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Written By: akhilesh dwivedi | Updated : February 14, 2019 12:39 PM IST
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मानसिक बीमारी के ज़्यादातर मामले 14 वर्ष की उम्र तक शुरू हो जाते हैं मगर उनमें से ज़्यादातर की पहचान नहीं हो पाती है इसलिए उनका सटीक इलाज भी नहीं हो पाता है। ©pixabay
दुनिया भर में किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों में हर पाँच में से एक को मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है लेकिन फिक्र की बात ये है कि ज़्यादातर मामलों का चिकित्सा के दायरे में पता ही नहीं चलता और बहुत से मामलों का कोई इलाज नहीं हो पाता है।
बुधवार 10 अक्तूबर को मनाए गए अन्तरराष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौक़े पर विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ाने का अभियान चलाया।
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इस अभियान के तहत 10 से 14 वर्ष की उम्र के लड़के-लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान केन्द्रित करते हुए उन्हें ऐसी स्थितियों से मुक्ति दिलाने की कोशिश की जा रही है जो वयस्क जीवन में भी उन्हें नकारात्मक रूप में प्रभावित कर सकती हैं।
महासचिव एंतॉनियो गुटेरेश ने अन्तरराष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर एक सन्देश में कहा कि किशोर उम्र में कमज़ोर मानसिक स्वास्थ्य की वजह से शैक्षिक कामयाबी हासिल करने पर असर पड़ता है।
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साथ ही प्रभावित किशोर को शराब या नशे के पदार्थों के सेवन की लत लगने और उसका बर्ताव हिंसक होने का भी ख़तरा होता है।
उन्होंने कहा कि दुनिया भर में बहुत से किशोर संघर्षों, लड़ाई-झगड़ों और प्राकृतिक आपदाओं की वजह से ऐसे हालात में फँसे हुए हैं जिनकी वजह से उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए गम्भीर ख़तरा होता है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मानसिक बीमारी के ज़्यादातर मामले 14 वर्ष की उम्र तक शुरू हो जाते हैं मगर उनमें से ज़्यादातर की पहचान नहीं हो पाती है इसलिए उनका सटीक इलाज भी नहीं हो पाता है।
किशोर उम्र के लड़के और लड़कियों में अनेक तरह की बीमारियाँ और विकलांगता होने की एक प्रमुख वजह Depression यानी अवसाद है. दूसरी तरफ़ 15 से 29 वर्ष की उम्र के लोगों की मौत होने की दूसरी प्रमुख वजह आत्महत्या होती है।
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अनेक देशों में शराब और प्रतिबन्धित नशीले पदार्षों के इस्तेमाल किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों में एक प्रमुख समस्या है।
इन पदार्थों के सेवन की लत से किशोर लड़के-लड़कियाँ आत्मघाती व्यवहार अपना लेते हैं जिसका असर ख़तरनाक ड्राइविंग और असुरक्षित यौन सम्बन्धों के रूप में नज़र आता है. इतना ही नहीं, खाने-पीने की भी बुरी आदतें पड़ जाती हैं जिनसे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ जाता है।
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महासचिव का कहना था कि मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित बहुत सी बीमारियों को या तो होने से रोका जा सकता है या होने के बाद उनकी सटीक इलाज भी किया जा सकता है।
लेकिन उसके लिए मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी लक्षणों की पहचान शुरूआती स्तर पर करना बहुत ज़रूरी है।