क्या माइक्रोप्लास्टिक महिलाओं की मां बनने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है?

माइक्रोप्लास्टिक सिर्फ हमारी सेहत और पेट को ही प्रभावित नहीं करते हैं, बल्कि यह महिलाओं की मां बनने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। कैसे? आइए डॉक्टर से जानते हैं।

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Written By: Vidya Sharma | Updated : April 28, 2026 9:43 AM IST

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Medically Verified By: Dr. Rohit Raghunath Ranade

हम सभी जानते हैं कि प्लास्टिक का इस्तेमाल हमारे पर्यावरण को बहुत ही खतरनाक तरीके से नुकसान पहुंचाता है। लेकिन कैसा हो अगर हम कहें कि ये प्लास्टिक हमारे शरीर के अंदर भी पहुंच सकता है? और महिलाओं के रिप्रोडक्टिव हेल्थ को भी नुकसान पहुंचा सकता है? जहां तक महिलाओं की गायनेकोलॉजिकल और प्रजनन सेहत का सवाल है, अब तक ज्यादा ध्यान जेनेटिक कारणों, हार्मोनल असंतुलन, खानपान और नियमित एक्सरसाइज पर दिया जाता रहा है। 

PCOS और एंडोमेट्रियोसिस जैसी समस्याएं महिलाओं में पीरियड्स के दौरान और सेक्स के समय या बाद में दिक्कत पैदा करती हैं। लेकिन आज महिलाओं के प्रजनन अंगों की सेहत के लिए एक नया खतरा सामने आया है, और वह है माइक्रोप्लास्टिक और नैनो प्लास्टिक। क्या ये ओवरी तक पहुंच सकते हैं और महिलाओं की यौन व प्रजनन सेहत को ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं?

जवाब है- हां। माइक्रोप्लास्टिक और नैनो प्लास्टिक वास्तव में ओवेरियन टिशू और फॉलिक्युलर फ्लूइड में पाए जा चुके हैं। आइए हम इस विषय पर नारायणा हेल्थ सिटी, बेंगलुरु के क्लिनिकल लीड- गायनेकोलॉजी ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर रोहित रघुनाथ रानडे से विस्तार से जानते हैं।

इस खतरे को समझना क्यों जरूरी है

इस समस्या की गंभीरता समझने के लिए पहले इन कणों को समझना होगा। माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के बेहद छोटे टुकड़े होते हैं, जिनका आकार 5 मिलीमीटर से कम होता है, जबकि नैनोप्लास्टिक 1 माइक्रोमीटर से भी छोटे होते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि आंखों से दिखाई नहीं देते और शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा परतों को आसानी से पार कर सकते हैं। इनमें कई तरह के पॉलिमर पाए जाते हैं, जैसे पॉलीएथिलीन (PE), पॉलीप्रोपाइलीन (PP), पॉलीस्टाइरीन (PS) और पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET), जिनका इस्तेमाल पैकेजिंग और कृषि सामग्री में आमतौर पर होता है।

ओवेरा को कैसे नुकसान पहुंचा रहा माइक्रोप्लास्टिक?

पहले माना जाता था कि ओवरी एक सुरक्षित हिस्सा है, जो जटिल फिल्ट्रेशन सिस्टम से सुरक्षित रहती है। अब यह समझ आया है कि ये कण खाना, पानी और यहां तक कि हवा के जरिए खून में पहुंचते हैं। वहां से ये सीधे प्रजनन अंगों तक भी पहुंच सकते हैं। प्लास्टिक बैग में मिलने वाला पॉलीएथिलीन और पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला पॉलीस्टाइरीन अब उस फ्लूइड में भी पाया जा रहा है, जो महिला के अंडों (oocytes) की गुणवत्ता तय करता है।

स्टडी में हुआ खुलासा

2024 की Science of the Total Environment स्टडी में पहली बार Py-GC/MS टेक्नोलॉजी के जरिए मानव फॉलिक्युलर फ्लूइड में पॉलीएथिलीन और PVC जैसे पॉलिमर पाए गए। 18 महिलाओं के सैंपल में से 80% से ज्यादा महिलाओं के फॉलिक्युलर फ्लूइड में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद था। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा और Follicle-Stimulating Hormone (FSH) लेवल के बीच सीधा संबंध पाया गया। क्लिनिकल प्रैक्टिस में हाई FSH को कम ओवेरियन रिजर्व का संकेत माना जाता है, यानी माइक्रोप्लास्टिक समय से पहले ओवरी की उम्र बढ़ाने का छिपा कारण हो सकता है।

ट्रोजन हॉर्स इफेक्ट: नुकसान कैसे होता है?

क्लिनिकल नजरिए से चिंता सिर्फ प्लास्टिक की मौजूदगी नहीं है, बल्कि इसका ट्रोजन हॉर्स इफेक्ट भी है। ये कण अक्सर एंडोक्राइन डिसपर्टिंग केमिकल (EDCs) को साथ लेकर चलते हैं। जब ये कण ओवरी टिशू में जाकर जमा हो जाते हैं, तो कई नुकसानदायक प्रक्रियाएं शुरू होती हैं।

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सेल्यूलर एजिंग- ओवरी में किसी बाहरी चीज की मौजूदगी रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पेसीस बनने लगते हैं। यह कोशिकाओं में जंग लगने जैसा असर पैदा करता है। इससे अंडों के DNA को नुकसान पहुंच सकता है, उनकी परिपक्वता प्रभावित हो सकती है और कम उम्र में ही एग क्वालिटी घट सकती है।

हार्मोन मिमिक्री

ज्यादातर प्लास्टिक में ऐसे केमिकल होते हैं जो एस्ट्रोजन की नकल करते हैं। जब ये फॉलिकुलर वातावरण में पहुंचते हैं, तो प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ देते हैं। इससे पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं और PCOS जैसी समस्याओं से जुड़ाव देखा गया है।

मिटकोनड्रियल डिसफंक्शन

नैनो प्लास्टिक खासतौर पर ज्यादा खतरनाक होते हैं क्योंकि ये सेल मेम्ब्रेन के अंदर तक घुस सकते हैं। अंदर जाकर ये माइटोकॉन्ड्रिया को प्रभावित करते हैं, जिन्हें कोशिका का पावर हाउस कहा जाता है। एक एग सेल को विकसित होने और निषेचन के लिए बहुत ज्यादा ऊर्जा चाहिए होती है। अगर ऊर्जा उत्पादन बिगड़ता है, तो फर्टिलिटी प्रभावित हो सकती है। साथ ही प्लास्टिक लगभग स्थायी होता है, इसे शरीर के लिए तोड़ना और बाहर निकालना बहुत मुश्किल है।

माइक्रोप्लास्टिक बार से अंदर ऐग तक कैसे पहुंच जाते हैं?

यह समझना जरूरी है कि यह एक क्युमुलेटिव इशू है, यानी समय के साथ बढ़ने वाली समस्या है। इंसान रोजमर्रा की कई चीजों से इन कणों के संपर्क में आता है:

इनजेशन (खाने-पीने से)

प्लास्टिक पानी की बोतलों से माइक्रोप्लास्टिक निकलते हैं, खासकर जब उन्हें गर्म किया जाता है। ये अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स और कुछ सी फूड्स में भी पाए जाते हैं। हमें तुरंत खाने और पानी के लिए प्लास्टिक कंटेनर का इस्तेमाल बंद करना चाहिए, और कांच के कंटेनर व कॉपर बोतलों की तरफ जाना शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए बेहतर हो सकता है। गर्मी प्लास्टिक से केमिकल निकलने का सबसे बड़ा कारण है। ग्लास, सिरेमिक या स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल जरूरी कदम है। साथ ही अच्छे कार्बन या रिवर्स ऑस्मोसिस फिल्टर भी काफी मात्रा में माइक्रो पार्टिकल रोक सकते हैं।

सांस के जरिए

शहरी इलाकों में लोग कपड़ों और कार्पेट से निकलने वाले synthetic fibres सांस के जरिए लेते हैं। आजकल ज्यादातर कपड़ों में पॉलिएस्टर होता है, खासकर कंबल और बेडशीट में, जो सीधे त्वचा के संपर्क में आते हैं। पॉलिएस्टर शरीर में पहुंचकर गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

त्वचा के जरिए

कुछ पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में माइक्रोप्लास्टिक, माइक्रोबीड्स या प्लास्टिक बेस्ड थिकनर्स होते हैं, जो त्वचा के जरिए अब्सॉर्ब हो सकते हैं। इसलिए अब प्रोडक्ट खरीदते समय लेबल पढ़ना जरूरी है। बस प्रोडक्ट पलटिए और पीछे दिए गए इंग्रीडिएंट्स देखिए।

कितना नुकसानदायक है?

हालांकि मजबूत सबूत हैं कि ये प्लास्टिक ओवरी में मौजूद हैं, लेकिन रिसर्चस अभी भी लंबे समय के असर और बड़ी आबादी पर फर्टिलिटी इम्पैक्ट का अध्ययन कर रहे हैं। यह घबराने की बात नहीं है, लेकिन सावधानी बरतने का समय जरूर है। प्री-क्लिनिकल मॉडल यह दिखा रहे हैं कि माइक्रोप्लास्टिक का ज्यादा स्तर ओवेरियन रिजर्व घटा सकता है, यानी समय के साथ स्वस्थ अंडों की संख्या कम हो सकती है।

क्लिनिकल सेटिंग्स में यह भी देखा जा रहा है कि क्या यही कारण है कि कई बार IVF ट्रीटमेंट्स सामान्य प्रोफाइल होने के बावजूद असफल हो जाते हैं। सबूत बताते हैं कि यह dose-dependent risk है, यानी अगर एक्सपोजर अभी कम किया जाए तो भविष्य की रिप्रोडक्टिव लॉन्गिविटी को बचाया जा सकता है।

आगे का रास्ता: जागरूकता और बदलाव

यह मुद्दा अब एनवायरमेंटल साइंस और गायनेकोलॉजी के बीच एक अहम जगह पर खड़ा है। अब इनफर्टिलिटी को सिर्फ मेडिकल समस्या मानने की बजाय एनवायरमेंटल समस्या के रूप में भी देखने की जरूरत है। साथ ही फूड और ब्यूटी इंडस्ट्रीज में प्लास्टिक के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए पोलिसी-लेवल बदलाव भी जरूरी हैं।

ओवरी में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी एक शांत, अदृश्य खतरा है, लेकिन जागरूकता और समझदारी भरी लाइफस्टाइल से इससे निपटा जा सकता है। आज छोटे-छोटे बदलाव करके लोग सिर्फ अपनी सेहत ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों की जैविक सेहत भी सुरक्षित कर सकते हैं।

Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। साथ ही प्लास्टिक के कम उपयोग करने की भी सलाह देता है। अगर आप अपनी हेल्थ को बेहतर बनाना चाहते हैं तो अपने खाने-पीने और इस्तेमाल की जाने वाली सभी चीजों का ख्याल रखें। अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

FAQs

माइक्रोप्लास्टिक क्या है और वह आमतौर पर कहां पाए जाते हैं?

माइक्रोप्लास्टिक क्या है? माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के वे टुकड़े होते हैं जिनका आकार पांच मिलीमीटर से कम होता है।

क्या माइक्रोप्लास्टिक्स को मां से बच्चे तक पहुंचाया जा सकता है?

हाल ही में, चार मानव प्लेसेंटा में पहली बार कई माइक्रोप्लास्टिक टुकड़े पाए गए, जिससे पता चलता है कि ये एमपी प्लेसेंटल ऊतक में प्रवेश कर सकते हैं। इन निष्कर्षों के आधार पर, गर्भावस्था के दौरान भ्रूण के लिए एमपी के संभावित जोखिमों के बारे में बढ़ती चिंता है।

गर्भपात का सबसे ज्यादा खतरा किस सप्ताह में होता है?

गर्भपात का सबसे ज्यादा खतरा गर्भावस्था के शुरुआती 12 हफ्तों (पहली तिमाही) के दौरान, विशेषकर 6 से 10 सप्ताह के बीच सबसे अधिक होता है।

क्या माइक्रोप्लास्टिक प्रेग्नेंसी को प्रभावित करते हैं?

हां, शोध बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक (बहुत छोटे प्लास्टिक कण) गर्भावस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

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