प्रीमेच्योर बच्चों को लंबे समय तक परेशान करती हैं ये 5 स्वास्थ्य समस्याएं, माता-पिता को होनी चाहिए पता

World Prematurity Day 2025: क्या आपका बच्चा भी प्रीमैच्योर हुआ है? अगर हां तो आपको पता होना चाहिए कि बच्चे को आगे चलकर कौन-कौन सी स्वास्थ्य समस्याओं हो सकती हैं। आइए डॉक्टर से जानते हैं।

प्रीमेच्योर बच्चों को लंबे समय तक परेशान करती हैं ये 5 स्वास्थ्य समस्याएं, माता-पिता को होनी चाहिए पता

Written by Vidya Sharma |Published : November 17, 2025 4:41 PM IST

Premature Bacho Ko Kya Pareshani Hoti Hai:विश्व प्रीमैच्योरिटी डे हर साल यह याद दिलाता है कि समय से पहले जन्मे बच्चों (प्रीटर्म बेबी) को जीवन की शुरुआत से ही कई स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। WHO के अनुसार दुनिया में हर 10 में से 1 बच्चा समय से पहले जन्म लेता है। भारत में भी यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। समय रहते जागरूकता और सही देखभाल से इन बच्चों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है। 

इसलिए आप तक सही जानकारी पहुंचाने के लिए हमने खास विश्व प्रीमेच्योरिटी डे 2025(World Prematurity Day)नेचर की गायनेकोलॉजिस्ट और आईवीएफ एक्सपर्ट डॉक्टर अर्चना धवन बजाज से बात की, उन्होंने प्रीमेच्योर बच्चे को अपने आने वाले जीवन में कौन-कौन सी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, इनके बारे में बताया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि आखिर बच्चों को इतनी परेशानी होती क्यों है! आइए जानते हैं डॉक्टर ने क्या जानकारी साझा की।

डॉक्टर ने बताया प्रीटर्म बेबी को जोखिम क्यों होता है?

डॉक्टर अर्चना ने बताया कि 'प्रीटर्म बेबी का जन्म आमतौर पर 37 सप्ताह से पहले हो जाता है। ऐसे में उनके कई अंग, जैसे फेफड़े, दिमाग, पाचन तंत्र, प्रतिरक्षा प्रणाली आदि यह सब पूरी तरह विकसित नहीं होते। इसी कारण उन्हें लंबी अवधि तक विशेष देखभाल की जरूरत पड़ती है।' कारण तो आपने जान लिए, अब आइए जानते हैं प्रीटर्म बच्चा कौन-कौन सी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझता है।

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सांस संबंधी समस्याएं

प्रीटर्म बच्चों में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोमऔर अस्थमा जैसे खतरे अधिक होते हैं। जिनके लिए डॉक्टर ने बताया कि 'कई प्रीमैच्योर बच्चों के फेफड़े जन्म के समय पूरी तरह विकसित नहीं होते, जिससे उन्हें शुरुआती महीनों में ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है। दीर्घकाल में इन्हें बार-बार खांसी, सांस लेने में दिक्कत या संक्रमण का जोखिम रहता है।'

दिमाग और न्यूरोलॉजिकल विकास में देरी

प्रीमेच्योर यानी कि प्रीटर्म बच्चों में केरेबरल पलसी, सीखने में कठिनाई, ADHD और मानसिक विकास में देरी की संभावना अधिक पाई जाती है। डॉक्टर कहती हैं कि 'जिन बच्चों का जन्म 32 सप्ताह से पहले होता है, उनमें न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का खतरा सामान्य बच्चों की तुलना में 3–4 गुना अधिक होता है। इसलिए समय पर फॉलो-अप, थेरेपी और शुरुआती दिमागी विकास गतिविधियां बेहद महत्वपूर्ण हैं।'

आंख और कान की कमजोरी

प्रीटर्म शिशुओं में रेटिनोपैथी ऑफ प्री-मैच्योर होने का खतरा अधिक होता है, जो समय पर जांच न होने पर दृष्टि कमजोर कर सकती है। इसके अलावा सुनने की क्षमता भी कुछ बच्चों में प्रभावित हो सकती है। नियमित आई स्कैन और हियरिंग टेस्ट अनिवार्य माने जाते हैं।

कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली

क्योंकि बच्चे का पूरा विकास होने से पहले ही दुनिया में आ गया, इसलिए ऐसे बच्चों में संक्रमण, निमोनिया, जुकाम-बुखार और पेट के इंफेक्शन जल्दी होते हैं। डॉक्टर अर्चना के अनुसार 'प्रीटर्म बेबी का इम्यून सिस्टम काफी कमजोर होता है, इसलिए टीकाकरण समय पर और कभी-कभी अतिरिक्त सुरक्षा खुराक के साथ किया जाता है।'

हृदय और पाचन तंत्र संबंधी समस्याएं

प्रीमेच्योर बच्चे में पैटर्न डक्टस आर्टेरियोसस और और पेट के गंभीर रोग जैसे नेक्रोटाइज़िंग एंटरोकोलाइटिस का खतरा रहता है। लंबी अवधि में पाचन संबंधी संवेदनशीलता या भूख कम लगना जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं।

देरी से होती है प्रीमेच्योर बच्चे की ग्रोथ

माता-पिता को पता होना चाहिए कि उनके बच्चे को ग्रोथ से जुड़ी समस्याएं भी परेशान कर सकती हैं जैसे- 

  • वजन और लंबाई सामान्य बच्चों की तुलना में धीरे-धीरे बढ़ती है। नियमित ग्रोथ मॉनिटरिंग और न्यूट्रिशन प्लान आवश्यक होता है।
  • पेरेंट्स को क्या करना चाहिए?
  • नियमित डॉक्टर फॉलो-अप
  • समय पर टीकाकरण
  • विकास और सीखने संबंधी प्रगति पर नजर
  • डॉक्टर द्वारा सुझाई गई थेरेपी
  • पोषण पर विशेष ध्यान
  • संक्रमण से बचाव

डॉक्टर क्या सलाह देते हैं?

डॉक्टर का कहना है कि प्रीटर्म बच्चे सही देखभालऔर समय पर मेडिकल फॉलो-अप से पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। शुरुआती 2 साल इनकी ग्रोथ और ब्रेन डेवलपमेंट के लिए सबसे अहम होते हैं। विश्व प्रीमेच्योरिटी डे 2025 का संदेश स्पष्ट है- समय से पहले जन्मे बच्चों की चुनौतियां बड़ी जरूर हैं, लेकिन सही जानकारी, जागरूकता और नियमित देखभाल से इन्हें दूर किया जा सकता है। जल्दी पहचान, सही उपचार और माता-पिता की सतत निगरानी इन बच्चों के जीवन को मजबूत भविष्य देती है।

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Highlights

  • माता-पिता को प्रीमेच्योर बच्चे की देखभाल सही तरीके से करनी चाहिए।
  • प्रीमेच्योर बच्चे के शरीर का पूरा विकास नहीं हुआ होता है, इसलिए उन्हें कई स्वास्थ्य समस्याएं परेशान करती हैं।
  • प्रीमेच्योर बच्चे की देखभाल करें और उन्हें पोषण युक्त आहार दें।

Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।