणवत्ता, गर्भाशय का स्वास्थ्य आदि का पता लगाने या समझ पाने से इस तरीके से उपचार की योजना बनाने में मदद मिलती है, जिससे उस समस्या का हल हो जाए और सफलता की अधिक संभावना हो। आईवीएफ चक्र की विफलता के ज्ञात कारण यहां दिए गए हैं।
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असफल निषेचन
आईवीएफ चक्र की सफलता में अंडाणुओं की गुणवत्ता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। महिला की उम्र के साथ उनके अंडाणुओं की गुणवत्ता और मात्रा बिगड़ती जाती है। 35 वर्ष के बाद, महिला का ओवेरियन रिजर्व तेजी से घटता जाता है। उपयुक्त अंडाणुओं की कम संख्या या अधिक एफएसएच लेवल वाली महिलाओं पर आईवीएफ उपचार का परिणाम उतना अच्छा नहीं होता है, जिससे सफल आईवीएफ चक्र की संभावना भी घट जाती है।
इसी तरह, शुक्राणुओं की गुणवत्ता आईवीएफ के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। शुक्राणु का स्वास्थ्य, स्वगतिशीलता और उसकी गुणवत्ता अंडाणु के निषेचन को सफल बनाने में इसकी क्षमता का निर्धारण करती हैं। शुक्राणुओं में डीएनए फ्रैगमेंटेशन के भी मामले देखने को मिलते हैं, जो भ्रूण में आनुवांशिक या क्रोमोसोम संबंधी असामान्यताएं पैदा करते हैं और इसके चलते फर्टिलाइजेशन विफल हो जाता है।
आईवीएफ विफलता के कारण। © Shutterstock.
असफल इंप्लांटेशन
आरोपण (इंप्लांटेशन) विफलता का कारण कुछ भी हो सकता है, जैसे गर्भाशय से जुड़ी समस्या और/या भ्रूण की गुणवत्ता। यदि एंडोमेट्रियम (गर्भाशय की लाइनिंग) भ्रूण के जुड़े रह पाने की दृष्टि से पर्याप्त रूप से मोटी नहीं है या इससे भ्रूण को शुरूआती कुछ दिनों में विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं, तो भ्रूण गर्भाशय भित्ति से जुड़े नहीं रह पाता है। फाइब्राॅयड्स, एंडोमेट्रियल पाॅलिप्स, जन्मजात विसंगति, इंट्रायूटेरिन एड्हेसंस, हाइड्रोसैलपिंजेज जैसी स्थितियों के चलते इंप्लांटेशन में बाधा पड़ सकती है। भ्रूण का स्वास्थ्य युग्मकों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है; यदि शुक्राणुओं का डीएनए फ्रैगमेंटेशन का उपयोग कर भ्रूण तैयार किया गया या मां की उम्र अधिक होने की स्थिति में, इंप्लांटेशन विफल हो सकता है।
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आईवीएफ की सफलता दर बढ़ाने वाली उन्नत तकनीकें
डाॅ. पारुल ने कहा, ‘‘वैयक्तिकृत दवा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते चलन के साथ, आईवीएफ ने वैयक्तिकृत प्रोटोकाॅल्स की आवश्यकताओं में वृद्धि देखी है, जैसे उपयुक्त उपचार हेतु पर्सनलाइज्ड एंब्रायो ट्रांसफर (चम्ज्) और वैयक्तिकृत ओवेरियन स्टिम्युलेशन। एआरटी ने प्रत्येक इनफर्टाइल कपल के लिए उपयुक्त उपचार विकल्प तलाशने में सहायता प्रदान करने हेतु कई समाधान विकसित किए हैं। ब्लास्टोसिस्ट कल्चर, मैग्नेटिक एक्टिवेटेड सेल साॅर्टिंग्स (एमएसीएस) जैसी तकनीकों और प्रीइंप्लांटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग (पीजीएस), प्रीइंप्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस (पजीडी) और एंडोमेट्रियल रिसेप्टिव एर्रे (ईआरए) जैसे रिप्रोडक्टिव जेनेटिक्स से आईवीएफ की सफलता दर को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाने में मदद मिली है।’’
परंपरागत आईवीएफ उपचार चक्र में, वीर्यारोपण के 2 से 3 दिनों के भीतर भ्रूणों को गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है। जब किसी भ्रूण को प्रयोगशाला में 5 दिनों तक बढ़ने देते हैं, तो इसे ब्लास्टोसिस्ट कल्चर कहते हैं। परंपरागत आईवीएफ विधि के विपरीत, ब्लास्टोसिस्टम कल्चर और सिंगल ब्लास्टोसिस्ट एंब्रायो ट्रांसफर से मरीजों में एक साथ कई शिशुओं जन्म और आईवीएफ विफलता का खतरा घट जाता है।
कपल्स में बार-बार गर्भपात के 10 प्रतिशत तक मामले आनुवांशिक कारकों के चलते होते हैं। क्रोमोसोम्स की गलत संख्या वाले भ्रूण इंप्लांट नहीं हो पाते या गर्भधारण की पहली तिमाही के दौरान गर्भपात हो जाता है। पीजीएस से आईवीएफ चक्र के दौरान भ्रूणों में क्रोमोसोम संबंधी असामान्यताओं का पता लगाने में मदद मिलती है। पीजीएस का उपयोग सभी 22 प्रकार के क्रोमोसोम्स का विश्लेषण किया जाता है, ताकि असुगुणित (एन्युप्लाॅइडिज) (क्रोमोसोम की संख्या में परिवर्तन) की पहचान की जा सके, जो कि गर्भपात और इंप्लांटेशन की बार-बार विफलता के प्रमुख कारण हैं।