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ज्‍यादा मीठा खाने वाले बच्‍चों को हो सकता है तनाव, जानें और भी कारण

शारीरिक श्रम से तनाव भी कम होता है। खेलकूद से बच्चों को समस्याएं सुलझाने, क्षमता बढ़ाने और अपनी रुचि को समझने का मौका मिलता है।

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Written By: Yogita Yadav | Published : September 13, 2019 8:20 PM IST

बदलते लाइफ स्‍टाइल में ऐसी बहुत सारी बीमारियों ने हमें आ घेरा है, जिनका इससे पहले हमने कभी नाम भी नहीं सुना था। ऐसी बीमारियां जो उम्र का संकेत मानी जाती थीं अब छोटे-छोटे बच्‍चों को भी होने लगी हैं। ऐसी ही एक समस्‍या है तनाव। अब छोटे-छोटे बच्‍चे भी तनाव के शिकार हो रहे हैं। क्‍या आप जानते हैं कि क्‍यों हो रहे हैं बच्‍चे तनाव के शिकार।

 बच्‍चों को कम समय देना

आज की दौड़ भाग भरी जिंदगी में सभी इतने व्‍य‍स्‍त हैं कि बच्‍चों को समय नहीं मिल पा रहा। बच्‍चों में अगर किसी तरह की जिज्ञासा, तनाव या सवाल होता है तो उसका समाधान करने वाला उस वक्‍त उनके आसपास कोई नहीं होता।

चीनी का ज्यादा इस्तेमाल

चीनी दिमाग के विकास के हार्मोन को भी प्रभावित करती है। डिप्रेशन और सीजोफ्रेनिया के मरीजों में इस हार्मोन का स्तर कम पाया जाता है। इन दिनों खाने पीने की कई ऐसी चीजें बाजार में मिलती हैं जिनके कारण चीनी का इस्तेमाल बढ़ गया है, जैसे केक, मिठाइयां, कोक और पेप्सी जैसी कार्बोनेटेड ड्रिंक्स। रिसर्चरों के मुताबिक चीनी की ज्यादा मात्रा का संबंध डिप्रेशन और स्कित्जोफ्रेनिया से है।

पारिवारिक बिखराव

परिवार में माता-पिता के बीच तलाक या लगातार होने वाले झगड़ों का बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। जर्नल ऑफ मैरिज एंड फैमिली में छपी रिपोर्ट के मुताबिक टूटे परिवारों से आने वाले बच्चों को अवसाद का ज्यादा खतरा होता है। इससे उनकी भावनात्‍मक और मानसिक विकास पर भी बुरा असर पड़ता है।

Children's behaviour, Children's health, depression in kids, stress in kids, stress in kids, sweets hazards, too much sugar hazards. डिप्रेशन और सीजोफ्रेनिया के मरीजों में इस हार्मोन का स्तर कम पाया जाता है। इन दिनों खाने पीने की कई ऐसी चीजें बाजार में मिलती हैं जिनके कारण चीनी का इस्तेमाल बढ़ गया है! © Shutterstock.

कम खेलकूद

बच्चों के विकास लिए शारीरिक गतिविधियां बहुत जरूरी होती हैं। शारीरिक श्रम से तनाव भी कम होता है। खेलकूद से बच्चों को समस्याएं सुलझाने, क्षमता बढ़ाने और अपनी रुचि को समझने का मौका मिलता है। पर सुरक्षा और अन्‍य कारणों से बच्‍चे घरों में ही बंद होकर रह गए हैं। स्‍कूलों में भी खेलकूद पर नाममात्र को ही ध्‍यान दिया जाता है।

इलेक्ट्रॉनिक खेलों की लत

अमेरिकन जर्नल ऑफ इंडस्ट्रियल मेडिसिन के मुताबिक वे बच्चे जो दिन में पांच घंटे से ज्यादा कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर गेम खेलते हैं, टैबलेट या स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें अवसाद होने की ज्यादा संभावना होती है। आजकल हर हाथ में मोबाइल हैं और बच्‍चे भी ज्‍यादा समय इसी पर व्‍यस्‍त रहते हैं।

टॉक्सिन से बचें

हमारा पर्यावरण बुरी तरह प्रदूषित है। फसलों में इस्तेमाल होने वाले पेस्टिसाइड, सफाई के लिए इस्तेमाल हो रही सामग्री, खाद्य सामग्री में मिलावट और गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण, सभी हमारे शरीर को विषैला कर रहे हैं। इन विषैले तत्वों के शरीर में पहुंचने से बेचैनी और अवसाद की समस्याएं बढ़ती हैं।

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