नवजात में दिखें ये 5 लक्षण, तो तुरंत समझ जाएं कि डाउन सिंड्रोम का है खतरा

21 मार्च के दिन को World Down Syndrome Day के रूप में दुनिया भर में मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य इस रोग के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना है। डाउन सिंड्रोम एक आनुवांशिक विकार है जिससे आमतौर पर छोटे बच्चे प्रभावित होते हैं। आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से..

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Written By: Gulshan Kumar | Published : March 21, 2024 9:40 AM IST

नवजात बच्चों में जन्म के साथ ही कई तरह की बीमारियां होती हैं। हालांकि कुछ ऐसे भी रोग होते हैं जो जन्म से कुछ साल बाद अपने आप ठीक हो जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी रोग लेकर बच्चा पैदा होता है जो जीवन भर कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाते हैं। ऐसे ही एक रोग का नाम है 'डाउन सिंड्रोम'। डाउन सिंड्रोम नवजात बच्चों में आने वाला एक आनुवांशिक विकार है। इस रोग में बच्चे के क्रोमोसोम प्रभावित होते हैं। इस रोग से प्रभावित देखने में सामान्य लग सकता है लेकिन इस बच्चे की मानसिक क्षमता अन्य बच्चों की तुलना में कम हो सकती है। आज इस रोग से बहुत बड़ी संख्या में बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले अमेरिका में हर साल लगभग 6 हजार बच्चे डाउन सिंड्रोम रोग के साथ पैदा होते हैं। आइए जानते हैं क्या है ये रोग..

क्या है डाउन सिंड्रोम? (What is Down Syndrome?)

हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो बच्चा जब पैदा होता है तो उसके शरीर में 46 क्रोमोसोम होते हैं, जो उसे अपने माता-पिता से आनुवांशिक रूप से मिले होते हैं। वहीं डाउन सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के शरीर में 21वां क्रोमोसोम अतिरिक्त होता है। इस तरह इस बच्चे के शरीर में कुल 47 क्रोमोसोम हो जाते हैं, जो उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में बाधा पैदा करते हैं। वहीं कुछ हेल्थ एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि जो महिलाएं 35 साल की आयु के बाद बच्चा प्लान करती हैं, उनके बच्चे के साथ ऐसी स्थिति होने की संभावना अधिक हो जाती है।

डाउन सिंड्रोम के लक्षण (Symptoms of Down Syndrome)

  • आंखों का ऊपर की ओर उठा होना।
  • आंखों से तिरछा देखना।
  • जीभ का मोटा या चपटा होना।
  • मुंह और सिर का साइज छोटा होना।
  • गर्दन का छोटा होना।
  • हाथ-पैरों का साइज भी छोटा होना।
  • सामान्य से कम लंबाई होना।

ऐसे बच्चों का कैसे रखें ख्याल (How to take care of children with Down syndrome)

डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों का ख्याल हमें थोड़ा ज्यादा रखने की जरूरत होती है। जिसका कारण है कि इन्हें अन्य बच्चों की तुलना में संक्रमण का खतरा भी ज्यादा होता है।

  1. इसलिए आप ऐसे बच्चों को संतुलित आहार दें, इसके साथ ही इन्हें रोजाना शारीरिक व्यायाम जरूर कराएं।
  2. डेली थोड़ी देर का व्यायाम ऐसे बच्चों को शारीरिक रूप से एक्टिव रखने में काफी मदद करेगा।
  3. वहीं डाइट और एक्सरसाइज से इनकी इम्यूनिटी भी बूस्ट हो जाएगी।
  4. इसके अलावा इन बच्चों को स्पीच थेरेपी भी काफी फायदा करती है, इससे उनकी बोलचाल की समस्या दुरुस्त होती है।

Disclaimer- यह लेख आपकी सामान्य जानकारी के लिए है, इसका उद्देश्य किसी विशेषज्ञ की सलाह का विकल्प बनना नहीं है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले एक बार हेल्थ एक्सपर्ट की राय जरूर लें।

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