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Written By: Editorial Team | Updated : January 4, 2017 5:53 PM IST
आजकल मनोरंजन का नाम केवल फिल्म देखना ही रह गया है। खासकर शहरों में फिल्में देखने का ज्यादा चलन है। लोग हर वीकेंड पर बच्चों के साथ सिनेमाघर पहुंच जाते हैं। उन्हें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस तरह की फिल्म है, उन्हें देखनी है, तो बस देखनी है। लेकिन आपको बता दें कि बच्चों के साथ सभी तरह की फिल्में नहीं देखनी चाहिए। कई फिल्मों को यू/ए सर्टिफिकेट मिलता है बावजूद इसके आपको अपने बच्चों को इस तरह की फिल्में नहीं दिखानी चाहिए। जाहिर है हाउसफुल, ग्रैंड मस्ती जैसी कई फिल्में हैं जिनमें कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता भरी हुई है लेकिन इस तरह की कई फिल्मों को यू सर्टिफिकेट नहीं मिला है। सीधी से बात है बच्चों को यू या यू/ए सर्टिफिकेट के बारे में नहीं पता होता है। ऐसे में माता-पिता की ही ये जिम्मेदारी होती है कि वो अपने बच्चों को कैसी फिल्में दिखाएं और कैसी नहीं।
कई बार ऐसा हो सकता है जब आपका इस तरह की फिल्में देखना का मन कर सकता है। ऐसे में आप अपने बच्चों को भी साथ ले जाते हैं। कई लोगों का ऐसा मत है कि बच्चे तो सिनेमा हॉल में सो जाते हैं। जरा सोचिये क्या सिनेमा हॉल के साउंड में बच्चे सो सकते हैं? अगर आपको इस तरह की फिल्म देखनी ही है, तो जब आपका बच्चा सो जाए तब डीवीडी पर देख लें। बेशक इससे आपका मजा कुछ कम हो सकता है लेकिन आपके बच्चे के लिए यह एक बेहतर फैसला साबित हो सकता है।
टीवी पर संवेदनशील दृश्य आने पर आप क्या करते हैं?
म्यूजिक चैनल पर आइटम सॉंग आने पर आपको क्या करना चाहिए? इसका आसान जवाब है चैनल बदल दो। न्यूज़ चैनल पर अगर कोई रेप या मर्डर से रिलेटेड न्यूज़ आ रही है, तो भी चैनल चेंज कर दें। जब बच्चा रूम में ना हो या वो स्कूल गया हो, तभी इस तरह के चैनल देखें। इसी तरह बिग बॉस, गेम ऑफ थ्रोन जैसे शो से भी बच्चों को दूर रखें।
बच्चों को नासमझ न समझें
क्या आप ऐसा सोचते हैं कि टीवी या थिएटर स्क्रीन पर जो दिख रहा है या बोला जा रहा है आपके बच्चे को उसका मतलब नहीं पता है और वो नहीं समझता है? अगर आप ऐसा सोचते हैं, तो आप बिल्कुल गलत हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि लगातार 15 मिनट तक टीवी देखने से बच्चे की क्रिएटिविटी घटती है। जरा सोचिये अगर वो दो घंटे से आपके साथ मूवी देख रहा है, तो क्या होगा।
बच्चों को रियलिटी से वाकिफ कराएं
कई बार ऐसा होता है कि जब टीवी या बड़े पर्दे पर कोई संवेदनशील सीन आता है, तो लोग अपने बच्चे को आंखें बंद करने की सलाह देते हैं। क्या ऐसा करना अजीब नहीं है? वास्तव में कई परिजन अपने बच्चों के लिए मनोरंजन के कुछ साधन ही नहीं छोड़ते हैं। इसलिए ऐसी फिल्में देखने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचता है। जाहिर है आपका ज़माना कुछ और था। उस पुराने समय में फिल्म देखने में इतना मजा नहीं आता था क्योंकि उस दौरान इस तरह की मसाला फिल्में नहीं बनती थी साथ ही पॉपकॉर्न अन्य तमाम चीजों का भी झमेला नहीं था। इसलिए अपने बच्चों को हर हफ्ते सिनेमाघर ले जाने की बजाय उन्हें रियलिटी से वाकिफ कराएं।
जाहिर है कई सिनेमाघर बच्चों को ए रेटेड फिल्में दिखाने के लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन एक जिम्मेदार परिजन होने के चलते अपने बच्चों को इस तरह की फिल्में देखने से रोकना और समझाना आपकी जिम्मेदारी है।
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अनुवादक – Usman Khan
चित्र स्रोत - Shutterstock