सूर्य ग्रहण 2019: क्‍या ग्रहण के नियमों का है कोई वैज्ञानिक आधार ?

हिंदू मान्‍यताओं के अनुसार बहुत से नियमों का पालन करने को कहा जाता है। पर अकसर लोगों के मन में सवाल उठता है कि वे क्‍यों इन नियमों का पालन करें?

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Written By: Yogita Yadav | Published : January 3, 2019 5:59 PM IST

साल का पहला सूर्य ग्रहण पड़ने वाला है। सूर्य ग्रहण के संदर्भ में हिंदू मान्‍यताओं के अनुसार बहुत से नियमों का पालन करने को कहा जाता है। पर अकसर लोगों के मन में सवाल उठता है कि वे क्‍यों इन नियमों का पालन करें? क्‍या वाकई इसका कोई वैज्ञानिक आधार है?

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गर्भव‍ती महिलाओं के लिए हैं विशेष नियम

हिंदू मान्यताओं के अनुसार अगर कोई गर्भवती महिला सूर्य ग्रहण देख लेती है तो उसका बुरा असर उसके होने वाले बच्चे पर पड़ता है। कहा जाता है कि किसी भी ग्रहण का असर पूरे 108 दिनों तक बना रहता है।ऐसे में गर्भवती महिला को बचकर रहना चाहिए। इस बार साल का पहला सूर्य ग्रहण 6 जनवरी को लगने वाला है।

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कब है सूर्य ग्रहण

सूर्य का प्रकाश जब चंद्रमा की वजह से पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाता है तो उसे सूर्यग्रहण कहा जाता है। साल का पहला सूर्यग्रहण पौष अमावस्या पांच जनवरी की आधी रात के बाद छह जनवरी की मध्य तक धरती से दिखाई देगा। यानी इस साल का पहला सूर्य ग्रहण 6 जनवरी को लगेगा। हालांकि कहा जा रहा है कि भारत में यह सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देगा।यूरोप, मध्य एशिया, अफ्रीका, अमेरिका में ये ग्रहण दिखाई देखा लेकिन इस दौरान कुछ विशेष बातों का ख्याल जरूर रखना चाहिए।

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मान्‍यताओं का वैज्ञानिक आधार

भारतीय मान्यता के अनुसार सूर्यग्रहण के बाद बहुत सारे नियमों का पालन किया जाता है।  लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है क्यों ज्योतिषी हो या घर के बड़े ग्रहण के बाद नहाने के लिए कहते हैं या खाना बनाकर रखने से मना करते हैं, पानी के जार में दुर्वा घास डालकर रखने जैसे नियमों को मानने के लिए कहते हैं। आइए जानते हैं कि ग्रहण के दौरान क्‍या और क्‍यों करना चाहिए।

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पानी में दूब डालना –ज्योतिषियों का मानना है कि दूब यानी दुर्वा घास को पानी में डालने से वह पवित्र हो जाता है। बायोनैनोसाइन्स 2015 के आर्टिकल में ये पब्लिश हुआ था कि दुर्वा घास में रोगाणुनाशक गुण होता है जो खाना या पानी को रोगाणुमुक्त रखने में मदद करता है। सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य का प्रकाश कम हो जाने के कारण जीवाणु का पनपना बढ़ जाता है। इसलिए ग्रहण के दौरान दुर्वा घास पका हुआ खाना या पीने के पानी में दुर्वा घास डालने पर वो संदूषित नहीं होता है।

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क्‍यों न रखें पका खाना - इस मान्यता के पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि ग्रहण के दौरान जीवाणुनाशक पराबैंगनी विकिरण अनुपलब्ध होते हैं जो रोगाणु को पनपने से रोकने में मदद करते हैं। इसलिए ग्रहण के दौरान पका हुआ खाना संग्रह करने पर उनके खराब होने की संभावना तीव्र होती है।

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क्‍यों जरूरी है नहाना - ये भारतीय मान्यता है कि ग्रहण के पहले या बाद में राहु का दुष्प्रभाव रहता है जो नहाने के बाद ही जाता है। इस मान्यता के पीछे भी एक विज्ञान है। सूर्य के अपर्याप्त रोशनी के कारण जीवाणु या कीटाणु ज्यादा पनपने लगते हैं जिसके कारण इंफेक्शन होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए ग्रहण के बाद नहाने से शरीर से अवांछित टॉक्सिन्स निकल जाते हैं और बीमार पड़ने की संभावना को कुछ हद तक दूर किया जा सकता है।

क्‍यों है खाने की मनाही- ग्रहण के दौरान आमतौर पर खाना खाने की मनाही होती है। ग्रहण प्रेरित गुरुत्वाकर्षण के लहरों के कारण ओजोन के परत पर प्रभाव पड़ने और ब्रह्मांडीय विकिरण दोनों के कारण पृथ्वीवासी पर कुप्रभाव पड़ता है। इसके कारण ग्रहण के समय जैव चुंबकीय प्रभाव बहुत सुदृढ़ होता है जिसके प्रभाव स्वरूप पेट संबंधी गड़बड़ होने की ज्यादा आशंका रहती है। इसलिए शरीर में किसी भी प्रकार के रासायनिक प्रभाव से बचने के लिए उपवास करने की सलाह दी जाती है। इसके साथ मंत्रोच्चारण करने से मन शांत रहता है और व्यक्तिगत कंपन के प्रभाव को भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

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