दिल की जन्मजात बीमारी से पीड़ित पांच साल के मो का हुआ सफल इलाज, दिल में था बड़ा छेद

मो के दिल का साइज इतना बढ़ गया था कि यह छाती की हड्डी स्टर्नम के नीचे आ चुका था। स्टर्नम को खोलने के लिए हमने इलेक्ट्रिक साॅ का इस्तेमाल किया। इसमें जोखिम बहुत अधिक था क्योंकि दिल का आकार बड़ा होने के कारण उसे नुकसान पहुंच सकता था।

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Written By: Anshumala | Published : February 5, 2019 2:36 PM IST

पांच साल के बच्चे मो के माता-पिता ने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें अपने छोटे से बच्चे के इलाज के लिए फिर से भारत आना पड़ेगा, लेकिन इन्द्रप्रस्थ अपोलो हाॅस्पिटल्स के सीनियर कन्सलटेन्ट, पीडिएट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट सर्जन डाॅ. मुथु जोथी ने अपनी टीम के साथ मिलकर बच्चे का सफल इलाज किया। म्यांमार के निवासी बेबी मो के दिल में एक बड़ा छेद था और दिल के बांए हिस्से का वाॅल्व जन्म से ही लीक हो रहा था। 2.5 साल पहले भी इसी बीमारी का इलाज किया गया था और बेबी मो जल्द ही ठीक होकर अपने देश लौट गया लेकिन पिछले साल सितम्बर में मिट्रल वाॅल्व में इन्फेक्शन और फेफड़ों में ज्यादा प्रेशर के कारण बच्चे को तेज बुखार आने लगा।

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ढाई साल पहले भी हुआ था ऑपरेशन

बेबी मो के बारे में बताते हुए डाॅ. मुथु ने कहा, ‘‘मैंने लगभग ढाई साल पहले भी मो का ऑपरेशन किया था, तब उसके दिल में बड़ा छेद था। इसके अलावा उसका मिट्रल वाॅल्व लीक हो रहा था, जिसे हमने रिपेयर किया। सर्जरी के बाद बच्चा पूरी तरह ठीक होकर अपने देश लौट गया लेकिन सितम्बर में उसे फिर से तेज बुखार आने लगा। म्यांमार में जांच करने पर डाॅक्टरों ने बताया कि रिपेयर किए गए मिट्रल वाॅल्व में संक्रमण हो गया है। हमसे बात करने के बाद स्थानीय कार्डियोलॉजिस्ट ने बच्चे को छह सप्ताह तक एंटीबायोटिक दवाएं दीं ताकि इन्फेक्शन आगे न बढ़े। इससे बच्चे को आराम से भारत लाया जा सका।’’

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दिल का आकार काफी बढ़ गया था

पिछले साल दिसम्बर में मो को हमारे हाॅस्पिटल में लाया गया, तब उसके दिल का आकार काफी बढ़ गया था। दिल के बाएं हिस्से में मिट्रल वाॅल्व लीक हो रहा था और दिल के दाएं हिस्से में भी ट्राईकस्पिड वाॅल्व लीक हो रहा था। ऐसा होने पर खून फिर से बाएं वेंट्रिकल (मुख्य पम्पिंग चैम्बर) से बाएं एट्रियम में लौटने लगता है। इस कारण फेफड़ों पर प्रेशर बढ़ रहा था, जो लगभग शरीर के प्रेशर के बराबर था। सामान्य स्थिति में फेफड़ों पर प्रेशर शरीर के प्रेशर का 1/5 वां हिस्सा होता है। इन सब के चलते बच्चा ठीक से सांस नहीं ले पा रहा था, उसके दिल का आकार सामान्य से ढाई गुना बढ़ गया था। अब हमारे पास एक ही विकल्प था कि बाएं वाॅल्व को बदला जाए और दाएं को रिपेयर किया जाए। सर्जरी में जोखिम बहुत अधिक था और इसकी पूरी जानकारी मो के माता-पिता को दी गई।

जटिल थी सर्जरी

सर्जरी की जटिलता पर बात करते हुए डाॅ. जोथी ने कहा, ‘‘उसके दिल का साइज इतना बढ़ गया था कि यह छाती की हड्डी स्टर्नम के नीचे आ चुका था। स्टर्नम को खोलने के लिए हमने इलेक्ट्रिक साॅ का इस्तेमाल किया। इसमें जोखिम बहुत अधिक था क्योंकि दिल का आकार बड़ा होने के कारण उसे नुकसान पहुंच सकता था। पहली बार हमने ग्रोइन ब्लड वेसल्स के कैन्यूलेशन से इतने छोटे बच्चे में बाइपास की है। हार्ट-लंग मशीन की मदद से दिल का आकार कम किया गया और फिर छाती को खोला गया, लेकिन दिल स्टर्नम से बुरी तरह से चिपका हुआ था। सावधानीपूर्वक छाती खोलने में ही हमें दो घंटे लगे। दिल के कुछ हिस्से हड्डी के नीचे भी चिपके हुए थे। हमनें उन्हें सर्जिकल नाइफ (चाकू) की मदद से हटाया। इसकेे बाद संक्रमित वाॅल्व को प्रोस्थेटिक वाॅल्व से बदला। हमने दाएं वाॅल्व को रिपेयर भी किया। पूरी सर्जरी में आठ से दस घंटे का समय लगा।

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सर्जरी के बाद उसकी हार्ट रेट की रिदम में बहुत उतार-चढ़ाव हुए। हार्ट रेट नियन्त्रित करने के लिए उसे दवाएं दी गईं और एक सप्ताह तक वेंटीलेटर पर रखा गया। अब उसे अस्पताल में एक और सप्ताह हो गया है और बच्चे की हालत में सुधार हो रहा है। वह ठीक से खा रहा है, उस पर दवाओं का असर हो रहा है।

स्रोत: प्रेस रिलीज

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