ब्लड कैंसर की कितनी स्टेज होती है? हर स्टेज में दिखते हैं ये लक्षण

Blood Cancer: कैंसर कई प्रकार का होता है, जिनमें से एक है ब्लड कैंसर। यह क्या होता है, इसकी कितनी स्टेज होती हैं और उन स्टेज में क्या लक्षण होते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।

Written by Vidya Sharma | Updated : September 21, 2025 12:03 PM IST

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रक्त कैंसर के बारे में डॉक्टर क्या कहते हैं?

रक्त कैंसर, जो खून, बोन मैरो और लसीका तंत्र को प्रभावित करता है, उसे स्टेज करने का तरीका ठोस ट्यूमर से अलग होता है। सभी रक्त कैंसरों की स्टेजिंग नहीं होती है। सिर्फ कुछ खास तरह के कैंसर, जैसे क्रोनिक लिम्फोसाईटिक ल्यूकेमिया (CLL), मल्टीपल मायलोमा, और लिंफोमा की स्टेजिंग की जाती है ताकि इलाज और बीमारी की गंभीरता का पता लगाया जा सके। नारायणा अस्पताल, जयपुर के मेडिकल ऑन्कोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. प्रशांत कुंभाज के अनुसार, "रक्त कैंसर, जिसे आमतौर पर ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और मायलोमा कहते हैं, को अलग तरह से स्टेज किया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ये खून बनाने वाले टिश्यूज और लिम्फेटिक सिस्टम को प्रभावित करते हैं, न कि कोई ठोस गांठ बनाते हैं।" आइए इसे और अच्छे से समझते हैं।

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ब्लड कैंसर और उनकी स्टेज

ल्यूकेमिया के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला स्टेजिंग सिस्टम राय सिस्टम (Rai System) कहलाता है, जिसमें बीमारी को पांच स्टेज (0 से 4) में बांटा जाता है। लिंफोमा और मायलोमा के अपने अलग-अलग स्टेजिंग तरीके हैं। ल्यूकेमिया के प्रकारों के अनुसार स्टेजिंग इस प्रकार है- एक्यूट ल्यूकेमिया (ALL, AML): इनमें ट्यूमर के साइज या फैलाव के हिसाब से स्टेजिंग नहीं होती। मरीजों को उनके जोखिम (risk) के आधार पर बांटा जाता है, जिसमें उनकी उम्र, श्वेत रक्त कोशिका (WBC) की संख्या, जेनेटिक म्यूटेशन और इलाज पर उनकी प्रतिक्रिया शामिल है। ये वर्ग हैं: कम जोखिम (low risk), मध्यम जोखिम (intermediate risk), और ज़्यादा जोखिम (high risk)। Also Read - किडनी से कितने mm की पथरी निकल जाती है? डॉक्टर से जानिए कब पड़ती है सर्जरी की जरूरत

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क्रोनिक ल्यूकेमिया (CLL और CML): इनमें खास स्टेजिंग होती है।

CLL (क्रोनिक लिम्फोसाईटिक ल्यूकेमिया): इसके लिए दो मुख्य स्टेजिंग सिस्टम हैं। राय स्टेजिंग अमेरिका में इस्तेमाल होता है। इसमें स्टेज 0: सिर्फ लिम्फोसाइट की संख्या बढ़ी हुई है। स्टेज I- लिम्फोसाइट बढ़े हुए हैं और लिम्फ नोड्स भी बड़े हो गए हैं। स्टेज II- लिम्फोसाइट बढ़े हुए हैं और प्लीहा या लिवर बड़े हो गए हैं (लिम्फ नोड्स भी बड़े हो सकते हैं)। स्टेज III- लिम्फोसाइट बढ़े हुए हैं और एनीमिया (खून की कमी) है। स्टेज IV लिम्फोसाइट बढ़े हुए हैं और थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (प्लेटलेट्स की कमी) है।

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CML (क्रोनिक मायलोइड ल्यूकेमिया)

इसमें बीमारी के चरणों के आधार पर स्टेजिंग की जाती है- पहला क्रोनिक फेज (Chronic Phase) दूसरा त्वरित फेज (Accelerated Phase) तीसरा ब्लास्ट फेज (Blast Crisis)। इसके अलावा लिंफोमा की स्टेज भी होती है। स्टेज I: सिर्फ एक लिम्फ नोड एरिया या एक एक्स्ट्रा-लिम्फेटिक साइट में बीमारी है। स्टेज II: डायाफ्राम के एक ही तरफ दो या उससे ज़्यादा लिम्फ नोड एरिया प्रभावित हैं। स्टेज III: डायाफ्राम के दोनों तरफ लिम्फ नोड्स प्रभावित हैं, प्लीहा भी प्रभावित हो सकती है। स्टेज IV: बीमारी शरीर के दूसरे अंगों, जैसे बोन मैरो, लिवर या फेफड़ों तक फैल गई है। Also Read - कैविटी से लेकर दिल की बीमारी तक: रात में सिर्फ 2 मिनट ब्रश करने से मिलेंगे ये 5 फायदे

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मल्टीपल मायलोमा की स्टेज

मल्टीपल मायलोमा के लिए संशोधित अंतर्राष्ट्रीय स्टेजिंग सिस्टम (R-ISS) का इस्तेमाल होता है स्टेज I: कम बीटा-2 माइक्रो ग्लोब्युलिन, सामान्य LDH, और अच्छी जेनेटिक विशेषताएं। स्टेज II: स्टेज I और III के बीच के लक्षण। स्टेज III: ज़्यादा बीटा-2 माइक्रो ग्लोब्युलिन या ज्यादा LDH या ज्यादा जोखिम वाले जेनेटिक लक्षण।

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डॉक्टर ने बताई ब्लड कैंसर से जुड़ी जरूरी बातें

एक्यूट ल्यूकेमिया में TNM स्टेजिंग की जगह जोखिम के आधार पर वर्गीकरण होता है। CLL में मुख्य रूप से राय या बिनेट स्टेजिंग होती है। CML में बीमारी के चरणों के आधार पर स्टेजिंग की जाती है। लिंफोमा में एन्न आर्बर स्टेजिंग होती है, जिसमें I से IV और A/B कैटेगरी होती है। मायलोमा में R-ISS स्टेजिंग I से III तक होती है। Also Read - बच्चों में प्रोटीन की कमी को न करें अनदेखा, हो सकती हैं उन्हें ये 5 समस्याएं