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Written By: Yogita Yadav | Published : August 31, 2018 11:55 AM IST
पिता की डायट से प्रभावित होता हे होने वाली संतान का स्वास्थ्य । © Shutterstock
बच्चे अगर मोटे हैं तो इसके जिम्मेदार आप भी हो सकते हैं। हालिया शोध तो यही तथ्य प्रस्तुत कर रहा है। ब्रिटेन स्थित नॉटिंघम यूनिवर्सिटी के हालिया अध्ययन में यह पाया गया है कि प्रोटीन की कमी के चलते स्पर्म की क्वालिटी खराब होती है। इससे विकृत जीन बच्चों में जाता है और वे मोटापे तथा उससे जुड़ी अन्य बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।
डायट में करें इन चीजों को शामिल
मोटापा टाइप-2 डायबिटीज से लेकर हृदयरोग, स्ट्रोक और कैंसर तक का खतरा बढ़ाता है। अगर आप अपनी भावी संतान को स्व्स्थ और फिट बनाना चाहते हैं तो अभी से अपनी डायट में प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ शामिल कर लें। पुरुष चाहें तो खाने में भरपूर मात्रा में दाल, पालक, चना, अंडा, चिकन, दूध-दही शामिल कर अपनी भावी संतान को मोटापे से महफूज रख सकते हैं।
प्रभावित करती है प्रोटीन की कमी
शोधकर्ताओं के मुताबिक प्रोटीन की कमी शुक्राणुओं की गुणवत्ता प्रभावित करती है। इससे पिता से बच्चे में विकृत जीन जाने का जोखिम बढ़ जाता है। विकृत जीन बच्चे में मोटापे की समस्या पैदा करता है, जो ताउम्र बनी रहती है। यही नहीं, 30 साल की उम्र पार करते-करते ऐसे बच्चों के टाइप - 2 डायबिटीज की चपेट में आने की आशंका भी बढ़ जाती है।
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ऐसे हुआ शोध
डॉ. एडम वॉटकिंस के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने चूहों को दो समूह में बांटा। पहले समूह को 18 फीसदी, जबकि दूसरे समूह को 9 फीसदी प्रोटीन से लैस डाइट दी। विशेषज्ञ स्वस्थ वयस्कों को रोजाना ली जाने वाले कुल कैलोरी का 20 फीसदी हिस्सा प्रोटीन से हासिल करने की नसीहत देते हैं।
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एक महीने बाद सभी चूहों के शुक्राणुओं के नमूने इकट्ठे किए। इस दौरान 9 फीसदी प्रोटीन युक्त डाइट लेने वाले चूहों के शुक्राणु बेहद कमजोर मिले। उनमें ‘सेमिनल प्लाज्मा’ की गुणवत्ता भी बेहद खराब थी। ‘सेमिनल प्लाज्मा’ वह तरल पदार्थ है, जो अंडाणुओं तक पहुंचकर उन्हें निषेचित करने के सफर में शुक्राणुओं को पोषक तत्व मुहैया कराता है। शोधकर्ताओं ने इन चूहों के शुक्राणुओं से चूहिया को गर्भधारण भी कराया। उनसे जन्मे चूहे न सिर्फ जन्म से ही मोटापे के शिकार मिले, बल्कि चार माह की उम्र में ही डायबिटीज से ग्रस्त हो गए।
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चूहों की चार माह की आयु इंसान की 30 साल की उम्र के बराबर मानी जाती है। चूंकि चूहों और इंसान की जेनेटिक संरचना में काफी समानताएं हैं, लिहाजा अध्ययन के नतीजे इंसानों पर भी लागू होते हैं। अध्ययन के नतीजे ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ में प्रकाशित किए गए हैं।
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