Premature Delivery : 24 हफ्तों में हुआ जन्म, एनआईसीयू में सफलतापूर्वक बचाई गई नवजात शिशु की जान

24 सप्ताह में जन्मे शिशु की जान बचाना लगभग न के बराबर संभव होता है, लेकिन गुरुग्राम स्थित सीके बिरला अस्पताल के एनआईसीयू में न सिर्फ शिशु की जान बचाई गई, बल्कि 86 दिन की निगरानी के बाद उसे बिल्कुल स्वस्थ अवस्था में डिस्चार्ज किया गया।

WrittenBy

Written By: Anshumala | Published : March 27, 2020 4:53 PM IST

आमतौर पर एक स्वस्थ शिशु का जन्म 36 सप्ताह (9 महीने) में होता है, लेकिन कई बार कुछ प्रीमैच्योर डिलीवरी  (Premature baby care)  यानी समय से पूर्व भी कुछ शिशुओं का जन्म होता है। इसमें 7 या 8 महीने में जन्में शिशुओं को कोई ना कोई समस्या होती है या फिर गर्भवती मां को कोई तकलीफ होती है, तब डिलीवरी (Premature delivery) करानी पड़ती है, लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे बच्चे के बारे में सुना है, जिसका जन्म मात्र 24 हफ्तों में हुआ हो? 24 सप्ताह में जन्मे शिशु की जान बचाना लगभग न के बराबर संभव होता है, लेकिन गुरुग्राम स्थित सीके बिरला अस्पताल के एनआईसीयू में न सिर्फ शिशु की जान बचाई गई बल्कि 86 दिन की निगरानी के बाद उसे बिल्कुल स्वस्थ अवस्था में डिस्चार्ज किया गया।

क्यों कराया गया समय से पूर्व डिलीवरी

मां के गर्भ में एमनियोटिक फ्लूइड की कमी के कारण डिलीवरी जल्दी करनी पड़ी। ऐसा न करने पर जच्चा और बच्चा दोनों की जान जा सकती थी। जन्म के दौरान शिशु का वजन केवल 690 ग्राम था, जिसके कारण उसके सर्वाइवल में काफी मुश्किलें आईं। चूंकि, फेफड़े पूरी तरह से विकसित न होने के कारण उसे सांस लेने में समस्या आ रही थी, इसलिए उसे वेंटिलेटर पर रखा गया, ताकि उसे एप्निया की स्थिति से बचाया जा सके। इस स्थिति में शिशु सांस लेना भूल जाता है, जिससे उसकी जान का खतरा रहता है।

समय से पहले जन्मे शिशु की देखभाल करते वक्त रखें इन 5 बातों का ख्याल

24 हफ्तों में जन्मे शिशुओं को बचाना होता है बेहद मुश्किल

जिन बच्चों का जन्म निर्धारित समय से 25 हफ्ते पहले हो जाता है, उन्हें नियोनेटल इंटेन्सिव केयर यूनिट में रखा जाता है, जहां उनकी खास देखभाल की जाती है। भारत में ऐसे बच्चों का जीवनदर केवल 5% है। 24 हफ्तों में जन्मे शिशुओं को बचाना बेहद मुश्किल होता है। वहीं इस मामले में एनीमिया के कारण शिशु को मल्टिपल ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत थी। चूंकि, आंते भी पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाई थीं, इसलिए उसे जिंदा रखने के लिए 56 दिनों तक नसों द्वारा फीड कराया गया।

हॉस्पिटल के नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ खन्ना ने कहा कि यह केस हाई रिस्क प्रेग्नेंसी और प्रीमैच्योर बेबी वाले कई दंपत्तियों के लिए आशा की नई किरण की तरह है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ऐसे कई मामले हैं, जहां 26 हफ्तों में जन्मे शिशु को जिंदा रहने का मौका तक नहीं दिया जाता है। एक टर्टियरी केयर अस्पताल, जहां समय से पहले जन्मे शिशुओं की देखभाल संबंधी सभी चीजें उपलब्ध हों, ऐसे मामलों में शिशु के जीने की संभावना को बढ़ाता है।

समय से पहले जन्मे बच्चे को स्तनपान कराने से दिल के रोगों को रोका जा सकता है, जानें समय व तरीका

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, विश्वस्तर पर प्रीमैच्योर बेबी के शीर्ष 10 देशों की लिस्ट में 60% के साथ भारत पहला स्थान रखता है। भारत में लगभग 3.5 मिलियन यानी कि 24% बच्चों का जन्म समय से पहले हो जाता है। डब्ल्यूएचओ ने बताया कि 37 हफ्तों के गेस्टेशन से पहले जन्मे शिशु को प्रीमैच्योर बेबी कहा जाता है। वहीं भारत में, केवल 28 हफ्तों में जन्मे शिशुओं को जिंदा बच्चों की श्रेणी में गिना जाता है, जबकी 24-27 हफ्तों के शिशुओं को इसमें गिना ही नहीं जाता है।

हॉस्पिटल की नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. श्रेया दूबे ने बताया कि हमारे देश में हेल्थकेयर सिस्टम पर इतना दबाव बना हुआ है कि इस प्रकार के मामलों को नजरअंदाज़ कर दिया जाता है। वर्तमान में प्रीमैच्योर जन्म के बारे में जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है।