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Written By: Yogita Yadav | Updated : September 13, 2018 9:22 AM IST
कोई नया गैजेट बाजार में आया नहीं कि बच्चे उसके लिए जिद करने लगते हैं। वह इनको लेकर इतने क्रेजी होते हैं कि कई बार तो बच्चे ही आपको उसकी जानकारी देते हैं। ऐसा सिर्फ आपके ही साथ नहीं, दूसरे पेरेंट्स के साथ भी होता है। सिर्फ उन्हें छोडकर जो व्यावसायिक या किसी अन्य वजह से गैजेट्स के बाजार से जुडे हैं। बाकी लोग नई इलेक्ट्रॉनिक चीजों के बारे में थोडी ही जानकारी रखते हैं।
हैरान न हों
थोडा पीछे मुडकर देखें तो उन दिनों भी ऐसा ही होता था जब आप किशोर थे। कई ऐसी चीजें होती थीं, जिनके बारे में आपके माता-पिता बाद में जानते थे और आप पहले। फर्क सिर्फ यह है कि तब इसकी गति थोडी कम थी। क्योंकि उन दिनों विज्ञान और तकनीक का बाजार इतनी तेजी से तरक्की नहीं कर रहा था। हर महीने नई चीजें बाजार में नहीं आ जाती थीं। उन दिनों इतनी आजादी और सुविधा भी नहीं थी कि आप जब जो चाहें हासिल कर लें।
बदल रही है पसंद
नया जानने और हासिल करने की चाह ही आपको आगे बढने और कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन चाह की दिशा कैसी हो, यह तय करना जरूरी है। यह सही है कि आज बाजार में एक हजार से लेकर लाखों रुपये मूल्य तक के मोबाइल उपलब्ध हैं। ऊंचे दाम वाले आईफोन, आईपॉड और तमाम तरह के सॉफ्टवेयर्स एवं सुविधाओं से युक्त कंप्यूटर हैं। थ्री जी यानी तीसरी पीढी के मोबाइल फोन पुराने हो चुके हैं। नई पीढी की दिलचस्पी फोर जी यानी चौथी पीढी के मोबाइल फोन में है। कैमरा, वॉयस रिकॉर्डर, एफएम, मीडिया प्लेयर, एमएमएस ..!
सहज है यह जिज्ञासा
किशोरों के लिए नए-नए गैजेट्स के बारे में जिज्ञासा वैसे ही है, जैसे आसपास की दुनिया के बारे में जानने की उनकी चाह। उसे हासिल करने की चाह भी वैसे ही है जैसे एक बच्चे का चांद-सितारे तोड लाने की जिद। फर्क सिर्फ यह है कि बच्चा यह नहीं जानता कि चांद-सितारे पाए जाने लायक चीजें नहीं हैं, इसलिए वह उन्हें पाने की जिद करता है। जबकि किशोर जानता है कि चांद-सितारे पाए नहीं जा सकते, वह यह भी जानता है कि उन्हें पा लेना किसी काम का भी नहीं है। उनके सोचने-समझने की क्षमता बच्चों की तुलना में बहुत अधिक होती है।
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बढ़ रहा है खर्च
किशोरावस्था तक आते-आते उनके व्यक्तित्व के निर्माण की भावभूमि लगभग बन चुकी होती है। वे उन चीजों को पाना चाहते हैं, जो उनकी पहुंच में हैं और उनके काम की हैं। वे ज्यादातर चीजें पा भी रहे हैं। भारत में 15 से 24 की आयु वर्ग के लोगों का जेबखर्च 900 करोड रुपये प्रतिदिन आंका गया है। इसका सालाना आंकडा निकालें तो भारत के रक्षा बजट का तीन गुना आता है। इसका सबसे बडा हिस्सा गैजेट्स पर खर्च हो रहा है। सक्षम माता-पिता के किशोरों के पास नए गैजेट्स देखे जा सकते हैं।
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किस सीमा तक जरूरी हैं गैजेट्स
सवाल यह है कि महंगे गैजेट्स की जरूरत उन्हें क्यों है? जरूरत मोबाइल फोन हो सकता है, उसमें कैमरा नहीं। यह सिर्फ स्टेटस सिंबल का मामला होता है, जिसका विस्फोटक नतीजा एमएमएस कांड के रूप में सामने आ चुका है। उनकी जरूरत कंप्यूटर हो सकता है, पर उसमें वेबकैम या वीएलसी की मौजूदगी जरूरत से इतर मामला है। ऐसी स्थिति में माता-पिता की जिम्मेदारियां बढ जाती हैं। उन्हें सिर्फ इसलिए कोई चीज न दें कि वे चाहते हैं, यह खयाल भी रखें कि कोई चीज न पाने के कारण उनके मन में कोई ग्रंथि न बनने पाए। इसके लिए आपको कोई बीच का रास्ता निकालना होगा।