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Written By: Editorial Team | Published : August 1, 2018 7:10 PM IST
आजकल की इस भाग-दौड़ वाली जीवनशैली में बच्चे भी स्वस्थ नहीं रह पाते। उनमें भी कम उम्र से ही तनाव, अवसाद (डिप्रेशन), डायबिटीज जैसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बच्चों में बढ़ते डिप्रेशन की समस्या को एक नई थेरेपी के जरिए कम किया जा सकता है। अध्ययन में खुलासा हुआ है कि यदि इस नई थेरेपी के जरिए पेरेंट्स बच्चों से बातचीत करने की कला सीख जाएं, तो काफी हद तक बच्चों में होने वाले डिप्रेशन की समस्या को कम किया जा सकता है। इस थेरेपी का नाम है पेरेंट चाइल्ड इंट्रैक्शन थेरेपी (पीसीआईटी)। शोधकर्ताओं का कहना है कि पेरेंट चाइल्ड इंट्रैक्शन थेरेपी के जरिए बच्चों में व्यवहारिक तौर पर होने वाले विकार से निजात दिलाई जा सकती है। इस थेरेपी को अपना कर पेरेंट्स अपने बच्चों के कम उम्र में होने वाले डिप्रेशन की समस्या से बाहर निकाल सकते हैं।
कई केसेज ऐसे देखने को मिल रहे हैं, जिसमें 3 से 4 साल के बच्चों में भी डिप्रेशन पाया गया है। आलम यह है कि स्कूल जाने से पहले ही बच्चों को एंटी-डिप्रेशन की दवाएं लेने की जरूरत पड़ रही है। ऐसी स्थिति में बच्चों को साइकोथेरेपी की भी जरूरत पड़ती है। पेरेंट चाइल्ड इंट्रैक्शन थेरेपी में अभिभावकों को बच्चों से बात करने की सही तकनीक सिखाई जाती है। इन तकनीकों का अभ्यास पेरेंट्स पहले विशेषज्ञों की देखरेख में कर सकते हैं।
कम उम्र में बच्चों को अवसाद से बचाने के लिए शोधकर्ताओं ने इस थेरेपी में उनके भावनात्मक विकास के लिए भी मॉड्यूल तैयार किए हैं। पीसीआईटी थेरेपी में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों से पेरेंट्स बच्चों को उनकी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखा सकते हैं। साथ ही वे उनके बेहतर भावनात्मक सहभागी भी बन सकते हैं। इन तकनीकों को इस तरह से तैयार किया गया है कि बच्चे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ भावनाओं को बेहतर तरीके से व्यक्त भी कर पाएं।
यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के डिप्टी डायरेक्टर जोएल शैर्रील का कहना है कि इस अध्ययन में कम उम्र के बच्चों में पाए जाने वाले डिप्रेशन के कारण और उनके लक्षणों का पता लगाया गया है। साथ ही इससे छुटकारा पाने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए, इसका भी पता लगाया गया है। 3 से 6 साल की उम्र के अवसादग्रस्त बच्चों को (अर्ली चाइल्डहुड डिप्रेशन) यानी कम उम्र में अवसाद की कैटेगरी में रखा जाता है। साथ ही ऐसे बच्चों के अभिभावकों को पीसीआईटी थेरेपी के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है।
चित्रस्रोत: Shutterstock.