बच्चा फेल हो गया तो गलती से भी न डांटें, बल्कि ये बातें बोलकर बढ़ाएं कॉन्फिडेंस

Negative Effects of Scolding Kids: बहुत ही कम पेरेंट्स जानते हैं कि बच्चे को डांटने से उनकी मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है। अब जल्दी से परिणाम आने शुरू हो जाएंगे, लेकिन अगर बच्चा परीक्षा में फेल भी हो जाता है तो भी उसे डांटना नहीं चाहिए।

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Written By: Mukesh Sharma | Published : March 17, 2026 7:14 PM IST

Bacho ko Dantne ke Nuksan: बच्चों की परीक्षा लगभग खत्म हो चुकी हैं और अब समय है परिणाम का। परिणाम से बच्चों के साथ ही आप भी बहुत घबराते हैं। लेकिन बच्चा फेल हो जाए तो? आप सोचेंगे यह कैसी बात कर रहे हैं हम, लेकिन सोचकर देखिए बच्चा अगर फेल हो जाए तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? बच्चे का परीक्षा में फेल होना आपके और उसके लिए भावनात्मक रूप से काफी कठिन समय हो सकता है। ऐसे में अक्सर माता-पिता बच्चे को या तो डांटते हैं या उनकी तुलना करने लगते हैं, जो कि बच्चे के आत्मविश्वास को कम करता है। ऐसे में हम कह रहे हैं कि आप उनके फेल हो जाने के बावजूद उनसे प्यार और सकारात्मक शब्दों में बात करें। मुश्किल लग रहा है ना, लेकिन ऐसा करने से बच्चा अब इस हार के बाद खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करेगा।

बच्चे की भावनाओं को समझें

जब बच्चे के परिणाम में फेल लिखा हो, तो बच्चे का पहले से ही निराश और दुखी होना लाजमी है। ऐसे समय में आपका उसे डांटना उसे और ज्यादा हताश कर सकता है। ऐसे में बच्चे को चाहिए कि माता-पिता उसकी भावनाओं को समझें और उसे शांत होकर अपनी बात कहने का मौका दें। इसलिए आप बच्चे से प्यार से बात करें और उसे एहसास दिलाएं कि परीक्षा में असफल होना जीवन की हार नहीं है। आपके इस कदम से बच्चा समझ सकेगा कि उसके माता-पिता उसके साथ हैं, जिससे उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे वापस आने लगेगा।

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प्रोत्साहन देने वाले शब्द बोलें

“तुमने मेहनत नहीं की”, “तुम कभी पास नहीं हो सकते” "हमेशा के लिए इसी क्लास में रह जाओगे", जैसे वाक्य हतोत्साहित कर सकते हैं। इसलिए परिणाम के बाद उसे “कोई बात नहीं, अगली बार और बेहतर करेंगे” या “हमें तुम पर भरोसा है, अगली बार तुम बहुत अच्छा करोगे।” ऐसे शब्द बच्चे के मन में उम्मीद और हिम्मत पैदा करते हैं। इसलिए बच्चे के इस फेलियर के बाद उससे सकारात्मक भाषा में बात करें।

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गलती से सीखने पर जोर दें

आप जानती ही हैं कि फेल होना सीखने का एक मौका होता है। इसलिए बच्चे को समझाने के बाद साथ बैठकर यह समझने की कोशिश करें कि कहां कमी रह गई पढ़ाई का तरीका, समय प्रबंधन या किसी विषय की कमजोरी आदि। यह इसलिए क्योंकि जब समस्या स्पष्ट होगी, तभी उसे सुधारने की योजना स्पष्ट रूप से बनाई जा सकेगी। इस तरह बच्चा अपनी गलती से सीख कर आगे बेहतर प्रदर्शन करने को अग्रसर होगा।

तुलना तो बिल्कुल नहीं

अक्सर फेलियर पर माता-पिता बच्चे की तुलना दोस्तों व रिश्तेदारों से करने लगते हैं। लेकिन आपकी यही आदत बच्चे के आत्मविश्वास को नुकसान पहुंचाती है। हर बच्चे की क्षमता अलग होती है। इसलिए तुलना करने की बजाय उसे सहयोग दें, उसकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना करें और पढ़ाई में सही मार्गदर्शन दें। इससे बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वह दोबारा मेहनत करने के लिए तैयार होगा।

पेरेंट्स के नजरिए से देखा जाए तो बच्चे को फेल होते देखना उनके लिए भी बहुत मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह ध्यान में रखना भी जरूरी है कि हार हमेशा जीत से ज्यादा सिखा कर जाती है। लेकिन सीख सिर्फ तभी मिल पाएगी जब हम हौंसला रखेंगे। इसलिए ऐसे शब्द बोलकर बच्चे का हौसला कम न होने दें। बल्कि अच्छे और प्रोत्साहित शब्द बोलकर बच्चे का हौसला बढ़ाएं ताकि वह आगे आने वाले मौके में और अच्छा कर पाए।

अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्ट‍िकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

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