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हिमाचल में खुला किशोर मित्र स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र, जानें क्‍या हैं इस उम्र की मुश्किलें

इस उम्र में होने वाले बदलावों को लेकर किशोर हो जाते हैं परेशान। © Shutterstock

इस उम्र में होने वाले बदलावों को लेकर किशोर हो जाते हैं परेशान।

किशोरों की स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान करने के लिए हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत विशेष स्वास्थ्य केंद्र चलाए जा रहे हैं। एक अधिकारी ने रविवार को यह जानकारी दी।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक मनमोहन शर्मा ने एक बयान में कहा कि राज्य के सभी क्षेत्रों और क्षेत्रीय अस्पतालों में काउंसिलिंग के माध्यम से नाबालिगों को सलाह और उपचार मुहैया कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि युवक सलाह और इलाज के अलावा यौन संबंधी समस्याओं को लेकर रोजाना किशोर मित्र स्वास्थ्य केंद्र आ रहे हैं। शर्मा ने बताया कि सभी किशोर संबंधित स्वास्थ्य केंद्रों में परामर्श पोषण, युवावस्था, प्रजनन संक्रमण और यौन संक्रमण की रोकथाम तथा जन्म नियंत्रण और बाल जन्म में देरी जैसे मुद्दों पर सलाह उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

उपलब्‍ध करवाई जा रही है सलाह

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इसके अलावा सैनेटरी नैपकिन, गर्भ निरोधक और आवश्यक दवाईयां भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि स्कूलों और समुदायों में स्वास्थ्य शिक्षा सत्र आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा इन क्लीनिकों को किशोरों के अनुकूल बनाने के लिए राज्य सरकार ने इसे युवा परामर्श केंद्र नाम दिया है।

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नाजुक उम्र की ये हैं मुश्किलें

  • मन में कई सवाल पनपने लगते हैं। क्यों? कब? कहां? ऐसे प्रश्न इसी उम्र में जन्मते हैं।
  • आजादी पर थोडा भी प्रतिबंध उन्हें बाधक लगता है। वे स्कूल के नियमों और माता-पिता के आदेशों को चुनौती देने लगते हैं।
  • अपने ढंग से चीजों को सही-गलत और अच्छा-बुरा समझने की बुद्धि आ जाती है। यह सामान्य-सहज प्रक्रिया है।
  • प्री-टीन और टीनएज में अचानक एहसास होने लगता है कि हम कुछ भी कर सकते हैं और जो करेंगे, वह गलत नहीं होगा। यह एक बडा बदलाव होता है, जो माता-पिता के लिए मुश्किलें खडा करता है।

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  • खुद को आकर्षक महसूस करने लगते हैं टीनएजर्स। खास तौर पर लडकियों में आईने में खुद को निहारना, सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग, ड्रेसेज को लेकर सजगता जैसे तमाम गुण इसी उम्र में पनपते हैं।
  • दोस्तों के साथ घंटों समय बिताने, फोन करने और माता-पिता से कुछ छिपा लेने की मानसिकता भी इसी उम्र की देन है।
  • मूड स्विंग, भावनात्मक उथल-पुथल, अनावश्यक रुलाई जैसे लक्षण भी हार्मोनल बदलाव के कारण होते हैं।

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पेरेंट्स ऐसे कर सकते हैं मदद

  • बातें गंभीरता से सुनें। घर में ऐसा माहौल बनाएं कि वे खुलकर अपनी बात कह सकें। उनके दोस्तों-सहपाठियों की जानकारी अवश्य रखें।
  • क्रिकेट, फुटबाल, बैडमिंटन, हॉकी जैसे खेलों में उनकी भागीदारी बढाएं। इसके अलावा नृत्य, संगीत, पेंटिंग जैसी कलाओं में उनकी रुचि जगाएं, अच्छी पुस्तकें पढने को दें।
  • उनके दृष्टिकोण को भी महत्व दें। अपने अहं के चलते बच्चों को हथियार के बतौर न इस्तेमाल करें।
  • बच्चों के पहले रोल मॉडल माता-पिता ही होते हैं। उनके सामने कभी न झगडें।
  • बात-बात पर बढते बच्चों को न टोकें। उन्हें कठोर सजा देने से भी बचें।

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