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विश्‍व ऑटिज्‍म जागरुकता दिवस : ऑटिज्‍म से ग्रसित बच्‍चे भी समझते हैं मां की भावनाएं : शोध

हाल ही में हुए एक शोध में यह परिणाम सामने आया है कि मां की भावनाएं और उसके चेहरे के भाव समझने में सामान्‍य और ऑटिज्‍म से पीडि़त बच्‍चों में कोई अंतर नहीं है, यह एक बड़ी खोज बताई जा रही है।

विश्‍व ऑटिज्‍म जागरुकता दिवस : ऑटिज्‍म से ग्रसित बच्‍चे भी समझते हैं मां की भावनाएं : शोध
हाल ही में हुए एक शोध में यह परिणाम सामने आया है कि मां की भावनाएं और उसके चेहरे के भाव समझने में सामान्‍य और ऑटिज्‍म से पीडि़त बच्‍चों में कोई अंतर नहीं है, यह एक बड़ी खोज बताई जा रही है। © Shutterstock.

Written by Yogita Yadav |Published : March 28, 2019 3:22 PM IST

अभी तक यह माना जा रहा था कि ऑटिज्म  स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) से ग्रसित बच्चे इतने आत्म‍केंद्रित होते हैं कि वे दूसरों की भावनाओं को समझ ही नहीं पाते। जिसके मुताबिक सामाजिक होने के लिए उन्हें रिएक्‍ट करना होता है। पर हाल ही में हुए एक शोध में यह खुलासा किया गया है कि ऑटिज्म से पीडि़त बच्चे  भी अपनी मां की भावनाओं और चेहरे के हाव-भाव की वैसी ही समझ रखते हैं जैसे सामान्य बच्चे। इस अनुसंधान ने ऑटिज्म से पीडि़त बच्चों की सामाजिक समझ को विकसित करने की दिशा में एक उम्मीद की किरण दिखाई है।

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महत्‍वपूर्ण हैं चेहरे के हावभाव

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सामाजिक संबंधों को बढ़ाने में चेहरे के हावभाव समझने की कला बहुत अहम भूमिका अदा करती है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) से पीड़ित बच्चों के लिए सामाजिक संबंध बना पाना आमतौर पूर चुनौतीपूर्ण रहा है। वे दूसरों की भावनाओं को पहचानने में असुविधा महसूस करते हैं। जिसकी वजह से वे बातचीत प्रारंभ नहीं कर पाते और सामाजिक संबंध बना पाने में अक्षम रहते हैं।

हालांकि अब तक हुए अध्ययनों में एएसडी से ग्रसित बच्चों और वयस्कों दोनों के चेहरे की भावनाओं को पहचान सकने की क्षमता का विश्‍लेषण किया गया था। जिसमें पाया गया कि दोनों के ही परिणामों में अंतर है। जबकि बच्‍चों को परीक्षण के दौरान केवल अपरिचित चेहरे पहचानने के लिए दिए गए थे जिसमें सिर्फ दो ही तरह की अभिव्‍यक्ति थी  "तटस्थ" और "भावनात्मक"।

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पहचानी हर तरह की भावनाएं 

फ्लोरिडा एटलांटिक यूनिवर्सिटी के चार्ल्‍स ई श्मिट कॉलेज ऑफ साइंस के शोधकर्ताओं ने इन्‍हीं सीमाओं से आगे बढ़कर कुछ नए अनुसंधान किए हैं। इस अध्‍ययन में एएसडी से ग्रसित बच्‍चों को शामिल किया गया जिनकी उम्र 4 से 8 साल के बीच है। साथ ही उन्‍हें पचानने के लिए खुश, दुखी, क्रोध, भय, और तटस्थ अभिव्‍यक्ति वाले चेहरे दिए। इनमें परिचित और अपरिचित दोनों चेहरे शामिल थे। साथ ही परीक्षण में इन बच्‍चों की माताओं को भी शामिल किया गया कि वे इस पर कैसे रिएक्‍ट करते हैं।

[caption id="attachment_658074" align="alignnone" width="655"]Autism-kid-with-mother खुशी और उत्साह जैसी सकारात्म‍क भावनाओं की पहचान इन्होंने जल्दी  कर ली। © Shutterstock.[/caption]

जल्‍दी पहचान लेते हैं डर और उदासी 

शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि एएसडी से पीडि़त उच्च कार्यशील और विकासशील क्षमताओं वाले बच्चों में पहचानने की क्षमता कितनी अलग-अलग है। शोध के बाद जो तथ्यक सामने आए उनमें यह खुलासा हुआ कि ये बच्चे  उदासी और गुस्सेग जैसी नकारात्मशक भावानाओं को पहचानने में ज्याउदा चुनौती महसूस करते हैं जबकि खुशी और उत्साह जैसी सकारात्म‍क भावनाओं की पहचान इन्होंने जल्दी  कर ली। बाल मनोचिकित्सा और मानव विकास पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम, इस बात का प्रमाण हैं कि एएसडी वाले बच्चे बिना एएसडी वाले बच्चों की तुलना में अपरिचित चेहरे की भावनाओं को पहचानने में अधिक कुशल हैं, विशेष रूप से डर और उदासी जैसी नकारात्मक भावनाओं की पहचान।

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मां के साथ करते हैं इन ट्यून

इस पूरे अध्‍ययन में सबसे दिलचस्‍प बात यह सामने आई कि अपनी मां की भावनाओं को पहचानने में एएसडी से ग्रस्‍त बच्‍चे भी सामान्‍य बच्‍चों से पीछे नहीं थे। वे उसी तरह मां के फेशियल एक्‍सप्रेशन के साथ ‘इन ट्यून’ करते हैं जैसे सामान्‍य बच्‍चे। दिलचस्प बात यह है कि शोधकर्ताओं ने पाया कि उच्च-कार्यशील एएसडी वाले बच्चों में अपनी मां के चेहरे को देखते समय भावनात्मक और कुशल प्रसंस्करण कौशल होता है। वे एएसडी के बिना बच्चों के रूप में अपनी मां की भावनाओं और भावनाओं के साथ "इन-ट्यून" के रूप में हैं। बच्चों के दो समूह परिचित चेहरे से भावों को पहचानने में भिन्न नहीं थे।

महत्‍वपूर्ण है शोध 

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नेथनियल ए शानोक, प्रमुख लेखक और एक पीएच.डी. विद्यार्थी सह-लेखक नैन्सी आरोन जोन्स, पीएचडी, जो एक डब्ल्यूएवीएस कॉलेज ऑफ साइंस में मनोविज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर और WAVES प्रयोगशाला के निदेशक, और एफएयू के ब्रेन इंस्टीट्यूट और सेंटर फॉर कॉम्प्लेक्स सिस्टम एंड ब्रेन साइंसेज के सदस्य भी हैं, कहते हैं कि अभी तक हुए अध्‍ययन में यह बात सामने आई है कि दोनों समूहों में परिचित अभिव्‍यक्ति को पहचानने में कोई अंतर नहीं है। यह अध्‍ययन भविष्‍य में इस दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा कि क्‍या ये बच्‍चे मां की ही तरह अपने अन्‍य परिचित सदस्‍यों जैसे पिता, भाई-बहन आदि की भावनाओं और अभिव्‍यक्ति को समझने में क्‍या उतने ही कुशल हो सकते हैं।

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