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माता-पिता बनने के बाद, यह लाज़मी सी बात है कि आप अक्सर अपने बच्चे पर गुस्सा हों या उसपर चिल्ला दें। हो सकता है कि बच्चे को डांटने से पहले शायद आप सोचते भी नहीं और आप किसी भी तरह अपने बच्चे को कोई बुरा काम करने से रोकना चाहते हैं। दरअसल आपको लगता है कि डांटकर या चिल्लाकर बच्चे को अनुशासन सिखाया जा सकता है। इसके लिए आप कई बार उसकी पिटाई या बाथरूम में बंद कर डराने से भी नहीं चूकते। लेकिन यहीं पर हमसे चूक हो जाती है, अपने बच्चे के पालन-पोषण में। वैसे जब आप बच्चे पर चिल्लाते हैं तो उसे शारीरिक रुप से कोई नुकसान तो नहीं पहुंचता लेकिन, इससे उसके मानसिक स्वास्थ पर असर पड़ता है और उसका आत्म विश्वास को भी काफी हद तक कम कर देता है। इसी विषय में हमने मुंबई के मनोचिकित्सक और सेक्सोलॉजिस्ट, डॉ. संघ नायक मेश्राम से बात की और समझने की कोशिश की कि जब किसी बच्चे को डांट, मुफ्त की सलाह, दूसरों से तुलना या किसी और के विचार सुनाए जाते हैं, तो बच्चे को कैसा महसूस होता है।
एक साल से छोटा बच्चा- इस उम्र के बच्चों को प्यार, देखभाल, लगाव और बहुत अधिक धैर्य की ज़रूरत होती है, जिसकी मदद से वे नई दुनिया में समायोजित होने की कोशिश करते हैं। लेकिन अगर आप प्रेगनेंसी के बाद डिप्रेशन से जूझ रही हैं, तो हो सकता है कि आप झल्ला उठें और कई बार बच्चे पर चिल्ला उठें। ‘लेकिन इससे बच्चे को नुकसान ही होगा। भले ही आप किसी बहुत छोटे बच्चे पर भी चिल्लाकर उसे अपनी बात समझाना चाहती हों लेकिन यह केवल आपको ही एक परेशान व्यक्ति के रुप में पेश करेगा।,’ यह कहना है डॉ. मेश्राम का।
कैसे असर करता है यह- डॉ. मेश्राम ने बताया कि, ‘इस उम्र में, आपका चिल्लाना बच्चे के लिए केवल शोर से अधिक कुछ न होगा, जिससे उसका कुछ लेना-देना नहीं। इतना ही नहीं, यह उसे चिड़चिड़ा बनाने और नींद में खलल डालने का काम ही करता है।,’ अगर एकाध बार ऐसा होता है। तो कोई बात नहीं है कि, लेकिन अगर आप ऐसा बार-बार न करें।
आपको क्या करना चाहिए- बच्चे को शांत कराएं, प्यार करें, उसके साथ खेलें, उसे ज़्यादा प्यारभरी बातें करें। इस तरह आपके बच्चे को सुरक्षा और आराम महसूस होगा।
1-3 साल के बच्चे को डांटना- इस उम्र में, बच्चे अधिक संवेदनशील होते हैं और ऐसे वक़्त में आप उनके साथ जैसा व्यवहार करते हैं उसकी छाप बच्चे के मन पर पड़ जाती है। ‘ज़्यादातर मामलों में जब हम अपने बच्चों पर चिल्लाते हैं या डांटने हैं, तो हम उन्हें अनुशासन सिखाने की बजाय उन्हें सुरक्षित करना चाहते हैं। गीली फर्श पर दौड़ने पर आप उसपर चिल्ला सकती हैं, पॉटी ट्रेनिंग या ठीक तरीके से खाना न खाने जैसी बातों पर गुस्सा कर सकती हैं। लेकिन यह ऐसी बातें हैं, जो बच्चे समझ नहीं पाते।’
इसका क्या असर पड़ता है- ‘इस संवेदनशील उम्र में बच्चे पर चिल्लाना या उसे डांटना उनकी बेचैनी बढ़ाने का काम करेगा। बहुत अधिक डांटने से उनका आत्मविश्वास और जिंदादिल सोच पर असर पड़ेगा। ऐसी हालत में वे अपनी हरकतों की वजह से डांट सुनने से बचने की कोशिश करेंगे और अपने मन की बातें नहीं बता सकेंगे।’
आपको क्या करना चाहिए- चिल्लाने और डांटने के बाद अपने और बच्चे के बीच प्यार को बनाए रखने के लिए उसके साथ प्यार और सावधानी से बात करें। डॉ. मेश्राम की मानें तो, ‘ऐसी परिस्थियों में बच्चों को किसी के साथ की ज़रूरत पड़ती है। इसलिए शांति से उसके साथ बात करें कि आपको उसपर चिल्लाना क्यों पड़ा और उसकी किसी हरकत से उसे कितना नुकसान हो सकता था।’
3-5 साल के बच्चे को डांटना- यह एक मुश्किलभरी उम्र होती है, ‘ध्यान दें कि इस उम्र में आपका बच्चा उसके आसपास के लोगों का उसके प्रति व्यवहार कैसा है, इस बात पर बहुत अधिक ध्यान देता है। इसलिए आप अपने बच्चे से कैसे बात करतें हैं, तो वह अपने भाई-बहनों और दादा-दादी के साथ आपके व्यवहार की तुलना करेगा। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि यह उम्र है जब बच्चे अपने बड़ों से अपने लिए सम्मानजनक व्यवहार की उम्मीद रखते हैं, जिन्हें मापने का पैमाना भी उनका अपना होता है।’
चिल्लाने का असर- डॉ. संघ नायक कहते हैं किस बच्चे को बार-बार डांटने या चिल्लाने से आपके रिश्ते में तनाव आ सकता है। ‘अगर आप पैरेंटिंग के तरीके को डांट-फटकार का सहारा लेना पड़ता है तो इससे आपका बच्चा जुनूनी, सनकी या ग्रस्त बन सकता है। ऐसे बच्चे जिनसे कोई कठोर शब्दों में बात करता है, वे अपने माता-पिता के गुस्से का शिकार होने की पूरी कोशिश करते हैं। यह उनके लिए विनाशकारी हो सकता है। इसी तरह, हो सकता है कि वे आपसे झूठ बोलना सीख जाएं, क्योंकि उन्हें शायद यह महसूस हो कि सच बोलने से शायद आप और गुस्सा होंगे। इस तरह उनका आप पर से भरोसा उठता जाएगा।’
आपको क्या करना चाहिए- ‘हमेशा डांटने-फटकारने के बाद बच्चे से प्यार से बात करें। ‘गहरी सांस लें और अपने बच्चे को समझने में मदद करें कि उसे डांट क्यों पड़ी। अगर गिलास टूटने या दूध गिरने की वजह से आपने उसे डांटा है तो बच्चे को साफ-सफाई में मदद करें, लेकिन उससे सफाई के लिए जबरदस्ती न करें। जब आप उसे सकारात्मक तरीके से और उसकी अपनी ग़लतियों से सीखने में मदद करेंगे तो वह जल्दी सीखेगा।’यह सूत्र दिया डॉ. मेश्राम ने।
क्यों डांटना है ज़रूरी- किसी भी चीज़ का ज़रूरत से अधिक होना किसी के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है, और डांट-फटकार के साथ भी ऐसा ही है। लेकिन डॉ. संघ नायक मेश्राम के अनुसार ‘अगर आपने कभी भी अपने बच्चे को नहीं डांटा तो वह भी बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकता है। बहुत लाड़-प्यार से पाले गए बच्चे हमेशा आपके कहे अनुसार नहीं चल सकेगा। अगर आपने अपने बच्चे को बचपन में नहीं डांटा और 8-10 साल की उम्र के होने के बाद जब उसे टोकेंगे, तो हो सकता है कि वह बगावत कर बैठे। इन सबकी वजह से वह सिगरेट पीने, दीवार पर सिर पटकने, चिड़चिड़ाने या दरवाज़ा बंद करके बैठ जाने जैसे काम सीख सकता है’। इसीलिए डॉक्टर मेश्राम सलाह देते हैं कि, ‘सावधानी और समझदारी से बच्चे के साथ काम लें। जब भी बच्चे को डांटें तो प्यार से उसे चूमने या गले लगाने और प्यारभरी बातों के साथ मामला समाप्त करें।’
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अनुवादक -Sadhna Tiwari
चित्र स्रोत- Shutterstock.