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Written By: Editorial Team | Updated : January 4, 2017 5:53 PM IST
कुछ दिनों पहले मैं एक सिंगल मदर से बात कर रही थी जिनके 2 साल के बच्चे ने उसके पिता के बारे में पूछा क्योंकि उसके साथ खेलने वाले बाकी बच्चे उससे पूछते रहते हैं कि उसके ‘डैडी’ कहां हैं। मेरी सहेली ने कहा कि किस तरह उसने अपने बच्चे से बात की और बताया कि कुछ परिवार अलग होते हैं। उसने बताया कि वह मानती है कि बाकी पैरेंट्स को भी अपने बच्चों से इस बारे में बात करनी चाहिए और उन्हें संवेदनशील बनाएं और समझाएं कि किस तरह सारे परिवार एक जैसे नहीं होते। मैं उसकी इस बात से प्रभावित हो गयी। जहां ज़्यादातर अभिभावक अपने बच्चों को शिष्टाचार सिखाने के लिए किसी भी हद तक जाते हैं, वहीं हममें से कितने लोग हैं जो बच्चों को इस प्रकार की संवेदनशील बातें सिखाने की कोशिशें करते हैं? ईमानदारी से कहूं, तो मैंने इससे पहले इस बारे में बिल्कुल नहीं सोचा था। इस चर्चा के बाद मैंने कुछ और मांओं के साथ इस बारे में चर्चा की और हम सारी मांओं ने बच्चों को संवेदनशील या सेंसटिव बनाने के लिए यह तरीके ढ़ूढ़ें।
शारीरिक रुप से अलग बच्चों के प्रति बच्चों को संवेदनशील बनाएं
अगर आपका बच्चा किसी ऐसे बच्चे को देखे जो शारीरिक रुप से अलग हो और आपसे पूछे कि वह ऐसा क्यों है तो अपने बच्चे को बताएं कि वह अलग क्यों हैं। आप अपने बच्चे को बताएं कि आपके बच्चे को उस बच्चे की मदद करनी चाहिए। खुद मदद करने की बजाय आप बच्चे को उसकी मदद के लिए पहले आगे बढ़ने दें। पर क्या आप अपने बच्चे को यह कहेंगी कि शारीरिक रुप से अलग लोग हमारे जैसे ही होते हैं, बस थोड़े अलग हैं। क्या आप अपने बच्चे को शारीरिक रुप से अलग बच्चों से दोस्ती करने के लिए प्रोत्साहित करेंगी? इस तरीके से आप उसे शारीरिक रुप से अलग बच्चो के प्रति संवेदनशील बना सकते हैं।
सिंगल पैरेंट के प्रति बच्चे को सेंसटिव बनाएं
जैसा मेरी सहेली ने कहा था हमें अपने बच्चों को बताना चाहिए कि किस तरह हमारे परिवार अलग-अलग होते हैं। हम जानते हैं कि बहुत से लोग तलाक लेकर अलग होते हैं और हमारे आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने बच्चे की परवरिश अकेले ही करते हैं। क्या यह हमारी ज़िम्मेदारी नहीं कि हम उन्हें इस बारे में ज़िम्मेदार या संवेदनशील बनाएं? हममे से कितने लोग अपने बच्चो के बताते हैं कि कुछ बच्चों के पास मम्मी और डैडी में से कई एक ही होता है, या उनका कोई नहीं होता या उन्हें गोद लिया गया है? हम सोशल मीडिया पर ज़रूर भावनाओं से भरे मैसेज और तस्वीरें एक-दूसरे से शेयर करते हैं लेकिन अपने बच्चों को संवेदनशील बातें समझाना समाज में एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत बन सकता है।
देर से समझने वाले लोगों के प्रति संवेदनशील बनाएं
हर माता-पिता के लिए उनका बच्चा काफी जीनियस होता है। हम अपने बच्चों को उनकी छोटी-छोटी सफलताओं पर प्रोत्साहित करना और शाबासी देना नहीं भूलते और उसमें कोई नुकसान भी नहीं होता। लेकिन उन बच्चों को क्या जिन्हें पढ़ाई-लिखाई या बाक़ी चीज़ें सीखने में थोड़ा अधिक समय लगता है, या जिनका विकास अधूरा-सा हो? ऐसे बहुत से बच्चे हैं जो 3 साल की उम्र तक पहुंचने के बाद एबीसीडी या 10 तक गिनती भी नहीं सीख पाते। उनके साथ आपके बच्चे का व्यवहार कैसा है? अगर आपका बच्चा ऐसे किसी बच्चे की मदद करता है तो इससे अच्छी कोई बात नहीं। लेकिन अगर वह किसी सुस्त या चुप रहने वाले बच्चे को चिढ़ाने-धमकाने या उन्हें बुद्धू या पागल बुलाने का काम करता है तो आपको अपने बच्चे की तरफ ध्यान देना होगा और उसे समझाना चाहिए कि वह ऐसे बच्चों के साथ किस तरह से व्यवहार करे।
अलग व्यवहार वाले बच्चों के प्रति संवेदनशीलता
बच्चों को बातें समझने में देर नहीं लगती लेकिन वे उन भावनाओं को सम्भालना नहीं सीख पाते।इसलिए तो बच्चों को नखरेबाज़ कहा जाता है। खैर ये नखरे या बच्चों का गुस्सा केवल छोटे बच्चों तक ही सीमित नहीं है। बड़े बच्चों को भी गुस्सा आता है और वे बिना सोचे समझे अक्सर चीखने-चिल्लाने लगते हैं। ज़्यादातर मामलों में इन बच्चों को चिढ़ाया, सताया या डराया-धमकाया जाता है जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप इनका व्यवहार गुस्सैल हो जाता है। माता-पिता के तौर पर हम अपने बच्चों की इस तकलीफ को कम करने की दिशा में कुछ नहीं कर पाते। हम ऐसी स्थिति से बचने का जो तरीका अपने बच्चो को सिखाते हैं वह है ऐसे गुस्सैल बच्चों से बचकर रहना, और बच्चे क्या करते हैं? या तो वे ऐसे बच्चो को परेशान करते हैं या उनका पीठ पीछे मज़ाक उड़ाते हैं। बहुत कम बार ही ऐसा होता है जब हम अपने बच्चों को विनम्र, सहयोग करनेवाला और उदार बनना सिखाते हैं। ध्यान में रखिए कि हम आज अपने बच्चो को जो सिखाएंगे वैसा ही व्यवहार वे भविष्य में करेंगे।
माता-पिता के लिए सलाह
हम समझ सकते हैं कि बच्चों की समझ और दिमाग कैसा होता है। वह जो देखते हैं वहीं करते हैं। आप अपने बच्चे के सामने दूसरों के साथ जैसा व्यवहार करेंगे वह भी वैसा ही करेगा। इसलिए अगर आप दूसरों के प्रति संवेदनशील होंगे तो आपका बच्चा भी आपके प्रति संवेदनशील रहेगा। इसलिए अगली बार जब आप अपने पड़ोसी से झगड़ा होने के बाद भुनभुनाते समय इस बात पर ध्यान दीजिए कि आप अपने उनके लिए कैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। जब आप किसी को वैसाखी या व्हीलचेयर इस्तेमाल करते देखें तो उनकी मदद के लिए आगे जाएं। रात को सोने से पहले जब आप बच्चों को कहानियां सुनाते हैं तो उसे वक़्त उन्हें बताएं कि अलग-अलग परिवारों में किस तरह का अंतर होता है। अपने बच्चे को दूसरों की मदद के लिए प्रोत्साहित करें और जब भी वो ऐसा करे तो उसकी तारीफ करना न भूलें।
याद रखिए बच्चे कच्ची मिट्टी जैसे हैं जिन्हें संवेदनशील बनाने के लिए उनके माता-पिता और परिवारवालों का संवेदनशील होना ज़रूरी है।
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अनुवादक -Sadhna Tiwari
चित्र स्रोत- Shutterstock