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मुझे यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि, '3 तलाक' पर पाबंदी का भारतीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है। इस फैसले का दिन महिला सशक्तिकरण के मुहिम में एक मील का पत्थर है, ज़ाहिर है सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले के साथ ही यह साबित कर दिया कि कि 'ट्रिपल तलाक' अवैध है। जहां तक मेरी जानकारी है 'ट्रिपल तलाक' का मतलब यही है कि- अगर एक मुसलमान पुरुष अपनी पत्नी से 3 बार तलाक कह दे तो उसका तलाक हो जाता है, जैसा कि आपने फ़िल्मों में ऐसा देखा ही होगा।
‘अब मैं इस बात में नहीं उलझूंगी कि यह अधिनियम इस्लाम के लिहाज से कैसा है, क्योंकि यह अध्ययन का एक पूरी तरह से अलग विषय है। लेकिन मैं निश्चित रूप से यह ज़रूर कहना चाहूंगी कि एक मुस्लिम महिला (लेकिन खासकर केवल एक महिला होने के नाते) के रूप में यह फैसला मेरे लिए बहुत मायने रखता है। लोगों ने इस ‘ट्रिपल तलाक’ का ग़लत उपयोग इस हद तक किया है कि कई पुरुषों ने स्काइप, व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी अपनी पत्नियों को तलाक देकर उनकी ज़िंदगी अंधेरों में धकेलने का काम किया है। ‘कुरान' में तलाक की प्रक्रिया के बारे में क्या लिखा गया है इस बात को समझे बिना, एक ऐसी लड़की, जो पत्नी बनकर किसी के घर आती है, उसके साथ रिश्ते ख़त्म करने का यह तरीका अमानवीय है। यही वजह है कि बहुत-सी महिलाओं को इस फैसले का इंतज़ार था। हालांकि भारत में यह फैसला लेने में देरी से लिया गया, लेकिन निश्चित रूप से यह भी कहा जा सकता है कि- देर आए दुरुस्त आए।
दरअसल मुझे अब जिस बात की उम्मीद है वह है, 'हलाला' के खिलाफ एक समान तरह के और मज़बूत रुख की। जी हां, अगर आपने कभी कहीं हलाला के बारे पढ़ा या सुना है तो आपको पता होगा कि यदि एक मुस्लिम महिला तलाक के बाद उसके पूर्व पति से शादी करना चाहती है, तो उसे किसी दूसरे मुस्लिम पुरुष से शादी करनी पड़ेगी और उसके बाद दूसरा पति उस महिला को जब तलाक दे देगा, तब तलाक के बाद वह अपने पहले पति से शादी कर सकती है। आप खुद समझदार हैं और अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वास्तव में इस मामले में क्या होता है। कमज़ोर महिलाओं को 'कुछ ज़्यादा ही मददगार' मौलवी (धार्मिक गुरु) की 'रातभर की दुल्हन' बनने के लिए तैयार करवाया जाता है। महिलाएं इस प्रथा के खिलाफ काफी समय से आवाज़ उठा रही हैं, अपनी घृणा और विरोध प्रकट करती रही हैं। लेकिन हर बार, नियम बनाने वाले मौलवी, जो खुद को धार्मिक विद्वान मानते हैं, महिलाओं की आवाज़ को दबा देते हैं, जो कि निश्चित ही हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए।
मैंने बहुत सारी महिलाओं, मुस्लिम समुदाय के लोगों और गैर-मुस्लिम लोगों से बात की, और जानने की कोशिश की कि ‘हलाला’ की परम्परा के बारे में वह क्या सोचते हैं? और किसी एक महिला ने भी इसका बिल्कुल भी समर्थन नहीं किया। हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं, जहां धार्मिक या शरीयत क़ानून (अगर वे अमानवीय हैं तो) को कोई अहमियत नहीं दी जा सकती। जब हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित सभी चीजों का पालन करते हैं, तो अलग-अलग धर्म की महिलाओं के लिए समान अधिकार और नियम क्यों न हो।
फिर क्यों ना भारत में रहनेवाली मुस्लिम महिलाओं को ऐसी परम्पराओं से आज़ादी दिलायी जाए, जहां उनकी अहमियत किसी स्वामित्व वाली वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं है? मैं पूरे दिल से तीन तलाक के रिवाज़ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करती हूं, और साथ ही मुझे यह भी उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट 'हलाला' से जुड़ा हुआ एक ऐसा ही समझदारीभरा और मानवीय निर्णय लेगी।
कृपया आप अपनी राय और सुझाव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
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अनुवादक-Sadhana Tiwari
चित्रस्रोत- Shutterstock