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पिछले कुछ दिनों से, हम 'ब्लू व्हेल चैलेंज' नामक जानलेवा ऑनलाइन गेम के शिकार होने के बाद किशोर उम्र के बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के बारे में बहुत कुछ सुन रहे हैं। लेकिन यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है कि ये आत्महत्याएं इस घातक ऑनलाइन गेम का परिणाम हैं। इससे पहले हमने आपको बताया ही था कि किस तरह इस ऑनलाइन गेम चैलेंज के शिकार होनेवाले मुंबई के अंधेरी इलाके के एक 17 वर्षीय लड़के ने 7 मंजिला इमारत की छत से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। हालांकि, कुछ समय पहले आयी फॉरेंसिक विश्लेषण रिपोर्ट के बाद और इस बच्चे के मोबाइल फोन के डेटा को डीकोड करने के बाद पता चला कि इस लड़के ने यह फैसला अपने असफल प्रेम संबंध की वजह से लिया ना कि ब्लू व्हेल चैलेंज की वजह से।
हम इस घातक खेल के नाम पर होने वाली मौतों की संख्या को अनदेखा नहीं कर सकते। यह समझने के लिए कि क्यों एक किशोर एक चैलेंज को पूरा करने के चक्कर में अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं और ऐसे कठोर कदम उठा लेते हैं। हमने मनोचिकित्सक और सेक्सोलॉजिस्ट, डॉ. संघनायक मेश्राम (मुंबई) से बात की। उन्होंने बताया कि, 'मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि यह ब्लू व्हेल गेम टीनएजर्स तक कैसे पहुंच रहा है। इसके कोई भी जानकारी या सबूत नहीं है कि यह गेम जानलेवा है।
दरअसल, हम उस समस्या की अनदेखी कर रहे हैं जिसकी वजह से युवा और किशोरा इस खेल पर बहुत अधिक ध्यान दे रहे हैं, और वह समस्या है- टीनएज डिप्रेशन। जी हां, हम टीनएज डिप्रेशन के बारे में ज्यादा बातें नहीं करतें, लेकिन यह हमारे बीच मौजूद है। यह आत्महत्याएं एक खेल से अधिक टीनएज डिप्रेशन का परिणाम दिख रही हैं जिसके दबाव में आकर लोग अपनी जान दे रहे हैं।'
ब्लू व्हेल चैलेंज एकमात्र ऐसा गेम नहीं है, जिसे हम डरते हैं और जो किशोरों को कमज़ोर बनाता है, हाल ही में दिल्ली के पाथवे स्कूल में कुछ किशोर लड़के स्नैपचैट स्लैप-बैटल चैलेंज में शामिल हुए और उसके एक नियम के अनुसार एक लड़के को चांटा मारा। इस थप्पड़ की वजह से थप्पड़ खानेवाले लड़के की सुनने की शक्ति 25 प्रतिशत कम हो गयी। तो, वह क्या चीज है जो बच्चों को ऐसी विनाशकारी चुनौतियों का सामना करने के लिए रोमांचित करता है और आखिर क्यों वे ऐसे काम करते समय वे तर्कसंगत तरीके से सोच क्यों नहीं पाते हैं? हमने डॉ. मेश्राम से इन सवालों के जवाब जानने की कोशिश की और जानना चाहा कि इन कमजोर बच्चों के मानसिक स्थिति के बारे में।
मनोरंजन के नाम पर इतने खतरनाक ऑनलाइन गेम और चैलेंज में हिस्सा लेने के लिए किशोरों को कौन-सी चीज़ प्रोत्साहित करती है?
डॉ. मेश्राम: इस तरह के ऑनलाइन गेम में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द – डिस्ट्रक्शन (विनाश), चैलेंज (चुनौति), बेट (शर्त), मिशन कम्पलिटेट या टास्ट डन है ऐसे शब्द हैं जो कमज़ोर किशोरों में एक जोश भरने का काम करता है और उन्हें तुरंत उत्साहित कर देता है। ऐसे गेम्स उन्हें अपनी कीमत समझने के बहुत कम मौके देते हैं इसीलिए ये चैलेंजेस (जब वे इसे सफलतापूर्वक पूरा कर लेते हैं) उन्हें सशक्त महसूस करने, संतुष्टि देने, उन्हें कुछ हासिल करने का अहसास दिलाने का काम करता है और यही एक महत्वपूर्ण कारण है जिसकी वजह से बच्चे इन गेम्स से दूर नहीं रह पाते।
क्या ये गेम्स अकेलापन और डिप्रेशन का कारण बनते हैं?
डॉ. मेश्राम: जी हां, आगे चलकर, यह उन्हें अकेला, उदास और विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने में असमर्थ बना देता है। जब ऐसा होता है तो कई किशोर और वयस्क भी खुद को इस अंधेरे गड्ढे से बाहर निकालने में असहाय महसूस करते हैं, लेकिन वे ना चाहते हुए भी खुद को इसमें झोंक देते हैं। यह सबसे मुश्किल चरण है, जब अकेलापन इतना हावी हो सकता है कि वे मौत को ही आरामदायक महसूस करने लगते हैं। यही कारण है कि हम लोगों को अपने अकेलेपन में घुटने के बजाय दूसरों से बात करने और लोगों की मदद लेने की सलाह देते हैं।
सुडोकु जैसे सुरक्षित खेलों की बजाय ब्लू व्हेल चैलेंज जैसे खतरनाक खेलों की तरफ आकर्षित होने के लिए कौन-सी चीज़ बच्चों को आकर्षित करती है?
ऐसा नहीं है कि यह रातोंरात हो जाता है। बचपन में एक बच्चे की परवरिश और उस समय की गतिविधियां बच्चे का व्यवहार निश्चित करती हैं जो उनके कार्यों को प्रभावित करती है। भागती-दौड़ती दुनिया में जहां मां-बाप दोनों काम करते, वहां एक बच्चा अक्सर किसी नैनी या दादा-दादी की देखरेख में रहता है और अक्सर टीवी ही उसके मनोरंजन का प्रमुख तरीका बन जाता है। एक मासूम उम्र में, वे आंख-मूंदकर उन सब चीज़ों पर भरोसा कर लेते हैं जो वे देखते हैं और जिसमें बिल्कुल भी बौद्धिकता नहीं होती। जल्द ही फोन और आईपैड की यह आदत एक लत में बदल जाती है।
उनकी दुनिया इन वर्चुअल वास्तविकताओं के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है। उनमें से ज्यादातर ऑनलाइन गेम और रणनीतियों में फंस जाते हैं। यदि आप इन खेलों का विश्लेषण करेंगे तो वे शुरू से ही हिंसा की बातें करते हैं, क्योंकि इनमें चैलेंजेस भी मरने-मारनेवाले होते हैं। जैसे जब किसी राक्षस को मारना, प्रतिद्वंद्वी को मारना, खुद को किसी चलती ट्रेन के सामने आने से बचना आदि, जाहिर है ऐसी स्थितियों में तो आप विजयी ही साबित होगें। खेल को पूरा करना और एक लेवल ऊपर जाना बच्चे को बेहतर लगता है, जो उसके अकेले संसार में उपलब्धियों की तरह है। इसलिए हिंसा मनोरंजन का एक ज़रिया या आदर्श बन जाता है।
क्या बच्चों को ऐसे ख़तरनाक खेलों से डर नहीं लगता?
डॉ. मेश्राम: मैंने व्यक्तिगत रूप से किसी भी ऐसे बच्चे या माता-पिता को सलाह नहीं दी है जो इस ब्लू व्हेल चैलेंज के शिकार हो गए हैं। लेकिन इस खेल के बारे में इंटरनेट पर हमें जो थोड़ी-बहुत जानकारी मिली है, उसके आधार पर यह कहा जा रहा है कि खेल का पता लगाया गया था कि जैविक अपशिष्टों का उन्मूलन करने के लिए खेल की शुरुआत की गयी थी जो कमज़ोर प्राणियों में देखी जाती है। ऑनलाइन गेम्स पर बहुत अधिक निर्भरता और कम सक्रिय सामाजिक जीवन किसी व्यक्ति को अकेला और उदास बना देता है। यही वह समय है जब लोग ऐसी चीज़ों या गतिविधियों का एक हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं जिनसे उन्हें थोड़ा जुड़ाव महसूस हो। इस कमज़ोर क्षण में यदि ऐसी कोई चुनौती सामने आती है तो यह वे इसमें हिस्सा लेने की तीव्र इच्छा महसूस करते हैं और एक ऐसे समुदाय का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो जाते हैं जो झूठे संबंधों का भाव देता है।
बच्चों की रुचि बाहर जाने और मैदान में खेलने में कम क्यों गयी और अब वे घर के कोने में पड़े रहने में सहज क्यों हैं?
डॉ. मेश्राम: हम इसके लिए डिजिटलीकरण को दोषी मानते हैं। एक समय था जब बच्चे क्रिकेट जैसे खेल खेलने के लिए, एक-दूसरे के घर जाते थे, कुछ बच्चों को इकट्ठा करते थे और फिर खेल शुरू होता था। इस खेल में निर्भरता थी जो नेतृत्व गुणों, योजना की रणनीति बनाने और बातचीत की कला में सुधार करने में मदद करती थी। लेकिन मोबाइल या आईपैड मनोरंजन और संचार का एक आसान तरीका बन गए जहां बच्चा विचारों और आइडियाज़ के लिए केवल अपने आप पर निर्भर होता है। कोई बहस या राय के मतभेद नहीं होते हैं। शुरुआत में, यह अच्छा लगता है लेकिन जैसे-जैसे आप इसे ज़्यादा समय देना शुरु करते हैं, यह अलग संतुष्टि एक युवा के लिए कयामत में तब्दील होने लगती है।
ऑनलाइन गेम्स के इस नशे से टीनएजर्स को कैसे बचाएं
डॉ. मेश्राम: छोटे बच्चों को आप उन्हें डांट सकते हैं और उनके हाथ से मोबाइल छिन सकते हैं, लेकिन आप टीनएजर्स के साथ ऐसा नहीं कर सकते। अगर आप उनसे ज़ोर-ज़बरदस्ती करते हैं या बहस करने की कोशिश करते हैं तो यह बात उल्टी भी पड़ सकती है, कभी-कभी, वे भी हिंसक भी हो सकते हैं। इसीलिए धीरे-धीरे शुरू करें और फिर धीरे-धीरे आपके किशोर बच्चे को लगी लत छोड़ने में उसकी मदद करें। आपकी मदद के लिए कुछ टिप्स ये रहीं:
नो डिजिटल ऑवर तय करें: हर दिन कुछ घंटों की योजना बनाएं, जब परिवार का हर सदस्य मोबाइल एक तरफ रख दे और एक-दूसरे से बात करे। इस काम के लिए रात का समय सबसे अच्छा हो सकता है।
दूसरों के उदाहरण दें: जब घर पर हों या ज़रूरत न हो, तो मोबाइल का ज़्यादा उपयोग न करें। आपका बच्चा धीरे-धीरे सीख लेगा कि कैसे खुद को डिजिटल दुनिया के प्रलोभनों से दूर रखा जा सकता है।
हार न मानें: एक बार जब आप मोबाइल उपयोग को कम करने की कोशिश करते हैं, तो बहुत अधिक गुस्सा, झुंझलाहट, नींद की कमी, भूख में कमी जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं। याद रखें यह गेम की लत मस्तिष्क पर वैसा ही असर डालती है जैसा धूम्रपान या शराब पीने से होता है। इसलिए, शुरुआती दिन आपके लिए दुखद महसूस हो सकते हैं, इसीलिए एक अभिभावक के रूप में, आपको लगातार कोशिश करते रहनी होगी।
एक स्वस्थ विकल्प उपलब्ध कराएं: यदि आप मोबाइल फोन के उपयोग बंद करवाना चाहते हैं, तो अपने बच्चों को कुछ बेहतर गतिविधियों से जोड़ें। आप उसे हफ्ते में 3-4 दिन वाली हॉबिज क्लासेस में भेज सकते हैं। इस तरह उसका ध्यान भटकाने और अधिक लाभदायक द चीज़ों में उसकी रूचि बढ़ाने में मदद होगी।
रात की समय मोबाइल ब्राउज़िंग न करने दें: यह सबसे खतरनाक समय है क्योंकि पोर्न देखने और न्यूड भेजने जैसी ज्यादातर विनाशकारी ऑनलाइन गतिविधियां रात में होती हैं। ऐसा भी हो सकता है ऐसे वक़्त में एक किशोर भी सेक्सुअली सक्रिय हो जाए और धोखेबाज और खतरनाक ऑनलाइन ग्रूमिंग गेम्स का शिकार बन जाए।
सीधे संवाद करें: अपने बच्चे की आंखों में आंखे डालकर उनसे बात करें। यह बच्चे में विश्वास और आत्मविश्वास पैदा करने में मदद करता है। उसे यह भावना होती है कि आपको उसकी फिक्र है और आप उनसे प्यार करते हैं, ये कुछ ऐसी भावनाएं है जो उन्हें वर्चुअल वर्ल्ड के मायाजल का शिकार होने से बचाते हैं।
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अनुवादक-Sadhana Tiwari
चित्रस्रोत-Shutterstock Images.