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Written By: Anshumala | Updated : June 17, 2022 12:04 PM IST
कुष्ठ रोग एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में समाज में अलग-अलग तरह की भ्रांतियां, मिथक और गलत जानकारियां फैली हुई हैं। परिणामस्वरूप, लोग इन गलत जानकारियों के आधार पर कुष्ठ रोग के मरीजों के बारे में गलत धारणाएं (Stigmas related to leprosy in hindi) बना लेते हैं और उनसे दूर रहते हैं। गौरतलब है कि कुष्ठ रोग को छूत की बीमारी मानकर लोग हमेशा से कुष्ठ रोग के मरीजों का तिरस्कार करते रहे हैं और उनसे दूरी बनाकर रखते आए हैं।
जनवरी महीने के हर आखिरी रविवार को ''विश्व कुष्ठ दिवस'' (World Leprosy Day ) मनाया जाता है, लेकिन भारत में यह दिवस 30 जनवरी को सेलिब्रेट किया जाता है। इस दिन की शुरुआत 1954 में फ्रांसीसी परोपकारी (French philanthropist) और लेखक राउल फोलेरे (Raoul Follereau) द्वारा की गई थी, ताकि इस घातक बीमारी के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाई जा सके। साथ ही लोगों तक इस तथ्य को पहुंचाया जा सके कि इस रोग को रोके जाने के साथ ही इसका इलाज (treatments of leprosy in hindi) भी संभव है। भारत में 'विश्व कुष्ठ दिवस'' (world leprosy day) की तारीख को भारतीय स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गांधी जी की हत्या की वर्षगांठ (30 जनवरी, 1948) के दिन पर रखा गया। ऐसा इसलिए, क्योंकि गांधी जी ने अपने जीवनकाल के दौरान, कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों की बेहतरी की दिशा में अथक प्रयास किए थे।
इस बीमारी को ‘हान्सेंस डिजीज’ (Hansen’s Disease) भी कहा जाता है, जिसे नॉर्वियन चिकित्सक, गेरहार्ड हेनरिक आर्मोर हेंसन (Gerhard Henrik Armauer Hansen) के नाम पर रखा गया है। इन्होंने उस समय की प्रचलित धारणा को खारिज कर दिया था कि कुष्ठ रोग (Leprosy Disease) एक वंशानुगत बीमारी थी। उन्होंने लोगों को बताया कि यह बीमारी वंशानुगत नहीं, बल्कि एक बैक्टीरिया के कारण होती है। ''विश्व कुष्ठ दिवस'' (world leprosy day) का उद्देश्य इस दृष्टिकोण को बदलना है और इस तथ्य के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना है कि कुष्ठ रोग (Leprosy Disease) को अब आसानी से रोका और ठीक किया जा सकता है। (ways to prevent leprosy in hindi)
समाज में आज भी कुष्ठ रोगियों के प्रति (Leprosy) लोगों की सोच गलत है। इनके साथ भेदभाव किया जाता है, खासकर, गांव, छोटे शहरों में। कुष्ठ रोग की बात करें, तो यह एक प्रकार का संक्रमण (Infection) है, जो जीवाणु माइकोबैक्टीरियम लैप्री (Bacterium Mycobacterium Leprae) के कारण होता है। इससे पीड़ित व्यक्ति की त्वचा, आंखें, रेस्पिरेटरी सिस्टम, नर्व्स आदि को अधिक नुकसान पहुंचता है। इस रोग से ग्रस्त लोगों के साथ लगातार रहने से आप भी संक्रमित हो सकते हैं। संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने से भी आप बैक्टीरिया के संपर्क में आकर संक्रमित हो सकते हैं। माइकोबैक्टीरियम लैप्री बैक्टीरिया के सांस में चले जाने से भी कुष्ठ रोग होने का खतरा बढ़ जाता है।
यह बीमारी धीरे-धीरे सामने नजर आती है। किसी-किसी में इसके लक्षण (symptoms of leprosy in Hindi) एक साल में दिखने लगते हैं, तो कई बार सालों तक लक्षण नजर नहीं आते हैं। कुछ निम्न लक्षणों से पहचानें कुष्ठ रोग से कहीं आप तो नहीं हो रहे ग्रस्त, इन लक्षणों के दिखने पर चिकित्सक को दिखाएं। इस तरह समय पर और जल्द उपचार शुरू किया जा सकेगा जिससे इस बीमारी को गम्भीर होने से रोका जा सकता है।
त्वचा पर घाव या दानेदार उभार (rashes and boils on skin)
हाथों-पैरों की उंगलियों के पोर का सुन्न हो जाना (numbness)
मांसपेशियों में कमजोरी (weak muscles)
नसों में सूजन होना
त्वचा पर सफेद धब्बे (white patches on the skin)
यदि किसी को कुष्ठ रोग हुआ है, तो उनका इलाज तुरंत कराना चाहिए। इलाज में देरी करने से शरीर अपंग होने का रिस्क बढ़ जाता है। नर्व्स भी कई बार क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे हाथों, पैरों की उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी और गलने लगती हैं। आंखों की पलकें, भौहों के बाल गिरने लगते हैं। लिम्ब (Limbs) पर असर होता है। संक्रमण अधिक बढ़ने से ग्लूकोमा, अंधापन, किडनी से संबंधित समस्याएं आदि कई शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में जितनी जल्दी हो, इसका इलाज शुरू कर देना चाहिए।
– कुष्ठ रोग लाइलाज नहीं है। इसका इलाज मल्टी-ड्रग थेरेपी या एमडीटी (MDT), एंटीबायोटिक्स आदि के जरिए संभव है, जो इस संक्रमण को कम करती है। भारत में भी इसका निःशुल्क इलाज मौजूद है, लेकिन जागरूकता और जानकारी की कमी के कारण लोग इलाज नहीं कराते हैं।
– जिन लोगों को कुष्ठ रोग होता है, यदि उन्हें सही इलाज मिले, तो वे इस संक्रमण से मुक्त हो सकते हैं। कुष्ठ रोगी ठीक होने के बाद बिल्कुल आम लोगों की तरह स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।