
रश्मि उपाध्याय
रश्मि उपाध्याय साल 2014 से मीडिया क्षेत्र से जुड़ी हैं और TheHealthSite.Com में बतौर एडिटर काम कर रही हैं। इन्हें ... Read More
Written By: Rashmi Upadhyay | Published : July 6, 2020 9:27 PM IST
निमोनिया को फेफड़ों की सूजन और फुफ्फुस प्रदाह के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग फेफड़ों में सूजन के कारण होता है। आजकल मानसून चल रहा है और ऐसे मौसम में कई बीमारियां जन्म लेती हैं। क्योंकि बच्चे लापरवाही बरतते हैं और खुद का ध्यान नहीं रख पाते हैं इसलिए वह जल्दी बीमारियों की चपेट में भी आते हैं। इन्हीं मौसमी बीमारियों में से एक है निमोनिया। यह बीमारी भले ही सुनने में आपको बहुत छोटी लगे लेकिन अगर सही समय पर इसके लक्षण पहचानकर इलाज न कराया जाए तो जानलेवा साबित हो सकती है। WHO के आंकड़ें बताते हैं कि 2015 में 5 साल से कम उम्र के बच्चों में निमोनिया के चलते मृत्युदर 16% तक थी। आज हम आपको बता रहे हैं कि बच्चे क्यों निमोनिया का शिकार होते हैं, निमोनिया के क्या लक्षण हैं और इससे बचाव कैसे संभव है।
1. भूख न लगना
2. उल्टी होना या उल्टी जैसा मन होना
3. खांसते वक्त सीने में दर्द होना
4. खांसी के साथ बलगम आना
5. थकान के साथ बुखार आना
6. ठंड के साथ कांपना
7. सांस की गति का बढ़ना या सांस के साथ तेज आवाना आना
8. हद से ज्यादा खांसी होना
निमोनिया आमतौर पर तीन प्रकार का होता है। लोबर निमोनिया, ब्रोंकाइल निमोनिया और वॉकिंग निमोनिया। आइए जानते हैं इन्हें विस्तार से-
ब्रोंकाइल निमोनिया- इस तरह के निमोनिया से प्रभावित बच्चे के दोनों फेफड़े में चकत्ते बन जाते हैं।
लोबर निमोनिया- इस तरह का निमोनिया होने पर फेफड़े का एक या एक से ज्यादा भाग प्रभावित हो सकता है।
वॉकिंग निमोनिया- इस तरह का निमोनिया अक्सर 5 साल की उम्र के कम के बच्चों में देखा जाता है। इस तरह का निमोनिया होने पर बच्चा सुस्त हो जाता है या फिर काफी रोने लगता है।
निमोनिया का प्रमुख कारण स्ट्रेप्टोकॉकस निमोनिया नाम का एक बैक्टीरिया होता है। जो हमारे फेफड़ों को इन्फेक्टेड करके हमारी श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है, लेकिन कभी-कभी किसी फ्लू वायरस की वजह से भी हमें निमोनिया हो जाता है। निमोनिया के रोगाणु अवसरवादी होते हैं इसीलिए अगर आपका इम्यून सिस्टम कमजोर है तो आप जल्दी ही इसकी चपेट में आ सकते हैं। यह एक जानलेवा बीमारी है, इसलिए जितनी जल्दी इसका पता चले तभी इसका इलाज करा लेना चाहिए। इसके अलावा जब बच्चे धुएं या प्रदूषण के माहौल में ज्यादा देर रहते हैं तब भी बच्चों को निमोनिया होने का खतरा रहता है।