क्यों एक उम्र के बाद बच्चे माता-पिता के लिए बोझ बन जाते हैं?

Verified VERIFIED By: Dr. Malini Saba

Bachhe Maa-Baap Ka Bojh Kyu Hote Hain: कई बार माता-पिता अपने बच्चों को बोझ समझने लगते हैं। इसके 5 कारण सेक्सोलॉजिस्ट डॉक्टर सबा मालिनी ने विस्तार से बताएं हैं।

Written by Vidya Sharma | Published : November 14, 2025 9:18 AM IST

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क्या बच्चे माता-पिता का बोझ होते हैं?

Bachho Ka Parents Ka Bojh Hone Ka Karan: हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए सपने देखते हैं, उन्हें बेहतर जिंदगी देना, सुरक्षित भविष्य बनाना और यह उम्मीद करना कि वे खुश रहें। लेकिन समय के साथ, कई बार यही बच्चे, चाहकर या अनजाने में, माता-पिता के लिए मानसिक, भावनात्मक या आर्थिक बोझ बन जाते हैं। हमने साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉ मालिनी सबा से बात की और जाना कि यह विषय दोष का नहीं, बल्कि समझ का है। परिवार जीवन की रफ्तार और मूल्यों का संतुलन बदलने पर यह स्थिति पैदा होती है। आइए इस विषय को थोड़ा इन 5 बिंदुओं से समझते हैं।

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जब बच्चे वयस्क होकर भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाते

आज की पीढ़ी लंबी पढ़ाई, अस्थिर नौकरियों और बदलते करियर रास्तों से गुजर रही है। कई युवा तीस की उम्र तक भी आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाते। माता-पिता अपनी बचत या मानसिक ऊर्जा बच्चों की मदद में लगाते रहते हैं। उदाहरण के लिए, 30 साल का बेटा जो अब तक दिशा तय नहीं कर पाया, धीरे-धीरे माता-पिता के लिए चिंता का विषय बन जाता है। डॉक्टर सबा कहती हैं, 'यह आर्थिक नहीं, मानसिक बोझ बनता है, क्योंकि माता-पिता लगातार भविष्य को लेकर तनाव में रहते हैं।' Also Read - बच्चों में ये 5 लक्षण हो सकते हैं ल्यूकेमिया(Blood Cancer) का संकेत, तुरंत भागे डॉक्टर के पास

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भावनात्मक निर्भरता और ज़िम्मेदारी का असंतुलन

कई बच्चे निर्णय लेने में आत्मविश्वास की कमी के कारण हर बात पर माता-पिता पर निर्भर रहते हैं, नौकरी, रिश्ते या निजी जीवन के फैसले तक। यह शुरुआत में सामान्य लगता है, पर लंबे समय में माता-पिता को थकान महसूस होने लगती है। उन्हें लगता है कि सिखाने के बजाय अब उन्हें बच्चों को 'सहारा' नहीं बल्कि 'ढोना' पड़ रहा है। यह भावना धीरे-धीरे रिश्ते में दूरी पैदा करती है।

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जब बच्चे माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करना भूल जाते हैं

करियर और निजी जीवन की भागदौड़ में कई बार बच्चे संवाद और सम्मान की अहमियत भूल जाते हैं। जब वे कठोर लहजे में बात करते हैं या माता-पिता को निर्णयों से दूर रखते हैं, तो बुजुर्गों को यह महसूस होता है कि वे अब बच्चों के जीवन में अहम नहीं रहे। डॉक्टर बताती हैं कि 'भावनात्मक उपेक्षा हर उम्र में दर्द देती है, लेकिन जब यह अपने ही बच्चों से मिले तो माता-पिता का आत्मसम्मान सबसे ज्यादा आहत होता है।' Also Read - क्या होते हैं लीडलेस पेसमेकर, कब पड़ती है इनकी जरूरत? दिल के मरीजों का जानना है जरूरी

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आर्थिक निर्भरता और अनजाने में बोझ बनना

कई बार बच्चे अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए माता-पिता की जमा पूंजी या पेंशन पर निर्भर रहते हैं- शादी, बिजनेस या घर के खर्च तक में। प्यार से दी गई सहायता जब आदत बन जाती है, तो माता-पिता खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। यह उन्हें भावनात्मक और मानसिक रूप से तोड़ देता है, क्योंकि जिस सहयोग को उन्होंने स्नेह माना था, वही थकान में बदल जाता है।

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सामाजिक तुलना और अपराध बोध

माता-पिता अक्सर अपने बच्चों की तुलना दूसरों से करते हैं जैसे- देखो, शर्मा जी का बेटा कितना सफल है।' यह तुलना उन्हें दुखी करती है और बच्चों पर दबाव डालती है। जब बच्चा इस दबाव को संभाल नहीं पाता, तो दोनों तरफ अपराध बोध और दूरी बढ़ने लगती है। यह वह बिंदु है जहाँ रिश्ते में संवाद और सहानुभूति की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है। Also Read - Weight Loss Alert: क्या कॉफी है सबसे सस्ता फैट बर्नर?