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कोलोरेक्टल कैंसर कोलन या फिर रेक्टम में बनने वाला ट्यूमर है। एडेनोकार्सिनोमा ( Adenocarcinomas) कोलोरेक्टल कैंसर का सबसे आम प्रकार है, जो टिश्यू के बलगम वाली लाइनिंग में मौजूद सेल्स में अक्सर बढ़ने लगता है। हाल ही में हुई एक स्टडी में इस बात का खुलासा हुआ है कि कोलोरेक्टल कैंसर के उपचार में प्राथमिक तौर पर प्रयोग होने वाली आम दवा ट्यूमर सेल्स से प्रोटीन स्त्राव का कारण बनती है। इस स्थिति को म्यूसिन कहते हैं।
जर्नल ईलाइफ में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, ये प्रोटीन हमारी बलगम वाली परत में अपनी जगह बना लेता है और एक रुकावट पैदा करता है, जो दवाओं को अपने लक्ष्य तक पहुंचने से रोकती हैं।
शोधकर्ताओं की टीम ने जेनेटिक बदलाव और रसायनिक अवरोधकों को शामिल कर कई तकनीक का प्रयोग किया और ये पता लगाने में सक्षम रहे हैं कि कैसे कैंसर कोशिकाओं में म्यूसिन का स्त्राव होता है। इस तकनीक के साथ वैज्ञानिकों ने भावी उपचार को विकसित करने के तरीकों को तैयार करना है, ताकि इनका प्रयोग कीमोथेरेपी के साथ-साथ किया जा सके और कोलोरेक्टल कैंसर की प्रतिरोधी दवा के रूप में यूज किया जा सके। इस शोध में ये भी खुलासा हुआ है कि संभावित नई तकनीक इस रोग के निदान में भी मदद कर सकती है।
शोधकर्ताओं ने म्यूसिन्स का अध्ययन किया, जो कि पहले से ही शुगर कोटेड प्रोटीन से भरी हुई थी और ये आंख, नाक, वायुमार्ग और पाचन तंत्र सहित कोलन की लाइनिंग में मौजूद विशेष कोशिकाओं द्वारा स्त्रावित होती हैं। बता दें कि दिन में औसतन हर मनुष्य एक लीटर तक बलगम का स्राव करता है। म्यूसिन में जेल बनाने वाले गुण होते हैं, जो दूसरे जैविक पदार्थों के साथ मिलकर बलगम बनाते हैं। बलगम, एक गाढ़ा प्रकार का तरल पदार्थ है, जो ल्यूब्रिकेंट के रूप में कार्य करता है, टिश्यू को डिहाइड्रेट होने से रोकता है और कोशिकाओं को रोगजनकों और दूसरे कारकों से बचाने के लिए एक अवरोध के रूप में काम करता है।
अध्ययन के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने ये बताया है कि म्यूसिन की अधिकता ट्यूमर कोशिकाओं तक पहुंचने वाली दवाओं के बाधा पैदा करने का काम करती हैं। कोलोरेक्टल कैंसर के प्राथमिक उपचार के रूप में एक साथ दी जाने वाली दवाओं फ़्लोरोरासिल और इरिनोटेकन, कैंसर कोशिकाओं द्वारा स्त्रावित होने वाले म्यूसिन की मात्रा में बदलाव लाती है।
अध्ययन के मुख्य लेखक विवेक मल्होत्रा का कहना है कि कोलोरेक्टल कैंसर के 15 से 20 फीसदी मामले म्यूसिन के जरूरत से ज्यादा उत्पादन से जुड़े हुए हैं। कुछ मामलों में ये समस्या साबित हो सकती है क्योंकि ये दवा को उसके लक्ष्य तक पहुंचने से रोकती है। एक चीज, जो हमें चौंका देने वाली लगी वो ये थी कि खुद कीमोथेरेपी भी म्यूसिन स्त्राव का कारण बनती है और मरीजों को ज्यादा डोज की जरूरत के चक्कर में डालती हैं।