
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
Written By: Mukesh Sharma | Updated : November 25, 2025 6:04 PM IST
Bachon ko Parents ke Pass Sona Chahiye ya Nahi: आपके बच्चे कहा सोते हैं आपके साथ? वैज्ञानिक इसे “को-स्लीपिंग” कहते हैं यानी माता‑पिता के साथ सोना (एक ही बिस्तर या कमरे में) बहुत सारी संस्कृतियों में सामान्य है। हमारी भारतीय संस्कृति में तो यह सबसे आम है, जहां बच्चा जब बड़ा हो जाता है, तब भी उसे मां या पिता के साथ सोने के लिए कहा जाता है। लेकिन समय के साथ, जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनकी स्वतंत्रता, नींद की क्वालिटी और सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ती हैं। तो सवाल उठता है कि क्या बच्चों को माता-पिता के पास ही सोना चाहिए? हाल ही में की गई एक रिसर्च और विशेषज्ञों की राय इस बात की ओर इशारा करती है कि को-स्लीपिंग में संतुलन बनाए रखना जरूरी है न तो हमेशा बच्चों को साथ सुलाना चाहिए और न ही अचानक दूर कर देना। लेकिन क्यों और कैसे बनेगा यह संतुलन?
अमेरिकी स्लीप मेडिसिन एसोसिएशन की हालिया रिपोर्ट बताती है कि लगभग 46 प्रतिशत माता‑पिता अपने बच्चे (18 वर्ष से कम) के साथ कभी न कभी को‑स्लीप करते हैं। हालांकि यह बात भी कही गई कि नर्सिंग और सुरक्षा के दृष्टिकोण से आपको विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, 12 महीने बिस्तर-साझा करना सही नहीं है। अगर जरूरत है तो रूम-शेयरिंग करें और लेकिन एक ही बेड शेयर न करें। आप दोनों एक ही कमरे में लेकिन अलग-अलग गद्दे पर सोएं।
अगर बच्चे पहले साल में लगातार माता‑पिता के साथ सोते हैं, तो बाद में प्री‑स्कूल या थोड़े बड़े होने पर उनको नींद ठीक से नहीं आती और उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्हें रात सोने में देर लग सकती है या फिर वह हमेशा माता‑पिता के पास ही सोने की चाह व्यक्त कर सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि लंबे समय तक एक ही बिस्तर साझा करने से बच्चे खुद से सोने की आदत ठीक से नहीं सीख पाते।
भारत जैसे देशों में को‑स्लीपिंग कई परिवारों में 6–7 साल तक सामान्य होती है। कुछ एक्सपर्ट का कहना है कि 7 साल तक बच्चे माता‑पिता के साथ ही सो सकते हैं। इसका कारण है कि इस उम्र में वे भावनात्मक रूप से संवेदनशील होते हैं और उनमें “मिरर न्यूरॉन्स” सक्रिय होते हैं, जिससे वे माता‑पिता की मौजूदगी से सुरक्षित महसूस करते हैं। वहीं कुछ अन्य विशेषज्ञ कहते हैं कि 3–4 साल की उम्र के बाद धीरे-धीरे बच्चों को अलग कमरे में सुलाना शुरू करना उसके विकास के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है, क्योंकि इससे बच्चों को अपना व्यक्तिगत “स्पेस” मिलता है और उनमें आत्मनिर्भरता बढ़ता है।
बच्चों को एकदम से अलग करने की बजाय, धीरे‑धीरे उन्हें अलग करना बेहतर होता है। इसके लिए आप बच्चों को अपने कमरे में ही लेकिन अलग बेड पर सुलाने से शुरुआत कर सकते हैं। अगर को‑स्लीपिंग बहुत लंबे समय तक चलती रहे तो किशोरावस्था में शारीरिक बदलावों जैसे- शर्म, निजी स्पेस की जरूरत के कारण यह बच्चों में असहज रहने की भावना को विकसित कर सकती है, जो कि उसके विकास को बाधित करेगा। आप ट्रांजिशन के दौरान बच्चे की भावना का सम्मान करें और जोर-जबरदस्ती की बजाय प्यार और समझदारी से बदलाव लाने की कोशिश करें
को-स्लीपिंग का कोई सही उम्र नहीं होती, क्योंकि यह बहुत हद तक बच्चों की जरूरतों, परिवार की परिस्थितियों और सांस्कृतिक विश्वास पर निर्भर करता है। इसलिए माता‑पिता को बच्चे की भावनाओं, उनकी नींद की क्वालिटी और सुरक्षा को देखते हुए निर्णय लेना चाहिए और जरूरत हो तो पीडियाट्रिशियन या स्लीप एक्सपर्ट से सलाह भी लेनी चाहिए।
अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।