शोध ने भी माना, बेटे मां पर ही जाते हैं, ऐसे निपटें किशोरावस्‍था की समस्‍याओं से

मां की तरुणाई की उम्र से तय होते हैं बेटे की टीनएज में होने वाले परिवर्तन।

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Written By: Yogita Yadav | Updated : October 16, 2018 9:11 AM IST

‘मम्‍माज बॉय’ कहकर चिढ़ाने वाले लोग जान लें कि बेटे वाकई मां के ही होते हैं। बेटियों पर जहां पिता का ज्‍यादा लाड दिखता है, वहीं बेटे मां के ज्‍यादा करीब होते हैं। अब तो शोध में भी यह बात सामने आई है कि बेटे वाकई मां पर ही जाते हैं। जिस उम्र में मां किशोरावस्था के परिवर्तनों से गुजरती है, ठीक उसी उम्र में बेटे में दिखाई देते हैं टीनएज के परिवर्तन।

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क्‍या कहता है शोध

डेनमार्क के आरहुस यूनिवर्सिटी में हुए शोध में यह बात सामने आई है कि बेटे की तरुणाई का माता के रजोधर्म से गहरा संबंध होता है। मतलब कोई युवती जिस उम्र में माहवारी शुरू होने का अनुभव करती है उससे उसके बेटे की तरुणाई की उम्र तय होती है। यह तथ्य हालिया शोध में प्रकाश में आया है। इससे पहले यह जाना जाता था कि माता की तरुणाई की उम्र से उसकी बेटी की तरुणाई का गहरा संबंध होता है, लेकिन बेटे की तरुणाई भी माता की तरुणाई से जुड़ी होती है यह किसी को मालूम नहीं था। हालिया शोध के नतीजे ह्यूमन रिप्रोडक्शन में प्रकाशित हुए हैं। शोध के अनुसार, जिन माताओं ने अपनी हमउम्र माताओं की तुलना में कम उम्र में पहले रजोस्राव का अनुभव किया है उनके बेटे भी अपनी उम्र के लड़कों से पहले यौवन का अनुभव करने लगते हैं।

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दिखने लगता है अंतर 

प्रमुख शोधकर्ता निस ब्रिक्स ने कहा, "माताओं में पहले रजोस्राव और उनकी बेटियों में पहले रजोस्राव के बीच संबंध कई अध्ययन में आ चुके हैं। हमारे शोध में नई बात यह है कि इसमें बेटियों की तरुणाई के कुछ अन्य लक्षणों को भी शामिल किया गया है। मसलन, स्तन के विभिन्न चरण, जननेंद्रियों पर बाल उगना आदि। इसके अलावा बेटों की तरुणाई से भी माता के पहले रजोस्राव की उम्र के संबंध का पता लगाया गया है।"

mom-with-teenage-son थोड़े से धैैैर्य और समझदारी से बच्‍चों को सिखाएं इस उम्र की समस्‍याओं से निपटना।

ऐसे निपटें तरुणाई में आने वाली समस्‍याओं से

बच्चे वो फूल होते है जो की जीवन के बगीचे में सवरतें हैं| फिर वो फूल गुलाब का हो या फिर सूरजमुखी सुंदर तो दोनों दिखते है तो फिर हम अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चो से क्यों करे?

किशोरावस्था एक ऐसी अवस्था होती है जहां बच्चे न तो छोटे में गिने जाते हैं और न ही बड़े में | हमें सबसे पहले शुरू से अर्थात बचपन से जब बच्चा घुटनों पर चलना सीखता है तब से ही उसकी छोटी छोटी बातों पर ध्यान रखना चाहिए, बच्चा है तो जिद्द करेगा ही किन्तु हमें सयंम से ध्यान रखकर ही उसकी जिद्द को पूरी करनी चाहिए|

उम्र के साथ-साथ बच्‍चों को अनुशासित जीवन का तरीका सिखाना चाहिए। साथ ही स्वयं भी अनुशासन में रहें|यदि हम स्वयं अपने से बड़ों को जवाब देगे तो बच्चा वही सीखेगा एवम बाद में पलट कर जवाब देगा जो कि हमें अच्छा नहीं लगता और हम शुरू हो जाते है कि बच्चे तो हमारा सुनते ही नहीं|

किशोरावस्था में प्रवेश के पहले ही हमें बच्चों दुनियादारी के बारे में धीरे-धीरे बताना चाहिए कि जीवन में क्या गलत होता है|

उनका मस्तिष्क विकार होने से पूर्व ही हमें उनके मस्तिष्क का विकास करना चाहिए| यदि उनके मस्तिष्क में सकारात्मक सोच शुरू से बैठ गयी तो उनका जीवन दूसरों को भी रौशनी देगा|

हमें उनकी भावनाओं को समझना चाहिए|किसी भी चीज़ का निवारण दंड नहीं होता इसे हमेशा ध्यान रखना चहिये|ये किशोरावस्था नदी की तेज़ वेग की लहर के समान होती है जिसमें  बहुत सयंम के साथ तैरना पड़ता है|

बच्चों की जिम्मेदारी हम सभी की है जिसमें परिवार,विद्यालय,समाज,सभी जम्मेदारी ले तो बच्चे कभी भी अनुशासनहीन नहीं बन सकते|

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