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छोटी उम्र से ही बताएं बच्चों को मनी मैनेज करने की एबीसीडी

मनी मैनेजमेंट एक कन्टीन्युअस प्रॉसेस है जो बच्चों में छोटी उम्र से ही शुरू कर देनी चाहिए। ऐसे में उन्हें समय रहते व सही उम्र में ही पैसे के मोल को समझाना चाहिए।

रुपये-पैसे से प्यार, रिश्ते-नाते भले ही नहीं खरीदे जा सकते मगर इसके मूल्य को समझते हुए ठीक ढंग से और सही जगह खर्च किया जाए तो क्या कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। लेकिन जिसने पैसे की कद्र नहीं की उसे बुरा दिन भी देखना पड़ता है। मनोचिकित्सक अरुणा ब्रूटा कहती हैं कि आज के टीनएजर्स जिस तरह अपने पेरेंट्स की कमाई को मौजमस्ती, शॉपिंग, रेस्तरां, डिस्को पार्टी, पब, मॉल्स में पानी की तरह बहाते हैं, उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है जैसे उन्हें पैसे के वैल्यू के बारे में पता ही नहीं। इसमें पेरेंट्स भी कहीं न कहीं जिम्मेदार होते हैं क्योंकि वे अपने बच्चों को सही उम्र रहते ही मनी मैनेजमेंट के बारे में नहीं समझाते।

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प्यार-दुलार में अक्सर पेरेंट्स बच्चों की सभी जरूरतों को पूरा करते चले जाते हैं, जिससे बच्चों को लगने लगता है कि वह जो चाहेंगे उन्हें तुरंत मिल जाएगा। ऐसा करने से बच्चे गलत राह पर भी निकल सकते हैं। उनके मन में जरा भी यह ख्याल नहीं आता की उनके पेरेंट्स इस पूंजी को जुटाने के लिए कितनी मेहनत करते हैं। अरुणा ब्रूटा के अनुसार, “मनी मैनेजमेंट एक कन्टीन्युअस प्रॉसेस है जो बच्चों में छोटी उम्र से ही शुरू कर देनी चाहिए। ऐसे में उन्हें समय रहते व सही उम्र में ही पैसे के मोल को समझाना चाहिए। आज पेरेंट्स का बच्चों को हर महीने पॉकेट मनी देना फैशन सा बन गया है जो गलत बात नहीं बशर्ते कि उसका इस्तेमाल सही जगह किया जाए। बच्चों को फाइनेंशियली लिट्रेट करना हालांकि थोड़ा कठिन हो सकता है पर जितनी जल्दी वे यह गुण विकसित कर लेंगे, उनके खुद के भविष्य के लिए बेहतर होगा।

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मनी मैनेजमेंट और पैसों के वैल्यू को समझाने के लिए निम्न बातों पर गौर करें

1 बच्चों के कंधों पर भी घर की कुछ जिम्मेदारियां सौंपें ताकि वे पैसे के महत्व को समझ सकें। जब तक वे खुद से पैसे मैनेज करना नहीं सीखेंगे उन्हें कुछ भी समझ नहीं आएगा।

2 बच्चों को समझाएं कि पैसे कहां और कितनी मेहनत करने के बाद कमाया जाता है।

3 वैसे मनी गेम्स खेलें जिसमें पैसे इस्तेमाल करने के तरीके और मूल्यों पर दबाव दिया जाता हो जैसे लाइफ, पे डे, मोनोपॉली जूनियर।

4 पहली बार यदि बच्चा कहीं से पैसे कमाता है या उपहार में मिली राशि को कहां और कैसे खर्च किया जाए बताएं। खरीदारी के ऑप्शन बताएं लेकिन निर्णय उन्हीं को लेने दें।

5 उनके पैसे अपने पास रखने के बजाय उन्हें ही रखने को कहें ताकि उन्हें खर्च के बारे में पता चल सके और अपनी चीजों को सुरक्षित रखना जान सकें।

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6 बच्चों को शॉपिंग या राशन की दुकान पर ले जाएं और उनसे खरीदारी करने में मदद लें ताकि इस महंगाई में जरूरी और महत्वपूर्ण सामान ही वे लें।

7 यदि बच्चा पैसों का इस्तेमाल सही जगह या सही ढंग से नहीं करता है तो उन्हें टोकें नहीं। टोकने पर वे पूअर मनी मैनेजमेंट का परिणाम क्या होता है नहीं जान पाएंगे।

8 किसी चीज की जरूरत और चाहत में फर्क करना समझाएं। खरीदारी इन्हीं दो बातों को ध्यान में रख कर करना सिखाएं।

9 यदि उनके पास कोई ऐसी वस्तु या सामान है जिसकी जरूरत उन्हें नहीं तो उसे किसी को दान करना या गैराज में बेचने के बारे में बताएं बजाए उसे फेक देने के।

10 खुद भी अच्छे मनी मैनेजमेंट बनें क्योंकि आपसे बेहतर और शक्तिशाली कोई और फाइनैनशियल एजुकेशन उन्हें नहीं दे सकता।

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11 पॉकेट मनी उतनी ही दें जितने में उनका काम चल जाता है। बचने पर उन्हें संभाल कर रखने को बोलें।

12 अन्य खर्चे जैसे मोबाइल फोन और पेट्रोल के खर्च के लिए एक महीने में निश्चित राशि बांध दें, यदि खर्च अधिक हो जाए तो उनसे उतने में ही काम चलाने को बोलें।

उम्र के हिसाब से मनी मैनेजमेंट

पांच से दस साल के बच्चे- इस उम्र में बच्चे सिक्का जमा करने के शौकीन होते हैं। हालांकि, उन्हें इसकी कीमत समझ नहीं आती। इसलिए पेरेंट्स को उम्र के इसी पड़ाव से पैसों के मूल्यों के बारे में चर्चा करना शरू कर देना चाहिए। उन्हें अपने साथ खरीदारी के लिए ले जाएं, पूरे महीने के घर का खर्च, हिसाब-किताब, कहां कितना पैसा लगता है सब बताएं। फैमिली पिगी बैंक में बचत करना सिखाएं और बताएं कि यह भविष्य में कितने काम आ सकता है। पॉकेट मनी देते हैं तो बचे हुए पैसे को जमा करने के लिए कहें और बताएं कि ऐसा करने से वे अपनी पसंदीदा सामान खरीद सकते हैं।

ग्यारह से पंद्रह साल के बच्चे- इस उम्र में बच्चों के लिए कमाने की कई संभावनाएं होती हैं। आप उन्हें बैंक ले जाएं और उनका खुद का सेविंग अकाउंट खोलने को कहें। सेविंग्स में कमाए हुए पैसे डालने की आदत अभी से होगी तो उनके भविष्य के लिए भी बेहतर होग। इससे उन्हें अर्निंग की महत्वता का अहसास होगा।

सोलह से बीस वर्ष के बच्चे- इस उम्र में कई टीन्स पार्ट टाइम जॉब करते हैं और उनमें इतनी समझ आ जाती है कि जीविका अर्जित करना कितना संघर्षपूर्ण और महत्वपूर्ण होता है। पारिवारिक बजट की योजना और उसकी चर्चा उनके सामने करें। उन्हें अकाउंट चेक करना और एटीएम कार्ड चेक करना बताएं। उन्हें यह भी बताएं की वे अपने बड़े खर्च जैसे अपनी पहली कार, बाइक या फिर पढ़ाई के खर्च के लिए अभी से प्लानिंग करें। ऐसा करने से टीन्स अपने कपड़े और दूसरी जरूरतों के लिए रिसपॉनसिबल हो जाएंगे। इससे उन्हें मोल-भाव, महंगाई का पता चल जाएगा और वे अपनी चीजों को संभाल कर रखना भी सीख जाएंगे।

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