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बच्चों से खाने को लेकर पेरेंट्स साल में 2 हजार बार उलझते हैं : अध्ययन

एक शोध में कहा गया है कि पेरेंट्स अपने बच्चों से एक साल में लगभग 2,184 बार उलझते हैं। एक महीने में 182 बार, एक सप्ताह में 42 बार या फिर प्रतिदिन कहें तो 6 बार उलझते हैं।

बच्चों से खाने को लेकर पेरेंट्स साल में 2 हजार बार उलझते हैं : अध्ययन
Stay calm and have patience while dealing with your kids. © Shutterstock

Written by Anshumala |Published : July 30, 2018 4:23 PM IST

खाने के टेबल पर बैठते ही पेरेंट्स का खासकर मांओं की जद्दोजहद उनके बच्चे को खिलाने के लिए शुरू हो जाती है। अधिकतर घरों में यह सीन आपको देखने को मिल जाएगा। लगभग सभी बच्चे खाना खाने में नखरे करते हैं। उन्हें खिलाना किसी टास्क से कम नहीं होता है। माएं उन्हें टेबल पर बिठाती हैं, उनके पीछे-पीछे भागती हैं, लेकिन वे फिर भी नहीं खाते। जिद पकड़ ली तो बस, किसी की नहीं सुननी। सब्जी नहीं खानी, तो नहीं खानी। खासकर टीनएजर्स बच्चे हों, तो मां से खाने को लेकर बहस तक कर लेते हैं।

यह कोई आज के जमाने की बात नहीं। पहले के जमाने में भी हर घरों में खाने-पीने के लिए अभिभावकों को अपने बच्चों के पीछे सिर खपाना ही पड़ता था। ये नहीं खाना, वो नहीं खाना। जब पुराने जमाने में आप खुद ऐसा करते थे, तो जरा सोचिए कि आज के बच्चे कहां आपकी सुनेंगे। उन्हें तो हर चीज अपनी फेवरेट चाहिए। खाने के मामले में बच्चों की पसंद और नापसंद पक्की होती है। उसे कोई नहीं बदल सकता। मांएं अगर जबरदस्ती खिलाना भी चाहें, तो उनमें बहस तक होने की नौबत आ जाती है।

पेरेंट्स तो सिर्फ अपने बच्चों को पौष्टिक चीजें खिलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन आजकल के बच्चों को सिर्फ स्वाद चाहिए, पौष्टिकता से उन्हें कोई लेना-देना नहीं। आज खाने के विकल्प इतने बढ़ गए हैं कि उन्हें घर का खाना अच्छा ही नहीं लगता। खाते भी हैं, तो ऐसा लगता है मजबूरी में खा रहे हैं।

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हाल ही में जर्मनी में एक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन को किया है जर्मनी की पैक्ड जूस बेचने वाली कंपनी कैप्री-सन ने। अध्ययन में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। आंकलन में कहा गया है कि पेरेंट्स अपने बच्चों से एक साल में लगभग 2,184 बार उलझते हैं। एक महीने में 182 बार, एक सप्ताह में 42 बार या फिर प्रतिदिन कहें तो 6 बार उलझते ही हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि पेरेंट्स अपने बच्चों को समझाने में हर दिन लगभग 16 मिनट खर्च करते हैं। यह भी सामने आया कि ये सभी बहस या झगड़े अधिकतर खाने को लेकर ही होते हैं। और अधिकतर मामलों में पेरेंट्स को हार मानकर बच्चों की जिद पूरी करनी पड़ती है।

हालांकि, यह शोध यूरोप के अभिभावकों और उनके बच्चों पर किया गया है, लेकिन इसके नतीजे देखकर ऐसा लगता है कि भारत में भी बहुत कुछ सीन ऐसा ही है। अधिकतर घरों में पेरेंट्स और बच्चों के बीच बहस होती ही है खासकर खाने-पीने को लेकर, पसंद-नापसंद को लेकर। ऐसे में जरूरी है कि पेरेंट्स समझदारी से काम लें। बच्चों के साथ किसी भी चीज के लिए जबरदस्ती ना करें। उन्हें प्यार से समझाएं। उल्टा-सीधा हमेशा खाने से उनकी सेहत पर क्या नुकसान हो सकता है, इस बारे में बताएं। बीच-बीच में उनकी पसंद का कुछ सरप्राइज बनाकर दें। शायद, इस तरीके से वे हेल्दी खाना शुरू कर देंगे। बहुत ज्यादा डिमांडिंग नहीं रहेंगे।

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चित्रस्रोत: Shutterstock.

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