मिथिला का नववर्ष जुड़ शीतल: संस्कृति, सादगी और संवेदनाओं का संगम है ये दिन

मिथिला के लोगों के लिए जुड़- शीतल का दिन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि बचपन की यादों, परिवार के प्यार और मिट्टी की खुशबू से जुड़ा होता है।

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Written By: Ashu Kumar Das | Published : April 15, 2026, 8:09 AM

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जुड़-शीतल: ठंडक, परंपरा और अपनापन का त्योहार

मिथिला की मिट्टी में सिर्फ फसलें ही नहीं उगतीं, यहां भावनाएं भी पनपती हैं। इन्हीं भावनाओं से जुड़ा एक बेहद खास पर्व है जुड़-शीतल। यह त्योहार हर साल वैशाख महीने की शुरुआत में मनाया जाता है और इसे मैथिली नववर्ष का दूसरा दिन भी माना जाता है। जुड़ का अर्थ है ठंडक और शीतल यानी शांति यानी ऐसा दिन जो जीवन में सुकून और ताजगी लेकर आए। मैं खुद एक मैथिली परिवार से आती हूं। जब छोटे थे, तब मां जुड़ - शीतल के दिन सुबह उठते ही मां सिर पर लौटे से थोड़ा पीना डाला करती थीं और कहती थी- 'जुड़ैल रह'। इसके बाद दाल भर कर पूड़ी, बड़ी (एक प्रकार की बेसन की सब्जी), कच्चे आम और सत्तू खाने को मिलता था। अपनी परंपरा से एक कदम और जुड़ते हुए मैं आपको बताने जा रही हूं, क्या है मिथिला का नववर्ष जुड़- शीतल।

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क्या होता है जुड़-शीतल?

जुड़-शीतल सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के संतुलन का संदेश है। यह हमें सिखाता है कि जैसे गर्मी के बाद ठंडक जरूरी होती है, वैसे ही भागदौड़ भरी जिंदगी में सुकून और ठहराव भी जरूरी है। इस दिन लोग अपने घर, परिवार, पशु-पक्षी और पेड़-पौधों तक को शीतलता का आशीर्वाद देते हैं। सुबह-सुबह घर के बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों के सिर पर ठंडा पानी डालते हैं, यह मानते हुए कि इससे पूरे साल स्वास्थ्य और शांति बनी रहती है।  Also Read - ओवेरियन कैंसर के बार-बार होने का खतरा, क्यों महिलाओं के लिए बन रहा बड़ी चुनौती

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मिथिला के लिए क्यों खास है जुड़- शीतल

मिथिला के लोगों के लिए यह दिन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि बचपन की यादों, परिवार के प्यार और मिट्टी की खुशबू से जुड़ा होता है। गांवों में आज भी इस दिन की सुबह कुछ अलग ही होती है- हाथ में लोटा लिए मां या दादी, बच्चों के सिर पर पानी डालते हुए आशीर्वाद देती हैं- "जुड़ रह, शीतल रह, सुखी रह..." यह शब्द सिर्फ आशीर्वाद नहीं, बल्कि पूरे साल के लिए एक भावनात्मक कवच होते हैं।

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जुड़- शीतल पर खाया जाता है बासी खाना

जुड़-शीतल की सबसे खास बात यह है कि इस दिन बासी खाना (पका हुआ ठंडा भोजन) खाया जाता है। एक दिन पहले यानी सतुआन के दिन खाना बनाकर रख लिया जाता है और अगले दिन उसे ठंडा करके खाया जाता है। इस दिन खास तौर पर बासी चावल (पकौड़ी या भात), दही, सत्तू, आम की चटनी खाए जाते हैं। जुड़- शीतल के दिन बासी खाना सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी मानी जाती है। गर्मियों की शुरुआत में शरीर को ठंडक देने के लिए यह बेहद फायदेमंद होता है।  Also Read - विश्व थैलेसीमिया दिवस: क्या थैलेसीमिया को बढ़ने से रोका जा सकता है? वीडियो में डॉ. पवन कुमार सिंह से जानें

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बासी खाने से कोई फायदा मिलता है?

मिथिला वासियों का मानना है कि गर्मी की शुरुआत में बासी खाना शरीर की गर्मी को कम करने में मदद करता है। ठंडा भात, दही और सत्तू शरीर को अंदर से ठंडा रखते हैं, जिससे लू और डिहाइड्रेशन का खतरा कम होता है। बासी चावल में मौजूद पोषक तत्व आसानी से पचते हैं और शरीर को धीरे-धीरे एनर्जी देते हैं। इससे शरीर को पूरा दिन कमजोरी महसूस नहीं होती है।

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परंपरा को संजोना सिखाता है जुड़- शीतल

आज के समय में जब लोग शहरों की भागदौड़ में उलझ गए हैं, जुड़-शीतल हमें अपने गांव, अपनी जड़ों और अपने रिश्तों की याद दिलाता है। मिथिला का जुड़- शीतल हमें सिखाता है कि जीवन में सिर्फ चलते रहना नहीं, बल्कि ठहरना भी जरूरी है, अपनों के साथ समय बिताना भी जरूरी है और सबसे जरूरी है हर परिस्थिति में अपने दिल को शीतल रखना।  Also Read - ओवेरियन कैंसर पर बड़ी जीत: AI से जल्दी पहचान और नई दवा से बढ़ेगी जिंदगी, जानें रिसर्च के दावे

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