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Traumatic Brain Injury में सिर्फ ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कब होगी मौत! ब्लड में इन दो प्रोटीन से मिलती है जानकारी

Traumatic Brain Injury में सिर्फ ब्लड टेस्ट से पता लग सकता है कब होगी मौत! ब्लड में इन दो प्रोटीन से मिलती है जानकारी

मिशिगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता फ्रेडरिक कोर्ले का कहना है कि ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी के शुरुआती और सटीक अनुमान डॉक्टरों को ये पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि ब्रेन इंजरी कितनी गंभीर है।

Written by Jitendra Gupta |Published : August 23, 2022 4:16 PM IST

घातक ब्रेन इंजरी वाले दिन लिया गया ब्लड टेस्ट ये बता सकता है कि मरीज की मौत कब होगी या फिर वो गंभीर रूप से विकलांगता से बच पाएगा या नहीं। इस ब्लड टेस्ट की मदद से डॉक्टर को ये तय करने में मदद मिल सकती है कि ब्रेन इंजरी का संभावित इलाज किया हो सकता है। द लांसेट न्यूरोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन के निष्कर्ष ये बताते हैं कि GFAP and UCH-L1 नाम के दो प्रोटीन का उच्च स्तर मौत और गंभीर चोट के साथ जुड़ा हुआ है।

चोट वाले दिन का ब्लड टेस्ट जरूरी

मिशिगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता फ्रेडरिक कोर्ले का कहना है कि ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरीके शुरुआती और सटीक अनुमान डॉक्टरों को ये पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि ब्रेन इंजरी कितनी गंभीर है। इसके अलावा डॉक्टर मरीज के करीबियों को ये भी बता सकता है कि ब्रेन इंजरी के मामले में रोगी की देखभाल कैसे करनी है। इतना ही नहीं रोगी की रिकवरी से जुड़ी बातों का भी अंदाजा लगाया जा सकता है।

ये दो प्रोटीन बताते हैं कब होगी मौत

यूएस फूड एंड ड्रग एडमिन्स्ट्रेशन (FDA) ने साफ किया है कि 2018 में GFAP और UCH-L1 का प्रयोग किया गया था ताकि डॉक्टरों को ये पता लगाने में मदद मिल सके कि हल्दी दिमागी चोट के लिए सीटी स्कैन कराने की जरूरत है भी या नहीं।

1700 रोगियों पर हुआ अध्ययन

अध्ययन के लिए टीम ने दो उपकरणों का इस्तेमाल कर प्रोटीन का पता लगाया और गंभीर ब्रेन इंजरी से जूझ रहे करीब 1700 मरीजों की चोट वाले दिन लिए गए ब्लड टेस्ट का विश्लेषण किया। ग्लास्गो आउटकम स्केल-एक्सटैंडेड का इस्तेमाल कर चोट के छह महीने बाद मूल्यांकन की तुलना परिणामों से की गई। ग्लास्गो आउटकम स्केल-एक्सटैंडेड एक ऐसा सिस्टम है, जो ब्रेन इंजरी के मरीजों के काम करने की क्षमता को दर्शाता है।

इस तरह लगया गया अंदाजा

शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन रोगियों का GFAP वैल्यू 20 फीसदी से भी कम था उन्हें चोट लगने के छह महीनों के भीतर मौत का खतरा 23 गुना ज्यादा था। ये खतरा उन लोगों के खिलाफ था, जिनका GFAP वैल्यू 80 फीसदी तक था।

ठीक इसी तरह जिन रोगियों का UCH-L1 वैल्यू 20 फीसदी से कम था उन्हें चोट लगने के छह महीनों के भीतर मौत का खतरा 63 गुना ज्यादा था। ये खतरा उन लोगों के खिलाफा था, जिनका UCH-L1 वैल्यू 80 फीसदी तक था।

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