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वर्ल्ड बैंक और WHO ने चतावनी देते हुए कहा है कि वित्तीय मुश्किलें गरीबी में आने वाले दिनों में आय में आने वाली कमी के चलते अब और अधिक बढ़ने वाली हैं। 2020 में महामारी ने स्वास्थ्य सेवाओं में भी एक गड़बड़ी पैदा कर दी और 1930 के बाद 2020 में ही अर्थव्यवस्था डगमगा गई है।
कोविड से पहले भी एक बिलियन लोग अपनी 10% से अधिक आय को स्वस्थ सेवाओं पर खर्च किया करते थे। गरीब लोग सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं, इसलिए यह स्वीकार करने योग्य स्थिति नहीं है। अब सरकार को हेल्थ बजट को बढ़ाने और लोगों की सेहत की रक्षा करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।
इस रिपोर्ट के मुताबिक 68% आबादी एचआईवी, टीबी, मलेरिया और अपने चेक अप आदि के लिए हेल्थ सर्विसेज पर ही निर्भर थी। लेकिन अब हालात ऐसे बन चुके हैं कि यह लोग इन सेवाओं को अफोर्ड नहीं कर पा रहे हैं।
इस अर्थव्यवस्था की डगमगाहट और गरीबी आने के कारण गांव में रहने वाली आबादी सबसे अधिक प्रभावित हुई है, क्योंकि अब उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ सबसे कम प्राप्त होगा।
WHO के चीफ डॉ टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने कहा है कि, अब खराब करने के लिए समय बचा ही नहीं है। सभी देशों की सरकारों को सामाजिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नीतियां बनाना और काम करना अभी से शुरू कर देना चाहिए। ताकि देश के नागरिक बिना वित्तीय डर के अपना इलाज करा पाने में सुरक्षित महसूस कर सकें।
इनके मुताबिक जो विकास महामारी के आने से पहले हुआ था वह भी पर्याप्त नहीं था। इस बार हमें ऐसे हेल्थ सिस्टम का निर्माण करना चाहिए जो इस प्रकार की भविष्य में महामारी आए तो उसके लिए पूरी तरह से मजबूत हो।
अधिकतर देशों की वर्तमान स्थिति के हिसाब से उनके नागरिकों को अपनी जेब से स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं जिसमें वह खुद को समर्थ महसूस नहीं कर पा रहे हैं। तो इस समस्या का क्या हल निकाला जा सकता है।
WHO के मुताबिक, सबसे पहले सभी देशों को उनके देश की वर्तमान स्वास्थ्य सेवाओं का जायजा लेना चाहिए और फिर जो कमी लग रही है उस पर फोकस करके स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक मजबूत करना चाहिए। इसी प्रकार देश के लोगों की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है जोकि इस समय की आवश्यकता बन गया है।