अमेरिका में शोधकर्ताओं ने कोरोनावायरस के 50 से अधिक लॉन्ग-टर्म प्रभावों की पहचान की

एक अध्ययन के अनुसार, कोविड -19 के 50 से अधिक दीर्घकालिक प्रभावों का पता चला है, जिसमें हल्के से दुर्बल करने वाले लक्षण ठीक होने के बाद हफ्तों से लेकर महीनों तक रहते हैं।

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Written By: Anshumala | Updated : September 1, 2021 9:52 AM IST

Long Term Effects of Coronavirus in Hindi: ह्यूस्टन मेथोडिस्ट में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि कोरोनावायरस के 50 से अधिक लॉन्ग-टर्म प्रभावों का पता चला है, जिसमें हल्के से दुर्बल करने वाले लक्षण ठीक होने के बाद भी हफ्तों से लेकर महीनों तक लोगों में नजर आते हैं। इन सुस्त लक्षणों में सबसे कॉमन है थकान (58 %), सिरदर्द (44 %), ध्यान विकार यानी अटेंशन डिसऑर्डर (27 %), बालों का टूटना-गिरना (25 %), सांस की तकलीफ (24 %), स्वाद खोना (23 %) और गंध ना आना आदि (21 %) शामिल है।

मरीजों में ठीक होने के बाद भी दिखते हैं महीनों कोरोना के ये लक्षण

कोरोना के इन लक्षणों के अलावा, अन्य लक्षण फेफड़ों की बीमारी से संबंधित थे, जिसमें खांसी, सीने में तकलीफ, फुफ्फुसीय प्रसार क्षमता में कमी (Decreased pulmonary diffusion capacity), स्लीप एप्निया और फुफ्फुसीय फाइब्रोसिस, हार्ट से संबंधित समस्याएं, जैसे अतालता (Arrhythmia) और मायोकार्डिटिस और विशिष्ट समस्याएं, जैसे टिनिटस और रात को पसीना आना।

शोधकतार्ओं को अध्ययन के दौरान मनोभ्रंश, डिप्रेशन, एंग्जायटी के अलावा तंत्रिका संबंधी लक्षणों की व्यापकता भी पाई गई। यह अध्ययन जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित किया गया है। इस स्टडी के लिए टीम ने चीन, यूके, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, यूरोप, मिस्र और मैक्सिको में किए गए 15 पीयर-रिव्यू अध्ययनों में से 47,910 रोगियों का विश्लेषण किया।

शोधकर्ताओं ने छाती का एक्स-रे, सीटी स्कैन, सूजन की उपस्थिति, एनीमिया, ब्लड क्लॉटिंग का रिस्क, संभावित दिल की विफलता, जीवाणु संक्रमण और फेफड़ों की क्षति के संकेतक सहित कई बायोमाकर्स को मापा। इसमें पाया गया कि 80 % कोरोना से ठीक हो चुके वयस्कों में हल्के, मध्यन और गंभीर कोरोनावायरस के तीव्र संक्रमण (Acute infection) के बाद हफ्तों से महीनों तक कम से कम एक दीर्घकालिक लक्षण था।

स्टडी में दिखे कोरोना के 55 लक्षण

शोधकर्ताओं की टीम ने 55 कोरोना के लक्षणों, संकेतों और असामान्य प्रयोगशाला परिणामों की पहचान की, जिनमें से अधिकांश प्रभाव कोरोना के तीव्र चरण के दौरान विकसित रोगसूचकता के समान थे।

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