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Written By: Atul Modi | Updated : August 7, 2023 3:51 PM IST
विश्व स्तनपान सप्ताह (World Breastfeeding Week) प्रतिवर्ष 1 से 7 अगस्त तक होता है। इस कार्यक्रम के तहत पूरे विश्व में स्तनपान के प्रति जागरूकता बढ़ाने और महिलाओं व बच्चों के स्वास्थ्य के लिए स्तनपान को बढ़ावा दिया जाता है। ब्रेस्टफीडिंग या स्तनपान न केवल शिशु के लिए बल्कि मां के लिए भी बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों की माने तो स्तनपान की कमी से शिशु के संपूर्ण विकास में रुकावट उत्पन्न होती है, जबकि महिलाओं को भी कई तरह की शारीरिक और भावनात्मक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शिशु को पर्याप्त मात्रा में स्तनपान न कराने के कारण मां और बच्चे पर क्या असर पड़ता है आइए विस्तार से जानते हैं।
मां के दूध में एंटीबॉडीज होते हैं जो शिशुओं को विभिन्न बीमारियों और संक्रमणों से बचाने में मदद करते हैं। जिन शिशुओं को स्तनपान नहीं कराया जाता है, उनमें श्वसन संबंधी समस्याएं, कान के संक्रमण, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन और अन्य बीमारियों के विकसित होने का खतरा अधिक हो सकता है।
मां का दूध बच्चे की इम्यून सिस्टम को विकसित करने में मदद करता है, जिससे एलर्जी और अस्थमा का खतरा कम होता है। फॉर्मूला दूध पीने वाले शिशुओं में एलर्जी की स्थिति विकसित होने की संभावना अधिक हो सकती है।
मां का दूध आसानी से पचता है और बच्चे के पाचन तंत्र के लिए सही पोषण प्रदान करता है। फॉर्मूला दूध पीने वाले शिशुओं को कब्ज, दस्त और पेट दर्द जैसी अधिक पाचन समस्याओं का अनुभव हो सकता है।
मां का दूध में मस्तिष्क के सर्वोत्तम विकास के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण पोषक तत्व और फैटी एसिड होते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि स्तनपान करने वाले शिशुओं का कॉग्नेटिव कार्य बेहतर होता है और बौद्धिक विकलांगता का खतरा कम हो सकता है।
दरअसल, स्तनपान ऑक्सीटोसिन के स्राव को बढ़ाता है, जो मां बच्चे के रिलेशन से जुड़ा एक हार्मोन है और तनाव के स्तर को कम करता है। जो माताएं स्तनपान नहीं करा पाती हैं उनमें गर्भाशय की रिकवरी में देरी देखी गई है, इसके अलावा स्तन और डिम्बग्रंथि कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। स्तनपान न कराने से पोस्टपार्टम डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।