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Written By: Yogita Yadav | Published : November 17, 2018 1:54 PM IST
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) 17 नवंबर को हर साल वर्ल्ड प्रीमेच्योरिटी डे मनाता है, जिसका उद्देश्य समय पूर्व जन्मे शिशुओं की उचित देखभाल की ओर जागरुकता पैदा करना है। © Shutterstock
रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी (आरओपी) एक गतिशील, समयबद्ध बीमारी है जो जन्म के समय मौजूद नहीं होती। परंतु जन्म के दस दिन के भीतर नजर आने लगती है। यह स्थिति प्री-टर्म शिशुओं की आंखों की समस्या दर्शाती है। जिन्हें आम तौर पर गहन नवजात देखभाल (ऑक्सीजन थेरेपी के साथ या बिना) देने की जरूरत पड़ती है। हालांकि यह केयर उनके जीवन को बचाने में मदद करती है, लेकिन उनकी आंखों के विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। यह भी पढ़ें - प्री-मेच्योर बेबी की केयर में काम आएगी ये तकनीक
जानें आरओपी के बारे में
इस स्थिति को आंख की रेटिना में असामान्य रक्त वाहिकाओं का विकास हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप स्कार्फिंग और रेटिना डिटेचमेंट हो सकता है। आरओपी हल्का हो सकता है और सहजता से इसका उपचार भी हो सकता है, लेकिन कई बार यह गंभीर रूप भी धारण कर सकता है। जिसमें रक्त वाहिकाओं में असामान्य गति से बढ़ोतरी होती है और वह अंधेपन का भी कारण बन सकता है। यह भी पढ़ें – शोध ने भी माना, बेटे मां पर ही जाते हैं, ऐसे निपटें किशोरावस्था की समस्याओं से
सही समय पर हो स्क्रीनिंग
आरओपी आमतौर पर जन्म के दो-तीन सप्ताह बाद शुरू होता है। सही समय पर स्क्रीनिंग और उपचार शुरू करने से इस समस्या को जल्दी काबू में किया जा सकता है। क्योंकि शिशु उस समय तक नियोनेटल केयर में अस्पताल में ही होता है। यह भी पढ़े - इन कारणों से हो सकती है प्री मेच्योर डिलीवरी, ऐसे करें बचाव
संवेदनशील हैं 30 दिन
हालांकि, जन्म के 30 दिनों से पहले उचित रेटिनल एक्जामिनेशन के द्वारा आरओपी का पता लगाकर लेजर उपचार शुरू किया जा सकता है। प्री टर्म बेबीज की देखभाल के लिए थर्टी डेज ऑफ विजन अर्थात तीस दिन रोशनी के नारा होना चाहिए। ताकि कोई भी प्री मेच्योर बेबी आरओपी की समस्या से ग्रसित न हो। अभी तक प्रशिक्षित विशिक्षित चिकित्सा अधिकारियों और प्रीटर्म बेबीज की केयर के बीच खासा फासला है। हमें इस फासले को खत्म करने की जरूरत है। ताकि समय पूर्व जन्मे शिशुओं को बेड साइड पर ही उचित और अपरिहार्य देखभाल मिल सके। इसके बाद हमें इस राह में आने वाली अन्य कठिनाइयों और चुनौतियों पर भी सिलसिलेवार और प्रभावी ढंग से काम करना होगा।
पता चला है कि आरओपी लेजर द्वारा इलाज किया जा सकता है। "टीस दीन रोशनी के" (विजन के लिए तीस दिन) एक नारा बनना चाहिए जो सभी पूर्व-अवधि के बच्चों के लिए लागू किया गया है। पहली रेटिना स्क्रीनिंग प्रभावी ढंग से और समय पर प्राप्त करने में असमर्थता एक बड़ा अंतर है जिसे संबोधित करने की आवश्यकता है। बच्चों के लिए बेडसाइड पर प्रभावी उपचार देने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की कमी, विशेष रूप से जो अभी भी महत्वपूर्ण देखभाल में हैं, और फिर फॉलो-अप की कठिनाइयों को संबोधित करने की आवश्यकता है।
इन शिशुओं में ज्यादा होता है जोखिम
क्रोनिकहाइपोक्सिया (ऑक्सीजन की कमी), इंट्रायूटरिन वृद्धि मंदता और प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर स्थितियां आरओपी के सबसे आम जोखिम हैं । 34 सप्ताह की गर्भावस्था के तहत पैदा हुए और 2,000 ग्राम से कम वजन वाले शिशुओं में इसका सबसे ज्यादा जोखिम देखा जाता है। आरओपी के लिए जन्म से 20-30 दिनों का समय सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जाता है। इसलिए जरूरी है कि इसी समय में उचित जांच एवं उपचार प्रारंभ किया जाए।
पूरक ऑक्सीजन और उच्च कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर आरओपी को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक माने जाते हैं। नियोनेटल इन्क्यूबेशन के दौरान प्रीमेच्योर बेबीज को मिश्रित ऑक्सीजन प्रदान की जानी चाहिए। पल्स ऑक्सीमटर के द्वारा इसकी सख्ती से जांच और नियंत्रण किया जाता रहना चाहिए। इस स्थिति से जुड़े अन्य जोखिमों में एनीमिया, ब्रैडकार्डिया (कम दिल की दर), रक्त संक्रमण और इंट्रावेंट्रिकुलर हेमोरेज (मस्तिष्क में खून बह रहा है) शामिल हैं।
जरूरत है सजगता की
प्रसव पूर्व जन्मे बच्चों के लिए वर्ष 1941 मे बोस्टन में पहला नियोनेटल इन्क्यूबेटर तैयार किया गया था। जबकि उसके अगले ही साल वर्ष 1942 में आरओपी का पहला मामला सामने आया। इसलिए यह जरूरी है कि प्रीमेच्योर बेबीज की देखभाल में गहन सतर्कता बरती जाए, ताकि उन्हें जीवन भर दृष्टि संबंधी बाध्यताओं का सामना न करना पड़े।
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